हाॅट सीट बना नवादा, भूमिहार और यादवों के बीच टक्कर, जानें कौन हैं एनडीए प्रत्याशी चंदन कुमार

लोक सभा चुनाव के लिए चुनावी बिसात बिछ गयी है. बिहार में पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को है. इस चरण में चार लोकसभा सीटों पर मतदान होगा, गया, नवादा, जमुई और औरंगाबाद. पहले चरण के मतदान में जिस सीट को लेकर सबसे ज्यादा रार छिड़ा है, वह है नवादा. नवादा सीट से भाजपा के गिरिराज सिंह सांसद हैं, लेकिन पार्टी ने इस बार उन्हें नवादा से नहीं बल्कि बेगुसराय से टिकट दिया है.

सीट बदलने को लेकर गिरिराज सिंह ने नाराजगी जतायी है और कहा है कि उनका स्वाभिभान आहत हुआ है क्योंकि प्रदेश नेतृत्व ने उन्हें सीट बदलने से पहले उन्हें काॅन्फिडेंस में नहीं लिया. गिरिराज सिंह तो इतने नाराज हैं कि बेगुसराय से चुनाव लड़ने से भी मना कर चुके हैं. वहीं राजनीति के जानकारों का मानना है कि गिरिराज सिंह अच्छे से जानते थे कि उनका सीट बदला जायेगा, लेकिन कब क्या बोलकर खुर्खियों में रहना है, उन्हें अच्छे से पता है. वे अपनी नाराजगी से खुद को सेफ कर रहे हैं, चुनाव तो वे लड़ेंगे ही, लेकिन बेगुसराय से हार या कम अंतर से जीत के लिए वे खुद को नहीं पार्टी को जिम्मेदार ठहराना चाहते हैं.

नवादा सीट पर किसके बीच होगा मुकाबला
नवादा सीट इस बार एनडीए की ओर से लोजपा के खाते में गयी है. जहां सूरजभान सिंह के सबसे छोटे भाई चंदन कुमार सिंह को टिकट दिया गया है. पहले ऐसी चर्चा थी कि सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा सिंह को टिकट दिया जायेगा, लेकिन ऐन वक्त पर चंदन कुमार ने अपना कद दिखा दिया और वे वीणा सिंह पर भारी पड़ गये. चंदन कुमार के सामने या यूं कहें कि उन्हें टक्कर देने के लिए महागठबंधन ने राजवल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी को उतारा है. नाबालिग से राजवल्लभ को रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली है. वे पार्टी से निलंबित हैं और उनकी विधान सभा की सीट भी खाली हो गयी है. पर इलाके में राजबल्लभ यादव का वर्चस्व है. ऐसे में राजद ने राजबल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी को टिकट दिया है. तो एक तरफ लोजपा के उम्मीदवार और मोकामा क्षेत्र के बाहुबली सूरजभान सिंह के भाई चन्दन कुमार हैं, तो दूसरी ओर महागठबंधन की ओर से विभा देवी राजद उम्मीदवार हैं. कुल मिलाकर नवादा में बाहुबलियों की जंग है इस बार .

चंदन कुमार पेशे से काॅट्रेक्टर हैं और रियल स्टेट की दुनिया में उनका बड़ा नाम है. बताया जा रहा है कि रांची से उनका बहुत खास संबंध है, क्योंकि वे रांची के डाॅन अनिल शर्मा के दामाद हैं.

नवादा सीट का इतिहास
पिछले दो चुनावों से नवादा सीट पर भाजपा का दबदबा रहा है. वर्ष 2009 और 2014 में यहां से भोला सिंह और गिरिराज सिंह ने जीत दर्ज की थी. 2002 के परिसीमन से पहले यह एससी रिजर्व सीट था, जहां सबसे पहले कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी.यहां कुल मतदाताओं की संख्या 18 लाख 92 हजार 17 है.

क्या है जातीय समीकरण
नवादा सीट पर भूमिहारों का वर्चस्व बताया जाता है. परिसीमन से पहले यहां दलित वोटर्स की चलती थी, लेकिन अब इस सीट पर यादव और भूमिहारों का दबदबा है. यही कारण है कि एक भूमिहार के खिलाफ राजद ने यादव को उतारा है.

पिछले तीन दशकों से इलाके में राजबल्लभ यादव का वर्चस्व रहा है

1990 में जब लालू यादव के बिहार के मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा आया तो उस समय जनता दल को  बिहार में विधानसभा में बहुमत जुटाने के लिए 10 सीटें कम पड़ रही थीं. बीजेपी के पास 39 विधायक थे. एक विधायक कृष्णा यादव पार्टी को तोड़ते हुए 10 विधायकों के साथ जनता दल में शामिल हो गए. कृष्णा यादव की बदौलत लालू यादव की सरकार बन गई. राजबल्लभ यादव इन्हीं कृष्णा यादव के छोटे भाई हैं.

कृष्णा यादव नवादा जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के इंग्लिश पथरिया गांव के रहने वाले थे. उनके पिता जेएल प्रसाद कांग्रेस के नेता थे  और कांग्रेस से जिला परिषद अध्यक्ष बने थे. उनके बेटे कृष्णा प्रसाद बीजेपी से विधायक बन गए. बीजेपी से जनता दल में जाने के बाद कृष्णा प्रसाद को लालू यादव का अच्छा खासा सपोर्ट मिला. नवादा के एक वरिष्ठ पत्रकार उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि कृष्णा प्रसाद विधायकी करते रहे. उनके एक भाई मुखिया बन गए और एक भाई राजबल्लभ घर पर रहने लगे. कहा जाता है कि राजनैतिक संरक्षण मिला तो राजबल्लभ ने अपने घर के पास पत्थर के पहाड़ से अवैध तरीके से पत्थर बेचने शुरू कर दिए. इससे उन्होंने करोड़ों रुपये कमाए. कृष्णा प्रसाद विधायकी का एक टर्म भी पूरा नहीं कर सके कि एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद लालू ने कृष्णा यादव  की पत्नी को एमएलसी बना दिया, हालाँकि राजबल्लभ को विधानसभा का टिकट नहीं मिला. ऐसे में राजबल्लभ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर  चुनाव में उतर गए. आयोग की ओर से छाता चुनाव चिह्न मिला और जीत गए. 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू ने राजबल्लभ को नवादा से टिकट दिया और राजबल्लभ यादव जीत गए. फिर लालू ने उनको मंत्री भी बनाया.

2005 में जब लालू यादव की सत्ता गई तो राजबल्लभ भी चुनाव हार गए. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने नवादा के पहाड़ का लीज एग्रीमेंट कर दिया. पत्थर निकालने के लिए चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी ने लीज ली और काम शुरू किया. लेकिन राजबल्लभ यादव का ऐसा रूतबा था कि  पत्थर लेकर निकल रही कंपनी की गाड़ियों से रंगदारी वसूलते रहे. नतीजा ये हुआ कि चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी ने लीज छोड़ दी. 2010 में एक बार फिर विधान सभा चुनाव  हारे. तब इस सीट पर जीत मिली थी जदयू उम्मीदवार पूर्णिमा यादव को . 2015 में महागठबंधन बना और जदयू, राजद और कांग्रेस ने हाथ मिलाया. इसका फायदा राज बल्लभ को मिला.  राजबल्लभ फिर से चुनाव जीतकर विधायक बन गए. 2016 में रेप केस दर्ज हुआ और 2018 में कोर्ट ने उसको रेप का दोषी पाया है.


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