गर्म हवा: विभाजन से मुस्लिम समुदाय में उपजे पशोपेश पर साधारण बजट में बनी एक असाधारण फिल्म

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

कुछ फिल्मों में इतनी ताकत होती है कि वे हाथ पकड़ कर हमें रोक लेती हैं, मानो वे हमसे कहती हैं कि कहीं न जाओ, कुछ और सोचो, बस तुम आज बस मेरे बारे में सोचो. आज सोचो, कल सोचो, बरसों सोचो.

100 साल के हिंदी सिनेमा के इतिहास में  में कुछ ऐसी फ़िल्में बनी हैं.  उन्ही में से एक है 1973 में बनी एम् एस सथ्यु की  फिल्म गर्म हवा.

फिल्म आगरा में केन्द्रित है. और सलीम मिर्ज़ा के परिवार को कहानी के केंद्र में रखकर उन मुसलमानों के उहापोह के हालात बयां करती है, जिन्होंने देश के विभाजन के बाद  गाँधी और नेहरु के सपनों के हिंदुस्तान में रहने का फैसला किया है और उन्हें इस फैसले के चलते किन मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है, फिल्म इस विषय पर केन्द्रित है.

फिल्म की शुरुआत होती है गाँधी की हत्या के बाद के भारत में. आगरा में नवाब सलीम मिर्जा का जूते बनाने का कारखाना है, उनके बड़े भाई हालिम मिर्ज़ा लीगी नेताओं के जाने के बाद से खुद को मुस्लिम कौम का बड़ा नुमायिन्दा मानने लगे हैं.

स्टेशन पर सलीम मिर्जा अपनी बड़ी बहन के परिवार को ट्रेन पर पाकिस्तान के लिए बिठा आये हैं.

आज किसे छोड़ आये मियाँ? तांगा वाला सलीम मिर्जा से पूछता है.

बड़ी बहन को. बहनोई साहब तो पहले ही करांची चले गये थे, आज उनके बाल बच्चे भी चले गये.

कैसे हरे भरे दरख़्त कट रहे हैं इस हवा में ! ठंडी आह भरते हुए तांगे के पीछे बैठे हुए सलीम मिर्जा कहते हैं.

बड़ी गर्म हवा है मियाँ !!

तांगे वाला कह रहा है, और जो भी हो, हमारे हिन्दू भाई बड़े अच्छे हैं, जो भी करें, पर चमड़े के काम को हाथ नहीं लगाते, पर उधर से जो आ रहे हैं, वो धर्म का लिहाज नहीं करते.

टाँगे वाले का इशारा सिंध और पंजाब से आने वाले हिन्दू व्यापारियों की ओर था. मै तो कहूँ ,एक दिन ये पूरा बाज़ार इनके कब्ज़े में होगा.

मुस्लिमों की नुमाईंदगी का दावा करने के बावजूद एक दिन चुपके से हालिम मिर्ज़ा पाकिस्तान निकल लिए. चूँकि हवेली हालिम मिर्ज़ा के नाम थी और उन्होंने जाने से पहले हवेली सलीम मिर्जा के नाम नहीं की थी, ऐसे में सरकार ने इसे evacuee property घोषित कर दिया. बड़े भाई के पाकिस्तान चले जाने से सलीम मिर्ज़ा की स्थिति बिगड़ जाती है, और जिनका एक रूतबा हुआ करता था, अब उनकी फाइनेंसियल क्रेडिबिलिटी कमजोर हो गयी है. उनके कारखाने को जूते बनाने का बड़ा आर्डर मिला है, पर अब न बैंक और न ही महाजन उन्हें लोन देने के लिए तैयार हैं.

सलीम मिर्जा का बड़ा बेटा बकार मिर्ज़ा ( अबू सिवानी) है, जो अपने पिता को उनके जूते के कारखाने को चलाने में मदद करता है और छोटा बेटा सिकंदर मिर्ज़ा ( फारुख शेख) पढ़ रहा है. सलीम मिर्ज़ा की बेटी अमीना ( गीता सिद्धार्थ) अपने चचेरे भाई काजिम मिर्ज़ा ( हालिम मिर्ज़ा का बेटा) से प्रेम करती है और दोनों के बीच शादी को लेकर परिवार में रजामंदी है. और ये तय हुआ है कि जैसे ही काजिम मिर्ज़ा को नौकरी लग जायेगी, दोनों की शादी करा दी जायेगी. अमीना हालिम मिर्ज़ा के परिवार के पाकिस्तान चले जाने से दुखी है पर काजिम मिर्ज़ा ने शादी के लिए लौटने का अमीना से वायदा किया है. अमीना काजिम के इन्तजार में जी रही है.

