देश विभाजन का सच और गांधीजी की व्यथा

मुकुटधारी अग्रवाल

गांधी जी ने देश के विभाजन का कडा विरोध किया था और कई अवसरो पर उन्होने देश विभाजन के खिलाफ अपनी राय व्यक्त की थी लेकिन काँग्रेस के नेताओ ने उनकी बात को अनसुनी कर, माउंटबेटेन के देश विभाजन के प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति दे दी. देश बँटवारे को उस समय कांग्रेस के सबसे बड़े नेता जवाहरलाल नेहरूऔर सरदार पटेल का पूरा समर्थन था.

काँग्रेस के एक बड़े नेता नरहरि विष्णु गाडगिल के अपनी पुस्तक “सत्ता का सच” मे इस तथ्य को उजागर किया है. उन्होने लिखा है –“भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस देश मे मुख्य राजनेतिक शक्ति थी किन्तु नेता थके और बूढ़े हो चले थे. ये लोग पिछले 40 वर्षो से निरंतर संघर्ष के परिणामो के प्रति निश्चित रूप से आश्वस्त नहीं थे और न ही इस बात से आश्वस्त थे कि आगे की नियति क्या है? अब वे और अधिक बातों को खींचना नहीं चाहते थे, इस ड़र से कि कहीं डोरी टूट ही न जाए और सब कुछ नष्ट न हो जाए. इस लिए पुराने और बहादुर स्वतन्त्रता सेनानी अपना सब कुछ दाव पर लगाने के बजाय सम्झौता करने मे ज्यादा उत्सुक थे.”

भारत बँटवारे की योजना को काँग्रेस ने 15 जून 1947 मे अपनी बैठक मे स्वीकार कर लिया था. उस बैठक मे गांधीजी भी उपस्थित थे.

डॉ लोहिया ने “गिल्टीमेन आफ पार्टिशन” पुस्तक मे लिखा है कि गांधी ,सरहदी गांधी ,जय प्रकाश और मैं –चारो ने विभाजन का विरोध किया। अन्य किसी ने विभाजन के विरोध मे कुछ भी नहीं कहा. वे आगे लिखते है –“इस सभा की चर्चा मे गांधीजी ने शिकायत भरे स्वर मे कहा था विभाजन की मंजूरी देने के पहले नेहरू और पटेल ने मुझे उसकी कोई जानकारी नहीं दी. गांधीजी की अपनी बात पूरी होने के पहले ही नेहरू उत्तेजित हो कर बोले कि समय समय पर गांधीजी को सारी जानकारी दी जाती थी. गांधीजी ने फिर कहा कि विभाजन बिषयक जानकारी मुझे पहले किसी ने नहीं दी तब नेहरू ने शब्द बदल कर कहा कि गांधीजी उस समय नोवाखाली मे थे इसलिए योजना का सारा व्योरा उन्हे नहीं बताया गया था.“

काँग्रेस के नेताओ ने आज़ादी मिलने के पहले से ही गांधीजी की सलाह की उपेक्षा शुरू कर दी थी. डीजी तंदुलकर ने  “महात्मा –खंड” मे लिखा है कि उस बैठक मे गांधीजी ने कहा था कि काँग्रेस के नेताओ ने विभाजन की स्वीकृति दे दी है अतः उनके शब्दो की लाज रखने के लिए काँग्रेस भी उसे मान्यता दे दे.” वह मीटिंग यह भी संकेत दे गया कि गांधीजी कुछ बड़े कोंग्रेसी नेताओ की नज़र मे अनुपयोगी हो गए थे और उनकी राय की कोई अहमियत नहीं रह गयी थी.

