कारगिल युद्ध से दुखी थे वाजपेयी जी, लेकिन पाकिस्तान के धोखे का दिया था पुरजोर जवाब

-रजनीश आनंद-

‘धमकी जेहाद के नारों से हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो

हमलों से अत्याचारों से संहारों से भारत का शीश झुका लोगे ये मत समझो.’

आज सहसा यह पंक्तियां याद आ गयीं, कारण सबको पता है. कारगिल विजय दिवस कल है और यह पंक्तियां हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की है, जो उन्होंने संसद में पाकिस्तान को एक तरह से उसकी हार के बाद संदेश देने के लिए कही थी, जिसपर ना सिर्फ सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष के सांसदों ने भी मेजें थपथपाईं थीं. वह समय था एकजुटता का, अपने देश की धरती को घुसपैठियों से मुक्त कराने के बाद पूरा देश देशभक्ति की भावना में डूबा था. एक भावुक पल था वो, इसलिए विपक्ष भी वाजपेयी जी के साथ था.

कारगिल युद्ध से बहुत दुखी थे वाजपेयी

जिस अंदाज में वाजपेयी जी पाकिस्तान को चेता रहे थे, वह उनका कर्तव्य था, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर वे इस युद्ध से बहुत दुखी थे.उनके लिए यह एक दुखदायी घटना थी, इस युद्ध में पांच सौ से अधिक भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी और सबसे बड़ी बात कि इस युद्ध से वाजपेयी जी के उन शांति प्रयासों को झटका लग गया था, जो उन्होंने वाघा बार्डर के जरिये पाकिस्तान जाकर दी थी. वाजपेयी जी का कहना था हम विश्व का भूगोल नहीं बदल सकते, इसलिए पड़ोसियों के साथ संबंध सुधारने की जरूरत है. लेकिन कवि हृदय वाजपेयी को पाकिस्तान की ओर से ऐसा धोखा मिला कि वे बहुत दुखी हुए. उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन करके जिस अंदाज में उनसे बात की वही यह साबित कर रहा था कि उनकी मन:स्थिति क्या थी.  लेकिन इस स्थिति से वे उबरे और पूरे जोश और संयम के साथ अपना दायित्व और कर्तव्य निभाया.

पाकिस्तान में घुसने के लिए तैयार थी पाकिस्तानी सेना

‘वाजपेयी एक राजनेता के अज्ञात पहलू’ किताब में एनपी उल्लेख ने इस बात का जिक्र किया है आर्मी चीफ वीपी मलिक ने यह कहा था  कि भारतीय सेना पाकिस्तान के इलाके में घुसने के लिए तैयार थी, लेकिन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उन्हें इस बात की इजाजत नहीं दी थी. 74 दिनों तक चले इस युद्ध में भारतीय सेना को नुकसान तो हुआ, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान को वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया.

कारगिल युद्ध दरअसल भारत के लिए कूटनीतिक विजय था

कारगिल युद्ध में पाकिस्तान ने वापस लौटने का फैसला तब किया जब अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से उनकी मुलाकात हुई. उनके सामने नवाज शरीफ को यह वादा करना पड़ा कि वे युद्ध समाप्त करेंगे. इस युद्ध से सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अमेरिका का झुकाव भारत की ओर हो गया, यह पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा नुकसान और कूटनीतिक हार थी. इस युद्ध के बाद ही भारत और अमेरिका के बीच सामरिक साझेदारी की शुरुआत हुई, जिसका श्रेय नि:संदेह अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है.

वाजपेयी की पीठ में नवाज शरीफ से छुरा घोंपा था

जिस वक्त वाजपेयी जी पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए वाघा बार्डर क्राॅस कर रहे थे, उस वक्त नवाज शरीफ के गुर्गे कारगिल में घुसपैठ कर चुके थे. भारत सरकार को इस बात की जानकारी नहीं थी. हालांकि पाकिस्तानी सेना के लड़ाके भारतीय जमीन पर कब्जा जमा चुके थे. शरीफ को इस बात की पूरी जानकारी थी थी, हालांकि वे इस बात को मानते नहीं और सारा दोष पाकिस्तानी सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ के सिर जाता है. पाकिस्तान ने यह दुहस्साहस इसलिए किया था क्योंकि उसने हाल ही में परमाणु क्षमता प्राप्त की थी और वह अभिमान में था. पाकिस्तान का उद्देश्य कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकर करना था. मई में नवाज शरीफ और जनरल मुहम्मद के बीच हुई बातचीत जब लीक हुई तो इसका खुलासा स्षप्ट तौर पर हो गया.

अमेरिका सहित पूरा विश्व नहीं चाहता था भारत ना करे वायुसेना का इस्तेमाल

अकसर यह कहा जाता है कि भारत ने वायुसेना के प्रयोग में देरी कर दी, जिसके कारण भारतीय सेना को ज्यादा नुकसान हुआ और कई सैनिक शहीद हुए. पाकिस्तान ऊंचाई पर जमकर बैठा था और भारतीय फौज को नीचे से ऊपर जाना था, यानी सीने पर गोली खाना था. वायुसेना का प्रयोग भारत ने इसलिए देर से किया, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय दबाव था. अमेरिका यह नहीं चाहता था कि स्थिति और बिगड़े इसलिए बिल क्लिंटन ने खुद सामने आकर पाकिस्तान से पीछे हटने को कहा था. वाजपेयी ने युद्ध के वक्त कूटनीतिक प्रयास जबरदस्त किये. क्लिंटन को पत्र लिखा जिसके बाद उन्होंने शरीफ पर पीछे हटने के लिए दबाव बनाया. वाजपेयी ने खुले तौर पर पत्र में लिखा था कि अगर पाकिस्तान पीछे नहीं हटा तो हमारे पास हमले के सिवा और कोई चारा नहीं बचेगा.

खुफिया एजेंसी की सूचना पर ध्यान नहीं दिया गया

ऐसे आरोप वाजपेयी सरकार पर लगे कि उसने खुफिया एजेंसी की सूचना पर ध्यान नहीं दिया और उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. इसमें थोड़ी सच्चाई भी नजर आती है. अधिकारी उस वक्त लाहौर घोषणा से बने सद्‌भाव की खुमारी में थे, जबकि पाकिस्तान छल कर रहा था. बावजूद इसके यह आरोप बेअसर हो गये क्योंकि वाजपेयी जी ने कूटनीतिक विजय हासिल की थी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को अलग-थलग करके यह साबित किया था कि भारत युद्ध नहीं चाहता, पाकिस्तान उसपर युद्ध थोपता है.

देशभक्ति की भावना का संचार किया

वाजपेयी जी ने यह घोषणा की थी कि शहीदों के शव को उनके घर तक पूरे सैनिक सम्मान के साथ भेजा जायेगा. इस कदम ने ना सिर्फ वाजपेयी की प्रतिष्ठा बढ़ाई, बल्कि देशवासियों में देशभक्ति और गर्व का भाव भी जागृत किया. सुदूर इलाकों में भी जब शहीद का शव पहुंचा तो लोग रो पड़े लेकिन गर्व का भाव शामिल था, यह वाजपेयी जी की बड़ी सफलता थी.

(फेसबुक वाॅल से साभार)


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