इधर आगरा शहर के हालत बदल रहे हैं, पंजाब और सिंध से तेजी से लोग आ रहे हैं और सरकार उन्हें द्वारा पाकिस्तान में खाली किये गये घरों और हवेलियों के बदले आगरा में घर और हवेलियों पर कब्ज़ा दिलवा रही है. सलीम मिर्ज़ा की हवेली एक सिन्धी व्यापारी अजमानी साहब ( ए के हंगल) के हिस्से आई है. कराची में उनकी बहुत शानदार हवेली और बेहद सफल व्यवसाय था. बाज़ार पर भी तेजी से इन व्यापारियों का कब्ज़ा हो रहा है और सलीम मिर्ज़ा जैसे व्यापारियों को मुकाबले में दिक्कत आ रही है. एक तो, वे इन सीधी और पंजाबी व्यापारियों जैसे अग्ग्रेस्सिव नहीं हैं, दुसरे बैंक उन्हें लोन नहीं दे रहा क्योंकि बैंक को डर है कि अन्य मुस्लिम परिवारों की तरह कहीं ये भी पाकिस्तान न चले जाएँ.

उधर पाकिस्तान से एक दिन चुपके से काजिम मिर्ज़ा आगरा आता है. उसे पाकिस्तान सरकार ने कनाडा स्कालरशिप पर हायर स्टडीज के लिए भेजने का फैसला किया है. उसके पिता हालिम मिर्ज़ा अपने बेटे की शादी पाकिस्तान के एक डिप्टी मिनिस्टर से करवाना चाहते हैं, पर काजिम मिर्ज़ा की इच्छा है कि कनाडा जाने से पहले वो अमीना से विवाह कर ले. पर शादी हो पाती इससे पहले ही पुलिस ने बिना पासपोर्ट के भारत आने और भारत आकर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट न करने के जुर्म में काजिम मिर्ज़ा को वापस पाकिस्तान भेज दिया. अमीना टूट जाती है.

इस दौरान अमीना पर उसका फुफेरा भाई शमशाद ( जलाल आगा) लट्टू है और चाहता है कि वो अमीना से शादी कर ले. पर अमीना काजिम मिर्ज़ा के इन्तजार में शमशाद के प्रस्ताव को दुत्कारती रहती है. एक दिन अमीना और शमशाद के साथ अमीना की भाभी ( बकार मिर्ज़ा की पत्नी, जो शमशाद की दीदी भी है) सलीम चिस्ती की दरगाह पर जाती है. वहां एकांत में घूमते घूमते शमशाद अमीना को सलीम ( बादशाह जहाँगीर ) की कहानी सुनाती है: एक बार सलीम ने इसी जगह महरुन्निसा को दो कबूतर पकड़ने को दिया. और राज दरबार में गया. वहां से लौट कर देखा कि एक ही कबूतर है. पूछने पर मेहरुन्निसा ने कहा, एक तो उड़ गया. सलीम ने पूछा कैसे? तो मेहरुन्निसा ने हाथ फैलाया ऐसे. पर ऐन मौके पर अमीना ने शमशाद का हाथ पकड़ लिया और कहा: न एक तो उड़ गया, दुसरे को उड़ने नहीं दूंगी.

इस बीच शमशाद के पिता ( अमीना के फूफा) जो एक कट्टर लीगी रहे हैं, राजनीतिक फायदे के लिये कांग्रेस ज्वाइन कर लिया है. पर shady बिज़नस deals से उत्पन्न परेशानियों के चलते उन्होंने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया है. शमशाद ने अमीना से वायदा किया है कि वो काजिम मिर्ज़ा के विपरीत वापस लौट कर आएगा और अमीना से विवाह करेगा. अमीना के पास एक बार फिर इन्तजार करने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है. नए घर में सलीम मिर्जा की अम्मी का दम घुटता है, उन्हें अपनी हवेली याद आती है. अंतिम समय में सहृदय अजमानी साहब की इज़ाज़त से उन्हें हवेली में ले जाया जाता है, जहाँ वे अंतिम सांस लेती हैं.

इस बीच सलीम मिर्ज़ा तमाम provocations के बावजूद पाकिस्तान जाने को तैयार नहीं, लेकिन नित्य प्रतिदिन की परेशानियों को देखते हुए एक दिन उनके बड़े बेटे वक़ार मिर्ज़ा ने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया. बड़े बेटे के पाकिस्तान चले जाने के बाद सलीम मिर्ज़ा अकेले पड़ जाते हैं. वो लोन न मिल पाने के चलते आर्डर पूरा नहीं कर पाते. माली स्थिति बिगड़ जाती है और बदले हालात में वे अब खुद जूते बनाने वाले मजदूरों के साथ काम करने लगते हैं.