लेखक गिरिराज किशोर अपनी पुस्तक “सप्तपर्णी”मे लिखते हैं –मीटिंग से बाहर आते हुए गांधीजी ने आचार्य जुगल किशोर (जो उस समय काँग्रेस के महासचिव थे ) को कहा कि मैं जानता हूँ कि आप लोग शक्ति का स्वप्न देख रहे हैं. अब मेरे जिंदा रहने का कोई अर्थ नहीं है. पहले मे सोंचता था कि मे कुछ और जीऊँ पर अब मेरा चला जाना ही अच्छा है. ”

गांधीवादी श्री श्रीमन नारायण ने स्वर्गीय जमनालाल बज़ाज़ की पुस्तक “बापू के संस्मरण” मे लिखा है –“गांधीजी ने उनसे कहा था कि मैंने अनिचछा और बड़े दुख के साथ अखिल भारतीय काँग्रेस कमिटी की कार्यसमिति के भारत विभाजन निर्णय को पुष्ट करने की राय दी थी क्योकि मे काँग्रेस के टुकड़े टुकड़े नहीं होने दे सकता था.“ गांधीजी भारत विभाजन को लेकर इतने दुखी थे कि उन्होने कोंग्रेसियो को यहाँ तक कह डाला कि आप लोग मुझे अपने स्वार्थ रक्षा के लिए मार भी सकते हैं. बाद मे इस बात की पुष्टि “ए पोर्ट्रेट आफ प्रेसिडेंट”पुस्तक मे प्रकाशित राजेंद्र प्रसाद द्वारा 31 जनवरी 1957 को लिखे पत्र से हुई है जिसमे उन्होने लिखा है कि गांधीजी ने उनसे कहा था –“मैं जानता हूँ कि एक बार तुम लोगो के हाथो मे शक्ति आ गयी तो तुम लोग मुझे बरदास्त नहीं करोगे और हो सकता है कि तुम लोग मुझे गोली भी मार दो.” गांधीजी ने एक बार कहा कि आज तक सरदार (पटेल) मेरी हर बात मानते थे पर अब सरदार मेरी बात पर ‘जी हाँ’ नहीं कहते ,वे स्वमभू हो गए हैं.

पुराने कोंग्रेसी श्री श्रीप्रकाश ,जो उस समय पाकिस्तान मे भारत के उच्चायुक्त थे, ने अपने संस्मरण मे लिखा है –‘3 जनवरी 1948 को दिल्ली मे मैं गांधीजी से मिला था. 27 दिन बाद उनकी हत्या हो गई. उस दिन पाकिस्तान संबंधी बहुत –सी बातें करते हुये गांधीजी ने मुझसे कहा कि’ मेरे जीवन का सारा काम मिट्टी मे मिल गया. “ गांधी जी के हृदय मे उस समय बड़ी व्यथा थी.

प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक रामानन्द मिश्र ने अपनी पुस्तक “गांधीजी के संस्मरण” मे गांधीजी के साथ हुई अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए लिखा है कि गांधीजी ने उनसे कहा था –“पहले लोग मुझे शतरंज के खेल का फर्जी या बादशाह मानते थे ,अब मे उनकी नज़र मे साधारण प्यादा बन गया हूँ. मुझे ये लोग निकम्मा मानने लगे हैं. जिनके हाथ मैंने हिंदुस्तान का राज्य दे दिया ,उन्हे उस आसन से उतार दूँ ,इसका साहस नहीं जूटा पा रहा हूँ.“

जनवरी 1948 के प्रथम सप्ताह मे  पुरषोतम त्रिकम दास गांधीजी से मिले, तब गांधीजी ने उनसे कहा कि” सरदार खुद को मेरा शिष्य समझते हैं. जवाहरलाल अपने को मेरा बेटा मानते हैं. दोनों मुझे पागल समझ रहे हैं. मेरी कोई सुनता नहीं। मैं अकेला पड गया हूँ.”

गांधीजी सचमुच अपने सहयोगी कोंग्रेसी नेताओ के बदलते स्वभाव से बहुत निराश थे. हालाँकि देश विभाजन के साथ नरसंहार का जो दौर शुरू हो गया और जिसमे दोनों देशों के लगभग 20 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई, इसका अंदेशा न कांग्रेस के नेताओं, न मुस्लिम लीग के नेताओं और न ही ब्रिटिश वाइसराय लार्ड माउंट बेटन को था.


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