डोरंडा तब बडकागढ़ रियासत में था, रांची के इतिहास के गलियारों से …

यह वही रांची हैं, जहां एक ईसाई संत फादर कामिल बुल्के ने रामकथा लिखी। यह वही रांची है, जहां राष्ट्रकवि दिनकर ने उर्वशी की सैकड़ों पक्तियां लिखीं। यह वह रांची है, जहां रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिरींद्रनाथ ने तिलक गीता का अनुवाद किया। थोड़ा और पहले जाएं तो यह वह रांची है, जहां जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर अपने आगमन से इस धरती को पवित्र किया था।
रांची शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर कई कयास लगाए जाते रहे हैं। कोई इसे रंची मुंडा के आधार पर रांची का नामकरण करता। कोई अन्य अर्थ लगाता। कुछ रांची शब्द अंग्रेजी के रैंच शब्द से बना बताते हंै। रैंच यानी पशुशाला। अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक दौर में शहरों का नाम अपने ढंग से रखा। ढेर सारे नाम आज भी प्रचलित हैं। कुछ के नाम बदल गए। मद्रास से चेन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आज हो गया। रैंच रांची हो गया क्योंकि डोरंडा में अंग्रेजों ने 1818 के आस-पास घोंड़ों की नस्ल सुधारने के लिए घुड़साल की स्थापना की गई। उसे रैंच कहा जाता था। पूरे बंगाल से यहां घोड़े आते और फिर भेजे जाते। आवागमन का मुख्य साधन भी पहले घोड़े ही हुआ करते थे। सो, इनकी कीमत भी थी। डोरंडा तब बड़कागढ़ रियासत में था। उस समय तो अलग-अलग नाम थे। चुटिया, चडरी, कोनका आदि। यही छोटे-छोटे गांव तब आबाद थे।
15 जनवरी, 1834 में यहां साउथ बेस्ट फ्रंटियर एजेंसी का कार्यालय यहां खुला। कैप्टन थॉमस विलियम्स यहां सबसे पहले एजेंट बनकर आए। इसके बाद रांची शब्द का प्रचार तेज हो गया। इसके बाद 1840 में ओस्ले आए। जब वे आए तो एजेंट की जगह कमिश्नर ने ले लिया। इस तरह वे पहले कमिश्नर थे। उन्होंने ही बांध तालाब खुदवाया, जिसे आज बड़ा तालाब कहा जाता है। पहले अपर बाजार में ही जेल हुआ करती थी। उस समय जेल में कोल विद्रोही बंद थे। 1830 के बाद रांची, पलामू, हजारीबाग में जबरदस्त कोलों ने विद्रोह कर दिया था। तब ढेर से मुंडाओं को पकड़कर यहां बंद कर दिया गया था। अंग्रेजों ने मिर्जापुर-सासाराम आदि जगहों से व्यापारियों को बुलाकर बसाया। उन्हें चर्च रोड में बसाया गया और दुकानें अपर बाजार में, जहां आज भी शनिवार को हाट लगता है। हाट के पास ही जेल था। 1900 में जेल कचहरी के पास बना और अब होटवार में जेल चला गया। उस समय के क्रांतिकारी गणपत राय, शेख भिखारी आदि को अपर बाजार जेल में ही बंद किया गया था। अब अपर बाजार जेल का नामोनिशान नहीं है। कचहरी रोड का जेल है, लेकिन जेल पर कई लोगों की निगाहें लगी हुई हैं। खैर, डोरंडा में ही अंग्रेजों के समय कुतुबुद्दीनशाह भी यहां आए थे। वे यहां घुड़सवार सिपाही थे। बाद में उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति हुई और आगे चलकर वे बाबा रिसालदार के नाम से मशहूर हुए। यहां हर साल उर्स लगता है।
रांची एक ऐसा शहर था, जहां पानी भी खूब बरसता था। जाड़े में बेहद जाड़ा, लेकिन गर्मी के दिनों में कम गर्मी। रांची शांत और रम्य स्थान था। इसलिए, औपनिवेशिक दौर में बंगाल के राजे और रइयों से यहां खूब कोठियां बनवाईं। कुछ के अवशेष तो अब भी हैं। शहर के रइस, विशिष्ट चिकित्सक और वकील घोड़ागाडिय़ों और फिटन पर निकलते थे। कहा जाता है कि रिक्शागाड़ी का प्रचलन रांची और दार्जिलिंग में ही हुआ था। रांची में पार्सलगाड़ी नाम की एक निराले ढंग की गाड़ी चलती थी, जो एक डब्बे की तरह होती थी, जिसमें दो पहिये होते थे। इसके अंदर लोग बैठते थे और वह मजदूरों द्वारा खींची जाती थी। जिस समय रेलगाड़ी-बस की सुविधा नहीं थी, उस समय लोग पार्सलगाड़ी में बैठकर हजारीबाग, पुरुलिया और रानीगंज की यात्रा करते थे।

श्रवण कुमार गोस्वामी की पुस्तक “एक छोटी सी नगरी की लम्बी कहानी” से उद्धृत।


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