दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में शुमार, महारानी गायत्री देवी को इमरजेंसी में जेल जाना पड़ा…

Er S D Ojha

23 अक्टूबर सन् 1919 में महारानी गायत्री देवी का जन्म कूच बिहार में हुआ था. पांच भाई बहनों में आयशा (बचपन का नाम ) का स्थान चौथा था. बचपन उनका बड़े ठाट बाट व लाड़ प्यार में गुजरा. आयशा के हर शौक लड़कों जैसे थे. वह घुड़सवारी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस आदि खेलों में दिलचस्पी लेतीं थीं. मर्दों का पोशाक और शिकार उनकी प्रमुख हावी थी. 12 वर्ष की छोटी उम्र में उन्होंने बाघ का शिकार किया था. उन्हें कार चलाने का भी शौक था.

गायत्री देवी खूबसूरती की मिशाल थीं. यदि बाइरन के शब्दों में कहें तो “She walks in beauty ” . प्रसिद्ध वोग मैग्जीन ने गायत्री देवी को दुनियां की दस परम सुन्दरियों की सूची में शामिल किया था . जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह भी उनकी खूबसूरती के दीवाने हो गये. दोनों की मुलाकातें पोलो ग्राउण्ड में अक्सर होने लगीं. एक दिन महाराजा ने उचित अवसर पर उन्हें प्रपोज कर दिया. गायत्री देवी ना न कह सकीं.

9 मई सन‌् 1940 को दोनों विवाह बंधन में बंध गये. 17 अक्टूबर सन् 1949 को उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. नाम रखा गया – जगत. राजकुमार जगत सिंह दोनों की रंगीली दुनियां में बहार बन के आए. गायत्री देवी ने धीरे धीरे अपने को राजस्थानी परिवेश में ढाल लिया, परन्तु कभी परदा नहीं किया. वे आजीवन परदा प्रथा की घोर विरोधी रहीं. सन् 1943 में गायत्री देवी ने राजस्थान में महिलाओं के लिए पहला पब्लिक स्कूल खोला. उन्होंने स्वतंत्र पार्टी के माध्यम से राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई . वे 1962,1967,1971 में स्वतंत्र पार्टी के तरफ से लोक सभा उम्मीदवार चुनीं गईं. स्वतंत्र पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहीं. सन् 1962 के लोक सभा का चुनाव महारानी गायत्री देवी ने तकरीबन साढ़े तीन लाख के मार्जिन से जीता था, जो एक मिशाल के तौर पर आज भी याद किया जाता है. गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में यह रिकार्ड दर्ज हुआ था .

कहते हैं कि सुख के बाद दुःख का स्वमेव हीं आगमन हो जाता है. महारानी गायत्री देवी भी इसका अपवाद नहीं रहीं.सन् 1970 में पति महाराजा सवाईं मान सिंह द्वितीय की मृत्यु हो गयी. महारानी को ईमरजेन्सी के दौरान इन्कम टैक्स चोरी के आरोप में जेल जाना पड़ा. पति की मृत्यु के उपरांत महारानी का अंतिम संबल बेटा, बहू और पोते थे. उनकी बहु थाईलैंड की राजकुमारी थीं. बेटे जगत सिंह से अनबन होने के उपरांत बहु भी दोनों पोतों के साथ थाईलैंड जा बसी. राजकुमार जगत सिंह ने अपने को शराब में डुबो दिया, जिसके चलते उनका देहांत सन् 1977 में हो गया. दुःख अकेले नहीं आता है. आता है तो अपने साथ दुःखों का पहाड़ लेकर आता है. इतने सारे दुःखों के होते हुए कौन सुखी रह सकता है ? महारानी ने आंसुओं को अपना साथी बना लिया . वे संघर्ष, त्याग की प्रतिमूर्ति थीं.वह प्रजा वत्सल थीं. पति, पुत्र और पोतों का बिछोह उनके लिए असहनीय था. उन्होंने अपना सारा ध्यान प्रजा पर केंद्रित किया. अब प्रजा का सुख दुःख उनका अपना सुख दुःख था.

महारानी ने 29 जुलाई सन् 2009 को इस आसार संसार से विदा ली. जिन्दगी की तरह मौत ने भी उन्हें बहुत तरसाया. मौत जल्दी आ जाए तो सारे दुःखों से छुटकारा मिल जाता है. पर दुःखों को झेलने के लिए उन्हें लम्बी उम्र मिली. 90 वर्ष की उम्र में एक लम्बी जिन्दगी जीने के बाद उन्हें मौत मिली .

जिन्दगी से तो खैर शिकवा था,
मुद्दतों मौत ने भी तरसाया.


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