भारत के चे गुएवारा शहीद ए आज़म भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं !!

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

23 मार्च 1931 को भगत सिंह को अपने क्रन्तिकारी साथियों राजगुरु और बटुकेश्वर दत्त के साथ फांसी दे दी गयी. फांसी के समय भगत सिंह और उनके जांबाज़ साथियों ने अदम्य साहस का परिचय दिया. भगत सिंह की लाश लेने के लिए जेल के बाहर लोग भारी संख्या में थे पर फांसी का समय आगे बढ़ा दिया गया. उन्हें रावी नदी के तट पर आनन् फानन में जला दिया गया. पर भगत सिंह को ख़त्म करना अँगरेज़ प्रशासन के बस में नहीं हो पाया। विचार मर नहीं पाते, इंसान ख़त्म कर दिए जाते हैं. भगत सिंह 88 साल के बाद भी क्रांति की जलती मशाल हैं. वे भारत के चे गुवारा हैं. जिस तरह पूंजीवाद ने अपने कट्टर दुश्मन चे से जंग छेड़ने के बाद भी चे की मार्केटिंग की, उन्हें एक ब्रांड बनाकर पेश किया और प्रॉफिट में बदल दिया. भले चे के विचारों का पूंजीवादी दुनिया विरोधी रही, पर पूंजीवाद ने चे की मेमोरी को जीवित रखने में अपनी भूमिका निभायी। ठीक उसी तरह जिस तरह पूंजीवाद ने अपने सबसे बड़े बौद्धिक चैलेंजर मार्क्स को याद रखा सम्मान के साथ.

आज भगत सिंह की लिगेसी को हडपने की एक होड़ लगी है. कांग्रेसी उन्हें अपना समझते हैं, पर भगत सिंह कांग्रेसी नहीं थे. वे नौजवान भारत सभा के संस्थापक थे. भगत सिंह को अपना बताने की ललक संघ में है, पर भगत सिंह संघ की संकीर्ण सोच के कभी पैरोकार नहीं रहे. भगत सिंह कच्ची उम्र में ये समझ गए थे कि देश में सामजिक क्रांति हिंसा के रास्ते नहीं आएगी, हालाँकि अन्याय का प्रतिकार करने के लिए, लाला लाजपत राय के हत्यारे को सजा देने के लिए उन्होंने और उनके साथियों ने बन्दूक उठायी थी.

भगत सिंह अगर जीवित रहते, तो आने वाले दिनों में वे बहुत बड़े किसान नेता बनते, ऐसा इतिहासकार बिपन चंद्र की राय है. आज़ाद भारत में वे कांग्रेस के समानांतर एक बेहद पावरफुल वॉइस हो सकते थे. लोहिया की तर्ज पर. आंबेडकर की तर्ज पर ( हालाँकि आंबेडकर आज़ाद भारत में ज्यादा नहीं जी सके). ऐसे में देश का पोलिटिकल डिस्कोर्स रिच हो सकता था.
पर भगत सिंह की शहादत ने उन्हें एवर यंग रेवोलूशनरी की रोमांटिक छवि दी, च गुएवारा की तरह, विवेकानंद की तरह.

भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं !!


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