इधर एक दिन सलीम मिर्ज़ा की बहन ( शमशाद की अम्मी)  पाकिस्तान से भारत, आगरे आती हैं, अमीना को उम्मीद बंधती है, पर वे सलीम मिर्ज़ा की मदद से अपनी बेचीं हुई हवेली से मिलने वाले बचे पैसे निकलवाने आई हुई हैं. उन्होंने जाने से पहले खुलासा किया कि शमशाद की शादी पाकिस्तान में मोहसिना नाम की लड़की से कर रहे हैं. अमीना टूट जाती है. कोई और रास्ता न पाकर वो आत्महत्या कर लेती है. सलीम मिर्ज़ा अमीना को खाने के लिए बुलाने आते हैं और बिस्तर पर अपनी बेटी की लाश देखते हैं, वे एकदम से बिखड जाते हैं.

घटनाक्रम अपनी तेजी से चल रहा है. सिकंदर मिर्ज़ा की पढ़ाई पूरी हो चुकी है और परिवार को अपने जवान बेटे से उम्मीद है, पर सिकंदर मिर्ज़ा को टैलेंट के बाद्व्जुद कोई नौकरी देने को तैयार नहीं. सिकंदर मिर्ज़ा लगातार असफलताओं से परेशां होकर कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर लेता है और उसके काम के सिलसिले में देर रात तक अक्सरहां बाहर रहा करता है. एक दिन पुलिस सलीम मिर्ज़ा को पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में पकड कर ले जाती है, लेकिन अदालत से वे बाइज्ज़त बरी हो जाते हैं जब पता चलता है जिस नक़्शे के लिए उन्हें पकड़ा गया था, वो उनकी हवेली का नक्शा था.

 

पर अदालत से बाइज्ज़त बरी होने के बावजूद लोग उन्हें शक की नज़र से देखते हैं और पाकिस्तानी जासूस कहकर पुकारते हैं. एक दिन बाज़ार में टाँगे पर जाते हुए सलीम मिर्ज़ा का तांगा एक सब्जी वाले की रेहरी से टकरा जाता है, छोटी सी बात बहुत तेजी से दंगा फसाद में बदल जाती है. सलीम मिर्जा के सिर पर भी एक ईंट आकर लगती है. अंत में उन्होंने भी थक कर फैसला कर लिया कि परिवार के साथ पाकिस्तान चले जायेंगे.

अंतिम दृश्य में सलीम मिर्जा टाँगे पर सामान लदवा कर अपनी बेगम और बेटे सिकंदर मिर्ज़ा के साथ स्टेशन के लिए निकल रहे हैं. रास्ते में जुलुस मिलता है, जो आम आदमी के लिए रोजी रोटी और काम की मांग कर रहा है. सिकंदर मिर्ज़ा अपने साथियों को देखकर कुछ सोच में पड़ जाता है.

सलीम मिर्ज़ा उसे रोकते नहीं. कहते हैं, जाओ बेटे तुम्हे नहीं रोकूंगा. इंसान कब तक अकेला जी सकता है !

सिकंदर भीड़ में शामिल हो चुका है और इन्किलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहा है.

पिता सलीम मिर्ज़ा ये देख रहे हैं. मन ही मन उन्होंने कुछ फैसला किया और टाँगे से उतर पड़े. अपनी बेगम से कहते हैं, “ मै भी अकेली जिंदगी की घुटन से तंग आ गया हूँ.”

उन्होंने अपना भविष्य हिंदुस्तान में ही बनाने का तय कर लिया है. टाँगे वाले को वापस लौटने का आदेश देकर वे भी भीड़ में शामिल हो जाते हैं.

फिल्म इस मुकाम पर आकर खत्म हो जाती है. इस एक पल में गांधी और नेहरु का हिंदुस्तान जीत जाता है.

फिल्म के बन जाने के बाद रिलीज होने से पहले 8 महीने तक इसे सेंसर बोर्ड लटकाए रहा ये सोच कर कि कहीं देश भर में दंगे न हो जाएँ, लेकिन फिल्म के निर्माण से जुड़े लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और अंततः बेंगलोर के दो थिएटर: सागर और संगीत में रिलीज हुई फिल्म. 1974 के अप्रैल महीने में all इंडिया प्रीमियर बॉम्बे के रीगल सिनेमा हॉल में हुआ. शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने धमकी दी कि अगर प्रीमियर आयोजित किया गया तो शिव सेना के लोग सिनेमा हॉल को जला देंगे. बाल ठाकरे की नज़र में फिल्म प्रो मुस्लिम और एंटी इंडिया थी. काफी मान मनौव्वल के बाद फिल्म का प्रीमियर हुआ. मज़े की बात देखिये इसी फिल्म को 1974 मे राष्ट्रीय एकता के विषय पर बेस्ट फीचर फिल्म का नर्गिस दत्त अवार्ड मिला और साथ ही इसे नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिला.

