गायब होती जा रही देहरादून बासमती की खूश्बू

Er S D Ojha

1839 में ब्रिटिश अफगानिस्तान का युद्ध हुआ था । वहां के शासक दोस्त मोहम्मद खान की बुरी तरह से हार हुई थी ।अंग्रेजों ने उनके पूरे कुटुम्ब को देश निकाला दे दिया । दोस्त मोहम्मद खान का पूरा कुटुम्ब देहरादून और मसूरी के इलाके में बस गया । वैसे तो इनको यहां की आबो हवा बहुत मन माफिक लगी , पर यहाँ के चावल से इनको संतुष्टि नहीं मिली । मजबूर होकर दोस्त मोहम्मद खान ने अफगानिस्तान से बासमती धान के बीज मंगवाए और उसे देहरादून की हसीन वादियों में बो दिया । ताज्जुब की बात यह हुई कि इस धान को यहाँ की मिट्टी रास आ गयी । जो बासमती की पैदावार हुई उसकी गुणवत्ता पहले की बनिस्बत और उम्दा हुई । जब यह चावल गांव के किसी एक घर में पकता तो पूरे गाँव को खबर हो जाती । इसकी खूश्बू पूरे गाँव की फिजा में फैल जाती ।

देहरादून बासमती की चर्चा पूरे भारत में होने लगी । व्यापारी आते । खड़ी फसल की बोली लगाते और धान पकने पर उसे खेत से हीं उठा ले जाते । एक समय ऐसा आया कि बासमती की फसल से पूरा इलाका महमह करने लगा । देहरादून के अतिरिक्त हरिद्वार, उधम सिंह नगर और नैनीताल में बासमती की बेशुमार खेती होने लगी । हर जगह इस बासमती को देहरादून बासमती हीं कहा गया । देहरादून बासमती अपने खास खुश्बू के लिए जाना जाने लगा । भारत इसका खास उत्पादक क्षेत्र था । नेपाल का तराई, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तक इसकी खूश्बू फैलने लगी । पकने के बाद इसके दाने आपस में चिपकते नहीं । सब दाने अलग अलग नजर आते हैं । यह मधुमेह के रोगियों के लिए गेहूँ के आटे से भी मुफीद होता है ।

देहरादून बासमती को हाईब्रीड करने के चक्कर में इसकी मूल पहचान खो गयी है । देहरादून बासमती की शुद्धता की पहचान करना केवल प्रयोगशाला में हीं सम्भव हो सकता है । आजकल निम्न कोटि के चावल को सेंटेड कर उस पर देहरादून बासमती का ठप्पा लगाकर बेचा जाने लगा है । इस चावल के उत्पादन में लागत ज्यादा आती है , मेहनत भी अधिक लगती है , पर उपज बेहद कम होती है । बासमती के तने लम्बे और पतले होते हैं और जरा सी हवा चलने पर ये जमीन पर लम्बे पड़ जाते हैं । ऐसे तने में दाने कम लगते हैं । पहले 2200 एकड़ में देहरादून बासमती की खेती होती थी । अब यह खेती सिमटकर केवल 190 एकड़ में रह गयी है । बासमती वाले खेतों पर अब कांक्रीट के जंगल भी उगने लगे हैं ।

किसान नकदी फसल के रुप में गन्ने को प्राथमिकता देने लगे हैं । बासमती की उपज कम होने के कारण अब उत्तराखंड सरकार ने बासमती धान के बीज पर सब्सिडी देना बंद कर दिया है । सरकार ने धान की अन्य किस्मों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है , जिनमें न्यूनतम पानी की जरुरत पड़ती है । देहरादून बासमती किसान अब खुद के खाने के लिए बोने लगे हैं । देहरादून बासमती कहीं और पनप नहीं पाता । यदि पनपता भी है तो वह स्वाद और सुगंध नहीं रह जाती । देहरादून बासमती की बात हीं कुछ और है , जो अफगानिस्तान से चलकर देहरादून में अपना रुतबा बुलंद किए हुए था । यह बासमती अपनी चमक अब खोने लगा है । दोस्त मोहम्मद खान के वंशज आज भी देहरादून की घाटी में बसते हैं, जो ” अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला ” की तर्ज पर देहरादून बासमती की घटते स्तर पर महती चिंता व्यक्त कर रहे हैं ।


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.