पकड़ौवा विवाह की प्रथा बिहार के बेगूसराय से शुरु हुई थी

Er S D Ojha

पकड़ौवा विवाह का इतिहास काफी पुराना है । यह प्रथा तकरीबन सौ साल से चली आ रही है । इसमें जबरन दूल्हे को अगवा कर लिया जाता है । अगवा करने के बाद उसकी शादी किसी ऐसी लड़की से कर दी जाती है , जिसके बारे में उसे कुछ पता नहीं होता । लड़की लूल्ही , लंगड़ी , कानी है या सोबरन है । हो सकता हो कि लड़की सुंदर सुभेख भी हो । ऐसे में कुछ भी हो सकता है । वर पक्ष के लिए यह जुआ होता है । इस तरह की शादी अक्सर बिहार में होती थी । कभी कभार उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके में भी होती थी ।

बात 1965 की है । मेरे बड़े भाई की शादी बलिया के बलिहार गांव में हुई थी । यह वही बलिहार गांव है , जहां के केशव प्रसाद मिश्रा हैं, जिनका लिखा उपन्यास ” कोहबर के शर्त ” काफी लोकप्रिय हुआ था । इसी उपन्यास पर फिल्म “नदिया के पार ” बनी थी । मेरे भाई के ससुराल में भाभी के नुनु जी का व्याह था । उस शादी में मुझे भेजा गया । भाई का अभी गवना नहीं हुआ था । इसलिए वे बिना गवना के ससुराल नहीं जा सकते थे । वैसे भी वे उस समय कलकत्ता में थे । उस समय मैं 11-12 वर्ष का था । माँ की सबसे बड़ी चिंता थी कि कहीं वे मेरी जबरन शादी न कर दें । मां ने ताकीद की थी कि जब उनके आंगन में माड़ो गड़ा देखना तो भाग कर टुड़िया के घर चले जाना । तुम्हें वे घर वापस आने में मदद करेंगे । टुड़िया उसी गांव में व्याही थी , जिसके माता पिता कलकत्ता में हमारे पड़ोसी थे । मैं बहुत चौकसी बरतता था । कई बार मुझे सोये से जगाकर खाना खाने के लिए ले जाते थे । आंगन में पहुँच कर मैं अत्यधिक चैतन्य हो जाता था , लेकिन कहीं माड़ो गड़ा मुझे नहीं मिलता था । मैं वहां 9 दिन रहा , हर दिन दहशत में रहा ।

पकड़ौवा विवाह की प्रथा बिहार के बेगूसराय से शुरु हुई थी । भूमिहार लोग काफी दबंग माने जाते थे । उन्होंने बांछित लड़के का अपहरण कर लिया । उसे मारा पीटा । उसके बाद उसकी शादी कर दी । लड़के वाले इज्जतदार थे । उन्होंने कोई रपट नहीं लिखवाई । लड़के की पिता ने लड़की को अपनी बेटी मानते हुए उसकी विदाई करवाकर घर ले आए । इसके बाद से यह एक प्रथा हीं बन गयीं ।सभी जातियों में यह प्रथा आम हो गयी । सबको यह आसान लगने लगा । हींग लगे न फिटकिरी, रंग बन जाए चोखा । इस प्रथा में दान दहेज का कोई चक्कर नहीं था । जबरिया शादी करो और दान दहेज बचाओ । लेकिन सभी लड़के के पिता शरीफ नहीं निकले । बहुतों ने थाने जाकर रपट लिखवाई । लड़की की रुखसती कराने से साफ इंकार कर दिया ।

रुखसती न कराने से लड़की वालों के पसीने छूटने लगे । ऐसे में मान मनौव्वल का दौर शुरु हुआ । कुछ लड़की वालों ने अपनी हैसियत के अनुसार कुछ दान दहेज भी दिया । पंच पंचायत बैठी । बीच बचाव हुआ, तब जाकर कहीं मामला पटरी पर बैठा । आप जबरन शादी कर सकते हैं, पर किसी का दिल नहीं जीत सकते । लड़का जिसे अगवा किया गया है , मारा पीटा गया है ; वह कभी भी सच्चा प्यार अपनी पत्नी को नहीं कर सकता । जो लड़की रुखसती करवाकर घर लाई गयी है , उसका अपमान करने का सबको लाइसेंस मिल जाता है । देवर ननद और सास के साथ जेठानी भी उस पर सदैव आक्रामक हीं रहते हैं । ऐसे में बहू का साथ उसका अपना पति भी नहीं देता ।

बिहार का यह पकड़ौवा विवाह की गूंज लंदन तक जा पहुँची है । इंग्लैण्ड में भी इस प्रथा पर बहुत लिखा जा चुका है । इस प्रथा पर एक हिंदी फिल्म “अंतर्द्वन्द ” बनी है । भोजपुरी वाले भी पीछे नहीं रहे । उन्होंने भी फिल्म बनायी ” जबरिया जोड़ी ” । कलर्स ने भी इस थीम पर एक धारावाहिक चलाई थी । अब कहीं जाकर इस प्रथा पर रोक लगी है , लेकिन अब भी गाहे बे गाहे ऐसे एकाध केस देखने को मिल हीं जाते हैं । मेरी लड़की के पिताओं से सादर अनुरोध है कि ऐसी जबरिया शादी कर अपनी लड़की का घर नरक न बनाएँ । उन्हें जीने दें । खुद भी सुख से जिएं । आजकल के अधिकांश लड़के बिना दहेज के शादी करना चाह रहे हैं । ऐसे लड़कों को पहचाने और उनसे अपनी लड़की की शादी करें ।


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