कैलाश मान सरोवर यात्रा के दुर्गम पथ पर…

Er S D Ojha

बात उन दिनों की है जब मैं 24वीं वाहिनी भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल मिर्थी में सहायक सेनानी ( अभियन्ता ) के पद पर तैनात था . उस समय सेनानी श्री टेक चंद थे . साल में दो बार अग्रिम चौकियों का भ्र्मण करना हर अधिकारी के लिए जरूरी था . जून/जुलाई का महीना होगा . मैने सोचा कि अभी एक विजिट कर लेता हूँ . क्योंकि अगस्त के महीने में चंडीगढ़ के डॉ से मैंने अपॉइंटमेंट ले रखी थी . पत्नी के पित्त की पथरी का ऑपरेशन करवाना था . मैंने सेनानी महोदय को वस्तुस्थिति से अवगत कराया और यात्रा आरम्भ की . मेरे साथ तत्कालीन इंस्पेक्टर / इंजीनियर श्याम लाल नेगी भी थे .

मांगती नाला तक हम गाड़ी से गए . वहाँ से शुरू हुई पैदल रोमांचकारी यात्रा . एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ उफनती हुई काली नदी . काली नदी के शोर की वजह से कुछ भी सुनाई नहीं देता था . हल्की हल्की बारिश हो रही थी . रास्ता फिसलन भरा था . हम सम्भल सम्भल के कदम रख रहे थे . जरा सी चूक हमें काली नदी का ग्रास बना सकती थी . मुझे सवारी व सामान के लिए दो घोड़े मिले थे . एक घोड़े पर सामान था . दूसरा घोड़ा खाली हीं चल रहा था . नेगी साहब ने मुझे कई बार घोड़े पर बैठने के लिए कहा , लेकिन मैंने विनम्रता से मना कर दिया . जगह जगह रास्ते में कैलाश मान सरोवर के यात्रियों से हमारी मुलाकात हो जाती थी . वे ॐ नमः शिवाय मन्त्र उच्चारण के साथ मेरा अभिवादन करते .
मैं भी उसी जोश खरोश के साथ उनके अभिवादन का प्रत्युत्तर देता . मुझे आश्चर्य हो रहा था कि बृद्ध , औरतें व जवान सभी के सभी शिव के नाम पर उस दुर्गम रास्ते पर बढ़े चले जा रहे थे . खरामा खरामा हम लखनपुर होते हुए मालपा पहुँचे .

यह वही मालपा था , जहाँ पर 18 अगस्त सन् 1998 की रात्रि में सोये हुए यात्री , कुली , स्थानीय दुकानदार( कुल 225 लोग) पहाड़ खिसकने से उसमें दबकर काल कवलित हो गए थे . मैंने उस पहाड़ के मलबे को हिकारत से देखा , जिसने 225 जिंदगियों को मौत में तब्दील कर दिया था . और विधना के उस क्रूर विधान को भी जम कर कोसा . इसी मलबे में दबकर अभिनेता कबीर बेदी की पत्नी व प्रसिद्ध नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी की भी इह लीला समाप्त हो गई थी . भारत तिब्बत सीमा पुलिस का भी यहाँ कैम्प था , जिसमें मात्र 6 जवान थे . वो थोड़ा अलग हट के थे इसलिए बच गए . उन 6 जवानों ने काफी परिश्रम से कुछ लाशें निकाली थीं , जिसमें प्रोतिमा बेदी की लाश भी थी . अचानक काली नदी का जल स्तर ऊँचा उठा और सारी की सारी लाशें बह गईं .
अब मालपा में दुकानें खुल गईं थीं . मालपा फिर जीवन्त हो उठा था . हमने वहीँ एक दूकान पर चाय पी और फिर अपने गन्तब्य की तरफ बढ़ चले .

मालपा से अब भारत तिब्बत सीमा पुलिस का कैम्प लामारी शिफ्ट हो चुका था . मालपा से लामारी पहुँचने में एक घण्टा लगा . वहाँ पहुँच कर हमने हाथ मुँह धो कर , चाय पी कर और अल्प विश्राम के उपरान्त अगले पड़ाव की तरफ चल पड़े . खाने की इच्छा नहीं थी , क्योंकि अब मैं काफी थक गया था . घोड़े पर बैठने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं था . घोड़े पर बैठा . उबड़ खाबड़ रास्ते पर घोड़ा चल पड़ा . काली नदी के पाट चौड़े होने के साथ साथ रास्ता भी चौड़ा हो गया था . अब रास्ता उतना दुर्गम नहीं था . रास्ते में हमें दो विदेशी जवान लम्बे तगड़े ,गोरे चिट्टे मिले जो छोटा कैलाश की यात्रा सम्पन्न करके वापस आ रहे थे . तीन घण्टे में हम बुद्धि कैम्प पहुँच गए . वहाँ कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के गेस्ट हाउस में कैलाश मान सरोवर यात्री ठहरे हुए थे . मैं अपने जवानों के साथ ठहर गया . जवानों को मलाल था कि वे मुझे गेस्ट हाउस में नहीं ठहरा सके . वे गेस्ट हाउस के चौकीदार को इसके लिए दोषी मान रहे थे .

