अल्सरेटिव कोलाइटिस के लक्षण और उपचार

Er S D Ojha

यह बड़ी आंत का रोग है , जो मलाशय से शुरु होकर बड़ी आंत के कुछ हिस्से से लेकर पूरी आंत में फैल जाता है । इस रोग के शुरुआत में पेट के निचले हिस्से में जलन होती है । डकार आती है । फिर मल के साथ खून और पस आने शुरु हो जाते हैं । ऐसा बड़ी आंत और मलाशय की बाहरी परत पर सूजन आने के कारण होता है । सूजन के कारण छाले भी पड़ जाते हैं । यही छाले जब फूटते हैं तो मल के साथ खून और मवाद आने लगते हैं । रोगी को बार बार शौच की हाजत होती है । किसी किसी को दस से बारह बार शौच जाना पड़ सकता है । यह रोग क्यों होता है ? इसका कारण अभी भविष्य के गर्त मे है । कुछ विशेषज्ञ एन्टी बायटिक दवाओं का इसका कारण बताते हैं तो कुछ तनाव को । वैसे अभी तक कोई स्पष्ट राय कायम नहीं हुई है , पर इतना तय है कि आंतों में एण्टी बाॅडीज तैयार होती हैं और वह अपने हीं शरीर के खिलाफ काम करना शुरु कर देती हैं । मल की दीवारों के परीक्षण से वहां ढेर सारे श्वेत रक्त कणिकाएं मिलीं हैं । ये रोग के खिलाफ न लड़कर रोग को और बढ़ाने में मदद करने लगतीं हैं ।

अल्सरेटिव कोलाइटिस की जानकारी के लिए कोलोनोस्कोपी करनी पड़ती है । बायोप्सी भी की जाती है ताकि पता चले कि कैंसर तो डेबलप नहीं कर रहा । दवाओं में स्टाराॅयड देना पड़ता है । यदि रोग गम्भीर किस्म का है तो स्टाराॅयड के 40 एम जी का डोज देना पड़ सकता है । शुरु में कम डोज का स्टाराॅयड दिया जाता है । अल्सरेटिव कोलाइटिस की अभी तक कोई माकूल दवा इजाद नहीं हुई है । इस रोग के हो जाने पर रोगी बहुत परेशान रहता है । वह हमेशा अवसाद में रहने लगता है । कई बार स्टाराॅयड के सेवन से एक डेढ़ साल तक खून व मवाद आना बंद हो जाता है । रोगी आराम महसूस करने लगता है , लेकिन यह बीमारी पुनः लौट आती है । अल्सरेटिव कोलाइटिस में दूध का सेवन बर्जित है । मसालेदार खाना खाने से भी बचना चाहिए ।

अल्सरेटिव कोलाइटिस में जब रोग गम्भीर रुप ले ले तो ऐसे में सर्जरी अंतिम विकल्प होता है । सर्जरी में बड़ी आंत और मलाशय को काटकर निकाल दिया जाता है । छोटी आंत के अंतिम सिरे से मलाशय का विकल्प तैयार किया जाता है । इसे जे पाऊच कहा जाता है । जे पाऊच का सम्बंध गुदा द्वार से जोड़ दिया जाता है । यह सर्जरी दो सिटिंग में पूरी की जाती है । बड़ी आंत व मलाशय निकालने के बाद पेट के ऊपरी हिस्से मे छेद कर मल निष्कासन का अस्थाई व्यवस्था की जाती है । एक पाऊच में मल इकट्ठा होता रहता है , जिसे समय समय पर साफ किया जाता है । जब सर्जन को लगता है कि भीतर का घाव और पेट खोलने का घाव ठीक हो गया है तो वह छः माह के बाद जे पाऊच का सम्बंध गुदा द्वार से जोड़ देता है और मल निष्कासन का अस्थाई व्यवस्था को भी बंद कर देता है ।

साल डेढ़ साल के बाद रोगी अपनी पुरानी रौ में लौट आता है । रोगी को खान पान में परहेज करना पड़ता है । उसे चिकनाई युक्त भोजन से बचना चाहिए । दूध के बदले में ज्यादा से दही का सेवन करना चाहिए । फल का भरपूर सेवन करना चाहिए । शौच की आवृति कम करने के लिए इमोडियम की एक गोली रोजाना लेना चाहिए । यदि कोई रोजाना 2-4 बार शौच जा रहा है तो इसे सामान्य माना जाना चाहिए । रोगी को प्रोटीन युक्त भोजन लेना चाहिए । समय समय पर खून की जांच करवाते रहना चाहिए । हीमोग्लोबीन की मात्रा कम होने पर अतिरिक्त आयरन की दवा लेनी चाहिए । ऐसे में बेल का शरबत बहुत फायदेमंद रहता है । वजन की जांच भी हर हफ्ते होनी चाहिए । अभी दवाओं पर शोध चल रहा है । हो सकता है कि कोई ऐसी दवा की खोज हो जाए कि अल्सरेटिव कोलाइटिस के लिए सर्जरी की आवश्यकता हीं नहीं हो ।


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