World Happiness Report, 2019: केवल जीडीपी से हैप्पीनेस नहीं मिलती

रश्मि झा

Sustainable Development Solution Network द्वारा World Happiness Day के अवसर पर विगत 20 मार्च को World Happiness Report, 2019 जारी किया गया है, जिसके अंतर्गत 156 देशों के बीच उनमे रहने वाले नागरिकों के हैप्पीनेस के स्तर के अनुसार अलग अलग रैंकिंग की गयी है. खुशियों की यह रैंकिंग GDP per capita, social support, Life expectancy, freedom to make choices, generosity एवं corruption level जैसे अलग-अलग factors के एक composite index के आधार पर होती हैं . रिपोर्ट बताता है कि सूची के top 5 देशों में 4 देश (Finland, Denmark, Norway एवं Iceland ) Nordic countries हैं.

चौकाने वाली बात यह है कि इसमें शीर्ष स्थानों पर जीडीपी रैंक 1, 2 या 3 वाले देश हैं ही नहीं. उत्सुकता हुई तो कुछ आयामों जैसे GDP, Happiness scores एवं सरकार में महिलाओं की सहभागिता के आधार पर आंकड़ों का विश्लेषण किया. सरकार में महिलाओं की सहभागिता को शामिल करने का मेरे दृष्टिकोण का आधार वैसे शोध हैं जो बताते हैं कि यदि निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाये तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है, यह ‘हैप्पीनेस’ का एक बड़ा संकेतक है.

पहले स्थान पर आये Finland में नागरिकों के लिए Social safety, व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं उनके कार्य एवं जीवन में संतुलन बेहतर है. महत्त्वपूर्ण बात यह है की इसकी GDP ranking 1 या 2 नहीं बल्कि 45 है, साथ ही वहां सरकार में महिलाओं की सहभागिता 42 है. लगभग यही स्थिति सूची के अन्य 4 देशों (Denmark, Norway, Iceland एवं Netherlands) की भी है जिनकी जीडीपी रैंकिंग क्रमशः 36, 28, 105 एवं 17 है तथा एवं महिलाओं की सहभागिता क्रमशः 37.4, 41.4, 38.1 एवं 36 % है.

वहीँ एक दूसरा पक्ष यह भी है की जीडीपी रैंकिंग में शीर्ष पर शामिल देश US का हैप्पीनेस इंडेक्स, 2019 में 19वें स्थान पर है तथा यहाँ सरकार में महिलाओं की सहभागिता 19.6 है.

हम कहाँ हैं?

आइये, अब जरा अपने देश की स्थिति पर गौर करें. भारत जीडीपी रैंकिंग में 5वें तथा हैप्पीनेस इंडेक्स में 140वें स्थान पर है, जबकि यहाँ सरकार में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का प्रतिशत मात्र 11.8% है. इन देशों की आर्थिक प्रगति भले ही जो बयां कर रही हो, परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि अभी भी निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं है. यह एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है इस देश को हैप्पी बनने की दिशा में.

‘हैप्पीनेस’ का इस प्रकार का विश्लेषण एक कोशिश है इस ओर इशारा करने  की कि केवल जीडीपी हैप्पीनेस के लिए आवश्यक नहीं है.  Gender Equality एवं Happiness के बीच एक interesting correlation है. देश ‘हैप्पी’ तब होगा जब संसाधनों तक सबकी पहुँच एवं नियत्रण तक की खाई पटेगी और निर्णय लेने वाले positions पर हरेक वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा.

रश्मि झा यूनिसेफ बिहार की कंसलटेंट हैं और लम्बे समय से महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर लिखती रही हैं.


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