अगले दिन हम नाश्ता करने के उपरान्त छियालेख की दुर्गम कठिन चढ़ाई चढ़ते हुए गर्ब्यांग अग्रिम चौकी पर दोपहर तक पहुँच गए . यहाँ की जमीन एक ग्लेशियर पर स्थित है , जिसके कारण मिट्टी खिसक रही है और गाँव वालों के घर टेढ़े हो गिरने के कगार पर हैं . भारत सरकार ने इन्हें टनकपुर , पिथौरागढ़ में मुआवजे के तौर पर जमीन दे रखी है , पर अपनी मिट्टी से ये इतने गहरे जुड़े हैं कि अभी तक टनकपुर शिफ्ट नहीं किये हैं . वहाँ हमें श्री नेगी ने एक सरोज नाम की ऐसी लड़की से मिलवाया , जो इसलिए शादी नहीं कर रही थी कि शादी हो जाने पर उसकी माँ की देख भाल कौन करेगा . हमारे DIG श्री एन . के . मिश्रा ने उस लड़की के त्याग व तपस्या को देखते हुए उस पूरी घाटी को सरोज घाटी नाम देने का विचार किया था . उस लड़की में इतनी जीवटता थी कि बर्फ पड़ने पर भी हमारे जवानों की हर जरूरत की चीजें 15 – 15 km पैदल चल कर मुहैया कराती थी . मैंने मन ही मन उसके जज्बे को सलाम किया . गर्ब्यांग में रात्रि विश्राम और सुबह गुंजी अग्रिम चौकी के लिए प्रस्थान किया .

गुंजी के रास्ते में हमें कुछ बच्चे नए नए परिधान पहने जाते हुए मिले . पूछने पर पता चला कि वे कुट्टी गाँव में लगे कुम्भ मेले में शामिल होने जा रहे हैं . मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि इस वीराने में भी कुम्भ मेले का अस्तित्व है . कहते हैं कि महाभारत के रचयिता वेद व्यास ने इसी रास्ते से कैलाश मान सरोवर की यात्रा की थी . उन्होंने ही यहाँ पर कुम्भ मेले की शुरआत कराई थी . यहाँ के लोगों को खेती का ज्ञान ब्यास जी ने हीं कराया था विशेषकर एक विशेष अनाज फाफर का . फाफर के आटे को घोलकर तवे पर फैला देते हैं . पकने पर यह रोटी बहुत हीं स्वादिष्ट होती है .बेद व्यास की वजह से हीं इस पूरी घाटी को व्यास घाटी कहा जाता है .

गुंजी गाँव के प्रवेश द्वार पर महात्मा गाँधी चौक लिखा था . इस बीहड़ में महात्मा गाँधी का नाम पढ़ कर सुखद आश्चर्य हुआ .उस चौक पर उस गाँव के गण्यमान बुजुर्ग बैठे थे . हमारे साथ गई एक लड़की ने उन सबको कई दिनों पुराने अखबार दिये . वह लड़की डाकिये की नौकरी कर रही थी ,जो गर्ब्यांग व गुंजी के बीच डाक का वितरण करती थी . दुर्गम क्षेत्र होने के कारण उस क्षेत्र में डाक व्यवस्था सुव्यवस्थित नहीं है ,जिस कारण डाक समय से नहीं पहुँच पाती है . उन पुराने अखबारों को देख कर उन बुजुर्गों के चेहरे पर जो ख़ुशी की चमक आई वह वर्णनातीत है . हमारी अग्रिम चौकी गुंजी जाने का रास्ता गुंजी गाँव से हो कर गुजरता है . गाँव में एक प्यारी सी लड़की मिली . उसने हँस कर मुझे नमस्ते की . मैंने शुगल के लिए उससे पूछा कि व्यास जी यहाँ कहाँ रहते थे ? . लड़की ने तपाक से कहा .. प्रधान जी के घर .

अग्रिम चौकी गुंजी पहुँच कर हमने थोड़ा विश्राम किया . वहाँ हमारे बरिष्ठ अधिकारी डॉ धर्मशक्तु थे . पता चला कि दोपहर का खाना कुमायूं मण्डल विकास निगम ने अरेंज किया है . मैं डाँक्टर साहब के साथ वहाँ जा के लंच किया और उनसे कुछ जग की कुछ घर की बातें शेयर की . तदोपरान्त हम शाम को अपने कमरे में आ गए . खाना गरिष्ट था . अतः रात के खाने की गुंजाइस नहीं थी . आया और सो गया .