बाद में कुछ और भी बेहतरीन फ़िल्में बनी देश के विभाजन के मुद्दे को लेकर. कुछ पहले भी बनीं. जैसे यश चोपड़ा की धर्मपुत्र (1959), गोविन्द निहलानी की तमस (1986), पामेला रुक्स की Train To Pakistan (1998) और चाणक्य धारावाहिक फेम के चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की पिंजर (2003), जो अमृता प्रीतम के इसी नाम से बहुचर्चित उपन्यास पर आधारित थी.

गर्म हवा और अंकुर ने भारतीय सिनेमा में पैरेलल सिनेमा की नींव रखी.

इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में पैरेलल सिनेमा की नींव रखी. उसी साल एक और path ब्रेकिंग फिल्म अंकुर श्याम बेनेगल की भी रिलीज़ हुई थी. श्याम बेनेगल आगे चलकर पैरेलल सिनेमा के पितामह कहलाये. फिल्म काफी मुश्किलों के बीच बनी. इसके तथाकथित विवादस्पद विषय को देखते हुए फाइनेंसर ने हाथ खड़े कर दिए. ऐसे में NFDC नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन ने 2,50,000 लाख रूपये दिए और बाकी 7,50.000 रूपये फिल्म के डायरेक्टर और निर्माता एम् एस सथ्यु ने दोस्तों से कर्ज के रूप में जुटाए. चूँकि फिल्म का बजट बहुत छोटा था, ऐसे में फिल्म में बलराज साहनी के अलावा मेनस्ट्रीम के कलाकार नहीं लिए गये, बल्कि इप्टा के कलाकारों को लिया गया. बलराज साहनी से सथ्यु की दोस्ती इप्टा के दिनों से थी, ऐसे में बलराज साहनी इस चुनौतीपूर्ण भूमिका  के लिए तैयार हो गये.  फिल्म का स्क्रिप्ट कैफ़ी आज़मी ने सथ्यु की वाइफ सलमा जैदी के साथ मिलकर लिखा. इसके लिए इस्मत चुगताई की एक कहानी का इस्तेमाल किया गया. सलमा जैदी ने ही इस फिल्म में costume और प्रोडक्शन डिजाईन की जिम्मेवारी भी ली. बलराज साहनी की पत्नी की भूमिका में आयीं कैफ़ी आज़मी की पत्नी और इप्टा थिएटर से जुडी शौकत आज़मी. इप्टा के नाटकों में अब तक छोटी छोटी भूमिका कर चुके फारुख शेख को सलीम मिर्ज़ा के छोटे बेटे सिकंदर मिर्ज़ा के रूप में फिल्मो में पहला ब्रेक मिला. कम बजट के चलते कुछ अनोखे प्रयोग भी किये गये, जैसे ट्रेन के जाने के लिए सिर्फ ट्रेन की आवाज के इस्तेमाल से काम चलाया गया, जो काफी प्रभावी भी बन पड़े.

सलीम मिर्ज़ा की माँ की भूमिका पहले मशहूर ग़ज़ल गायिका बेगम अख्तर को ऑफर की गयी, पर उन्होंने इस भूमिका को करने से इनकार कर दिया. तो फिर ये रोल बदर बेगम के हिस्से गया. बदर बेगम उस समय जीवन के सातवें दशक में थीं, पर जवानी के दिनों में वे बॉम्बे फिल्मों में भाग्य अजमाने गयी थीं, पर सफलता नहीं मिलने पर आगरा लौट आयीं, पर दुर्भाग्य से वैश्यालय में फंस गयीं. उस समय वे आगरा में एक वैश्यालय चला रही थीं. उन्हें आँखों से कम ही दिखाई देता था, उनकी आवाज दीना पाठक ने डब की थी. दुर्भाग्य से बलराज साहनी फिल्म को रिलीज़ होते नहीं देख सके और अपने हिस्से की डबिंग करने के बाद 60 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया. इस फिल्म को दो बीघा जमीन और काबुलीवाला के साथ बलराज साहनी के बेस्ट performances में गिना जाता है.

फिल्म में हर कलाकार ने शानदार काम किया है. पर बलराज साहनी इस फिल्म में धीरे धीरे ग्रो करते हैं और बढ़ते बढ़ते वे सेकंड हाफ में पूरी फिल्म पर अपनी छाप छोड़ते हैं. पर फिल्म में अंत में एक और किरदार याद रह जाता है वो है अमीना का किरदार निभा रही गीता सिद्दार्थ.

अपने सन्देश के चलते आज के दौर में भी ये फिल्म सार्थक है और विभाजन के मुद्दे पर ताजा बहस करवाने की क्षमता रखती है ये फिल्म.

बन्दिनी में “कल्याणी “ का किरदार निभाकर नूतन भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो गयी !!

दो बीघा जमीन एक कालजयी फिल्म है; पर सुजाता के बारे में मै ऐसा नहीं कह सकता !!


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