JMM के गढ़ दुमका से शिबू सोरेन एक बार फिर जीतेंगे या उन्हें इस बार चुनौती मिलेगी?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

19 मई को दुमका लोकसभा चुनाव में वोटिंग के लिए तैयार हो रहा है. झारखंड के लोकसभा क्षेत्रों की बात की जाये, तो सबकी नजर जिस सीट पर सबसे पहले जाकर टिकती है वो है दुमका. दुमका संसदीय क्षेत्र झारखंड के करिश्माई व्यक्तित्व दिशोम गुरु शिबू सोरेन का क्षेत्र है और यह सीट झारखंड मुक्ति मोरचा का गढ़ माना जाता है. आजादी के बाद से लेकर अभी तक इस सीट पर झामुमो का वर्चस्व रहा है और कोई भी पार्टी इस सीट पर शिबू सोरेन को टक्कर देने में संकोच करती है. मोदी की लहर में भी शिबू सोरेन को उनके गढ़ में चुनौती देना आसान नहीं रहा है. शिबू सोरेन यहां से आठ बार सांसद रह चुके हैं. उन्हें यहां से हराने का दुस्साहस एकमात्र नेता बाबूलाल मरांडी ने किया और वे सफल भी हुए. दुमका संसदीय क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व सीट है. इस सीट के अंतर्गत पूरा जामताड़ा जिला, दुमका और देवघर के कुछ हिस्से भी आते हैं. दुमका लोकसभा क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है और नक्सली प्रभावित भी है.

शिबू सोरेन आठ बार रहे हैं सांसद
2009 के लोकसभा चुनाव में यहां से शिबू सोरेन ने 208367 वोट पाकर जीत दर्ज की थी. शिबू सोरेन के बाद सबसे अधिक बीजेपी के सुनील सोरेन को 189279 वोट मिले. वहीं, 2014 लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन को 335686 वोट मिले. शिबू सोरेन के बाद बीजेपी के सुनील सोरेन को 296493 वोट मिले थे.

दुमका संसदीय क्षेत्र से शिबू सोरेन आठ बार सांसद रहे हैं. वे पहली बार यहां से 1980 में चुनाव जीते थे. 1952 में यहां से सांसद रहे थे पाॅल सोरेन, वे कांग्रेस की टिकट पर जीतकर आये थे, उस वक्त यह सीट पूर्णिया-संताल सीट के नाम से जाना जाता था. 1957 में यहां से झारखंड पार्टी के देबी सोरेन जीते, फिर 1962 में कांग्रेस के एससी बेसरा, 1967 और 1971 में भी देबी बेसरा ही यहां से कांग्रेस की टिकट पर जीते. इमरजेंसी का असर इस सीट पर दिखा और 1977 में यहां से जनता पार्टी के हेमब्रम बटेश्वर जीतकर आये. उसके बाद 1980 से यहां शिबू सोरेन का युग शुरू हुआ जो आजतक चल रहा है. बीच में 1984 में कांग्रेस के पृथ्वीचंद किस्कू, जीते और 1998 और 1999 में भाजपा की लहर में झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने उन्हें शिकस्त दी. इसके अलावा 1989, 1991, 1996, 2002, 2004, 2009 और 2014 में यहां से शिबू सोरेन ही सांसद चुने गये.

शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. पहली बार वो 2005 में 10 दिन (2 मार्च से 12 मार्च) के लिए, फिर दूसरी बार 2008 से 2009 तक और तीसरी बार 2009 से 2010 तक के लिए सीएम के पद पर रहे. वह यूपीए सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री भी रह चुके हैं.

छह विधानसभा क्षेत्र हैं

झारखंड अलग राज्य का गठन वर्ष 2000 में हुआ, उसके बाद से आजतक इस सीट पर शिबू सोरेन ही सांसद हैं उन्हें कोई हरा नहीं सका है. इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं जिनके नाम हैं-शिकारीपाड़ा, नाला, जामताड़ा, सारठ, दुमका और जामा. इस निर्वाचन क्षेत्र में जम्तारा जिले का पूरा भाग, दुमका और देवघर जिले के कुछ हिस्से आते हैं. साल 2000 में बिहार के एक हिस्से से बने दुमका जिले का मुख्यालय दुमका शहर में हैं. इस लोकसभा सीट में छह विधानसभा सीटें शिकारीपाड़ा (एसटी), जामताड़ा, दुमका (एसटी), नाला, सारठ और जामा (एसटी) आती है. 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान झामुमो ने चार सीटों (शिकारीपाड़ा, नाला, सारठ, जामा), बीजेपी ने एक सीट (दुमका) और कांग्रेस ने भी एक सीट पर (जामताड़ा) जीत दर्ज की थी.

सामाजिक समीकरण
दुमका लोकसभा सीट पर आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग के वोटरों का दबदबा है. इस सीट पर 40 फीसदी आदिवासी, 40 फीसदी पिछड़ी जातियां और 20 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं. आदिवासी और अल्पसंख्यक वोटरों को झारखंड मुक्ति मोर्चा का परंपरागत वोटर माना जाता है. इसी वजह से शिबू सोरेन लगातार जीत रहे हैं. इस सीट पर मतदाताओं की संख्या 12.47 लाख है, इसमें 6.46 लाख पुरुष और 6 लाख महिला मतदाता शामिल है. झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दुमका में बहुत ज्‍यादा होर्डिंग नहीं लगाए हैं और पार्टी के पोस्‍टर भी बहुत कम दिख रहे हैं. गुरुजी अपने राजनीतिक करियर के ढलान पर हैं लेकिन अपनी पार्टी की राजधानी में उसके एकमात्र संरक्षक हैं. शिबू सोरेन कहते हैं, ‘यहां पर मोदी हमारा कुछ नहीं कर सकते हैं. चुनाव की तैयारी के लिए एकमात्र तरीका यह है कि लोगों के बीच जाओ और उनसे मुलाकात करो. और कुछ भी महत्‍वपूर्ण नहीं है.’ चुनावी राजनीति को अलविदा कहने के सवाल पर सोरेन कहते हैं, ‘जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक चुनाव लड़ता रहूंगा.’

सोरेन के खिलाफ बीजेपी ने सुनील सोरेन को टिकट दिया है. इस बार भाजपा ग्रामीण इलाकों में प्रचार में अपनी ऊर्जा लगा रही है. युवाओं के बीच सुनील सोरेन लोकप्रिय हैं, खुद मुख्यमंत्री रघुबर दास पूरी ऊर्जा झोंक रहे हैं. पर शिबू सोरेन इन चीजों से परेशां नहीं दिखते और सुनील सोरेन के बारे में कहते हैं, सुनील अपना ही बच्चा है. पिछले चुनाव में गुरुजी मात्र 39 हजार वोटों से जीते थे. शिबू सोरेन को 3 लाख 35 हजार 815 वोट मिले थे, जबकि भाजपा उम्मीदवार सुनील सोरेन को 2 लाख 96 हजार 785 वोट. तीसरे स्थान पर रहे बाबूलाल मरांडी को 1 लाख 58 हजार 122 वोट मिले. पर इस बार बाबू लाल मरांडी दुमका से चुनावी मैदान में नहीं हैं. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि आदिवासी और अनुसूचित जातियों के वोटों का बिखराव नहीं होगा और ये मतदाता एक बार फिर से “गुरूजी” के पक्ष में गोलबंद होंगे. संथाल क्षेत्र में वोट या समाज से जुड़ा फैसला ग्राम सभाएं करती हैं. यही शिबू सोरेन की ताकत है. भाजपा अभी तक इसकी काट नहीं खोज नहीं पाई है.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.