सुबह नाश्ता करने के उपरान्त हम अगले पड़ाव काला पानी के लिए चल पड़े . साथ में वही दो घोड़े थे . वही हम दो – श्री नेगी और मैं . मैं यहाँ पर भी घोड़े पर नहीं बैठा . घोड़े की सम्भाल करने वाले लड़के बार बार रुक कर बैठने का अनुरोध कर रहे थे . अंततोगत्वा मुझे बैठना पड़ा . कुछ दूरी चलने पर मेरी पीठ में दर्द शुरू हो गया . मैंने उतरने में ही भलाई समझी . वैसे भी रास्ता काफी चौड़ा था और सघन पेड़ थे . पैदल चलना ही मुझे श्रेयस्कर लगा . काली नदी भी काफी दूरी पर बह रही थी . उन सघन पेड़ों में हम एक जगह विश्राम करने के लिए रुके . नेगी साहब ने एक पेड़ दिखा कर कहा – सर , इस पेड़ का नाम डॉ पेड़ है . इस बावत उन्होंने रोचक जानकारी दी . भारत तिब्बत सीमा पुलिस के एक डाक्टर साहब गुंजी में पोस्टेड थे . वे रोज शाम को घूमने निकलते थे . एक दिन घूमते घूमते शाम हो गई . डॉ साहब दिग्भर्मित हो गए . वो गुंजी आने की वजाय काला पानी की तरफ बढ़ चले . जब तक उनको आभास होता कि वो गलत रास्ते पर आ गए हैं तब तक काफी रात हो गई थी . डॉ साहब जंगली जानवरों से बचने के लिए पेड़ पर चढ़ गए . पेड़ पर जब सर्दी लगती तो नीचे उतरकर एक्सरसाइज करते और गर्मी पाकर फिर ऊपर चढ़ जाते . उधर काला पानी व गुंजी पोस्ट के बीच ITBP की सर्च पार्टी रात भर चलती रही . न उन्हें डॉ साहब मिले और न डॉ साहब को सर्च पार्टी . सुबह होने पर डॉ साहब पेड़ से उतरे और उन्हें सर्च पार्टी मिली . डॉ साहब को सकुशल गुंजी पोस्ट पर लाया गया .

विश्राम के बाद हम डॉ पेड़ को छोड़ आगे बढ़े और 2 बजे के करीब काला पानी पहुँच गए . काला पानी पोस्ट पर काली का मन्दिर है . इस मन्दिर के नीचे से हीं काली नदी निकलती है . काला पानी पोस्ट पर नेपाल अपना हक़ जताता है . एक बार इस पोस्ट पर नेपाली लड़के व लड़कियां नारे लगाते हुए आ गए थे , Indian Army go back . इसी पोस्ट के विपरीत पहाड़ी पर बहुत ऊँचाई पर हमने व्यास गुफ़ा देखा . बताते हैं कि उस गुफा में एक लोटा व रुद्राक्ष का माला पड़ा है . हमारे भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों ने वहाँ पहुँच कर लाल पताका फहराई है . उतनी दुर्गम चढ़ाई चढ़ना एक दुष्कर कार्य है . काला पानी पोस्ट पर हमारे इंजीनियरों ने एक माइक्रो हाइडिल प्रोजेक्ट लगाया है , जिससे मात्र रात को हीं विजली मिलती है .

काला पानी पोस्ट पर हमारे बरिष्ठ अधिकारी एम कुमार थे . रात को उनके व कैलाश मान सरोवर यात्रा के यात्रियों के साथ काली मन्दिर की आरती में भाग लिया और खाना खा के सो गया . सुबह उठा तो सिर भारी भारी सा हो रहा था . ITBP का मेडिक्स आया . High altitude के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ा था . मेडिक्स से दवाई ली और फिर सो गया . उठा तो फ्रेश महसूस कर रहा था . किन्तु M . कुमार सर ने आगे जाने से मना कर दिया . मुझे काला पानी से हीं लौटना पड़ा .

वाहिनी मुख्यालय पहुँच कर मैंने अपनी विजिट रिपोर्ट सेनानी श्री टेक चन्द को सौंपी . उनसे 30 दिन
की छुट्टी की गुजारिश की . सेनानी ( कमांडेंट ) सर ने 30 की वजाय 60 दिन की छुट्टी मंजूर कर दी . मेरे 32 साल की ITBP की नौकरी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि मैंने 30 दिन की छुट्टी मांगी और दुगनी छुट्टी 60 दिन की मिली . आज श्री टेकचन्द इस दुनियाँ में नहीं है . भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दें . छुट्टी मेरी निरापद कटी . पत्नी के पित्त की पथरी का भी सफल आप्रेसन हुआ . सब कुछ मंगल ही मंगल हुआ .

मेरे जुनूँ का नतीज़ा जरूर निकलेगा .
इस स्याह समन्दर से नूर निकलेगा .


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