भागलपुर की दिग्गज हस्तियों में शुमार हैं उमा शंकर वर्मा और बेगम रुकैय्या. जानिये उनके बारे में…

Mukutdhari Agrawal

उमा शंकर वर्मा

भागलपुर के वर्तमान साहित्यकारों मे बहुतों ने कवि -कलाकार उमा शंकर वर्मा का नाम नहीं सुना होगा जिनहे भागलपुर का दिनकर कहा जाता था ।अजीव ऊर्जा थी उनमे । नाता कद , सांवरा रंग , चेहरे पर हल्के चेचक के दाग , पोशाक कुर्ता पैजामा और पैर मे चप्पल ।कवि मंचो के बेताज बद्शाह , घंटो श्रोताओ को बांध कर रखने की क्षमता , मंच पर उतर गए तो अपनी नाट्यकला से दर्शको को मंत्र मुग्ध कर दिया ।विश्वास न हो तो उनसे पूछ लीजिये जिनहोने महालक्ष्मी टाकीज के मंच से खेला गया ‘ कसाई ‘ नाटक मे उनकी एक्टिंग देखी हो ।यह मेरे लिए बड़ा सुखद अवसर था जब मैंने उस ड्रामा मे उनके साथ अभिनय किया था ।
मेरा उनसे कब परिचय हुआ ,स्मरण नहीं है , संभवतः द्विजेंद्र गोष्ठी मे या फिर डॉ बेचन के भगवान पुस्तकालय मे । रहते थे अपने मित्र समाजवादी नेता सी पी नंदकुलियार के साथ पिक्चर पेलेस (अब बंद ) की गली मे । मेरी घनिष्टा उनसे ‘कसाई ड्रामा मे सहयोगी कलाकार होने की बजह से हुई थी ,मैं उन्हे वर्माजी और वे मुझे मुकुटभाई कह संबोधित करते थे ।जब कभी किसी चाय की दुकान पर भेंट हो जाये तब बैठा लेते और चाय पिला कर ही जाने देते । कविवर द्विजेंद्र जी उन्हे ‘ आओ ,शेरे भागलपुर ‘ कह संबोधित करते थे । कहना भी सही था -उनकी कवितायें मुख्य रूप से सर्वहारा को आधार बना कर लिखी जाती थी और जब वे मंच से अपनी कविताओ का पाठ करते तब लगता था सचमुच कोई शेर दहाड़ रहा है ,
बाद मे उन्होने संथालपरगना के किसी स्कूल मे टिचरी शुरू कर दी ,और एक दिन यह दुखद समाचार मिला कि सड़क पार करते समय वे किसी ट्रक से कुचल गए और अपनी भरी जवानी मे एक अत्यंत प्रतिभाशील कवि का अंत हो गया ।

बेगम रुकय्या

आज हम बेगम रुकय्या को विस्मृत कर चुके हैं जो 1896 ई मे भागलपुर एक वधु की हैसियत से आई थी और उन्होने यहाँ मुस्लिम महिलायो के बीच समाज सुधार और शिक्षा के प्रसार दिशा मे काफी काम किया था । उनका जन्म एक बड़े सम्पन्न घराने मे रंगपुर जो अब बंगला देश मे है , 1880 ई मे हुआ था ।उनकी शादी भागलपुर के सखावत हुसैन से 1896 ई हुई थी जो काफी उदार विचार के मजिस्टेट थे । जब बेगम रुकय्या भागलपुर आई तब उन्होने मुस्लिम महिलायो के पिछड़ापन और अशिक्षा को देख यहाँ की मुस्लिम महिलायो के बीच जागृति फैलाने का काम शुरू किया जिसमे सखावत हुसैन का पूरा सहयोग था । उन्होने यहाँ मुसलमान लड़कियो के लिए पाठशाला भी खोली । मुस्लिम लड़कियो के लिए यह इस क्षेत्र का पहला पाठशाला था लेकिन जब सखावत हुसैन का इंतकाल हो तब उन्हे इस पाठशाला को चलाने मे कठिनाई आने लगी और उन्होने उसे कलकता स्थानांतरित कर दिया । भागलपुर नगर पालिका ने सखावत हुसैन की स्मृति मे एक गली का नाम सखावत हुसैन लेन रख दिया जो वर्तमान मे बंद पड़े पिक्चर पैलेस के निकट है । कहा जाता हैं कि सखावत हुसैन और बेगम रुकय्या इसी गली मे रहते थे । बेगम रुकय्या न केवल समाजसेविका थी बल्कि उस समय की प्रसिद्ध लेखिकाओ मे उनकी गिनती होती थी । अपने शौहर सखावत हुसैन के निधन के बाद वे कलकता चली गई और बाद मे 9 दिसंबर 1932 मे उनका निधन हो गया । शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र मे उनके योगदान को देखते हुये बंगला देश मे एक विश्वविद्यालय का नाम रुकय्या यूनिवर्सिटी है और उनका नाम वहाँ बड़े आदर के साथ लिया जाता है


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