बिहार की राजनीति में कब बाहुबली राजनेता बन बैठे पता ही नहीं चला/ भाग8: कहानी लालू बनाम शेषण की

प्रियदर्शन शर्मा 

यूं तो जातिवाद का जहर पूरे देश में रहा है लेकिन कायदे से देखा जाए तो बिहार में उस किस्म की अस्पृश्यता या छुआछूत का इतिहास नहीं रहा जैसे महाराष्ट्र या तमिलनाडु जैसे राज्य में था। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण था आजादी के पूर्व किसानों को संगठित करने के लिए स्वामी सहजानंद का चलाया गया आंदोलन हो या आजादी के बाद बिहार के मुख्यमंत्री बने श्रीकृष्ण बाबू द्वारा बैद्यनाथ धाम (देवघर) के पंडों के भारी विरोध के बावजूद दलितों को मंदिर में प्रवेश कराना। यानी जातियों में बंटा समाज अंदरखाने भाईचारे के साथ रह रहा था।

लेकिन लालूराज में यह बदल गया। लालू की राजनीति चमकाने का सबसे बड़ा अस्त्र-शस्त्र ही जातिवाद रहा। ‘भूराबाल’ (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो का घिनौना नारा देने वाले लालू ही थे। इसी का उदाहरण था कि 1992 का बारा नरसंहार हो या उसके बाद के सेनारी जैसे नरसंहारों में दर्जनों लोगों के मारे जाने के बाद भी लालू ने चुप्पी साधे रखी जबकि प्रतिशोध में हुए अन्य नरसंहारों को जातिवाद के रंग में रंगने से कभी भी लालू पीछे नहीं रहे।

खैर लालू की जातिवादी राजनीति, अपराधियों को राजनीति में प्रवेश कराना और तमाम संवैधानिक संस्थााओं को धता बताकर एक अहंकारी शासक की भांति शासन करने की शैली को चुनाव आयोग में बैठे टी.एन. शेषन को भी रास नहीं आ रहा था। यह वही टी एन शेषन थे जिन्होंने पहली बार देश के नेताओं को चुनाव आयोग की सख्ती से अवगत कराया था। इस सख्ती का सीधा सामना लालू को भी हुआ।

एक उन्मादी सांढ़ की भांति बिहार को हांक रहे लालू को कतई मंजूर नहीं था कि उन्हें कोई अफसर चुनौती दे। लेकिन शेषन तो दूसरी मिट्टी के ही बने थे। कहा जाता था कि उस समय भारतीय राजनेता सिर्फ़ दो चीज़ों से डरते हैं, पहला ईश्वर और दूसरा शेषन।

उन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया और चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गईं। ये बिहार के इतिहास का सबसे लंबा चुनाव था। और यह बिहार का पहला चुनाव था जिसमें बूथ कैपचरिंग पर रोक की पहल हुई, वही बूथ कैपचरिंग जिसकी शुरूआत 1957 में देश में पहली बार बिहार के बेगूसराय में हुआ था।

शेषन ने बिहार में बूथ कैप्चरिंग रोकने के लिए सेंट्रल पुलिस फोर्स का इस्तेमाल किया। कई चरणों में चुनाव करवाए और उसकी तैयारियों के लिए चुनाव को कई बार टाला भी. लालू इतना नाराज हो गए कि शेषन के लिए रैलियों में बोले…. भैंसिया पर चढ़ा करके गंगाजी में हेला देंगे….. पर शेषन न लालू से डरे और न प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने…. उन्होंने सब कुछ नियमों के मुताबिक और सख्ती से किया.

उस पूरे प्रकरण को पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘बंधु बिहारी’ में लिखा है कि लोगों को लगा कि शेषन ने लालू को ठीक कर दिया, मगर असल में लालू यादव को शेषन की सख्ती का फायदा मिला।

शेषन अपनी झाड़ू सबसे अधिक बिहार में ही फिराना चाहते थे, जो चुनावी अनाचार के कूड़े का गड्ढा था- बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, हेरा-फेरी, हिंसा- सब बिहार में किसी भी चुनाव के अनिवार्य अंग थे। अगर यह सब नहीं होता था, तो बिहार में चुनाव कोई बड़ी खबर नहीं बनती। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनावों में 24 लोग मारे गए थे और 1989 में 40… वहीं, विधानसभा चुनावों में मतदान के समय वर्ष 1985 में 63 लोग मारे गए थे और 1990 में 87 लोगों की चुनावी बलि चढी।

बूथ कैप्चरिंग और फर्जी वोटिंग की घटनाओं की कोई गिनती नहीं रखी जाती थी। शेषन ने तय कर लिया था कि वर्ष 1995 के चुनावों में ऐसा कुछ नहीं होने देंगे जबकि उस समय करीब दो दर्जन ऐसे लोगों ने नामांकन किया था जो बड़े बड़े बाहुबली थे। शेषन ने बिहार में एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाने को लेकर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी। उन्होंने राज्य में अर्धसैनिक बलों की 650 टुकडय़िों को भेजा।चुनाव को चार चरणों में विभक्त कर दिया, चार बार मतदान स्थगित किया और राज्य प्रशासन को कांटों पर खड़ा रखा- शेषन संहिता के उल्लंघन का जरा सा भी संकेत मिलने पर पूरी चुनाव प्रक्रिया रद्द कर दी जाएगी। शेषन के विस्तृत कठघरों का अंजाम ये हुआ कि बिहार को देश के अब तक के सबसे लंबे विधानसभा चुनावों की यंत्रणा से गुजरना पड़ा। चुनाव आयोग द्वारा ये चुनाव 8 दिसंबर, 1994 को अधिसूचित किया गया और अंतिम मतदान 28 मार्च, 1995 को संपन्न हुआ।

वह एक थका देनेवाला चुनाव अभियान था- उम्मीदवार लगभग तीन महीने सडक़ पर थ। लालू यादव की सरकार के लिए वह समय सिर-खपाऊ भी था लेकिन लालू यादव ने इस विलंब और लंबे समय के अभियानों का अच्छा फायदा उठाया। सार्वजनिक रूप से बेशक उन्होंने क्रोध और तिलमिलाहट का प्रदर्शन किया और शेषन के खिलाफ प्रख्यात धमकियां प्रेषित कीं- ‘भैंसिया पर चढ़ा करके गंगाजी में हेला देंगे….’ लेकिन वे प्रसन्नता के साथ मुंह दबाकर हंस रहे थे।

दरअसल उस लंबे चुनाव अभियान में सभी दल और प्रत्याश्यिों के लिए यह संभव नहीं रह गया था कि वह उतने लंबे समय तक मतदाताओं से जुडक़र रहे लेकिन लालू के पास सत्ता थी तो उन्होंने इसका जमकर बेजा इस्तेमाल भी किया। और समय भी था तो पूरे बिहार (उस समय झारखंड भी बिहार था) के कोने कोने में लालू पहुंचे। उन्होंने खुद को पिछड़ों का मसीहा साबित करने वाले ऐसे ऐसे बयान दिए जो सीधे आम लोगों की जुबां पर बैठा। तब प्रचार का मतलब बेहद कठिन काम था लेकिन शेषन की सख्ती के कारण लालू आराम से सभी क्षेत्र के मतदाताओं तक पहुंचे।

मैदान में लालू यादव की सांस फूलने के बहुत पहले ही शेष खिलाड़ी थक चुके थे और राजनीतिक रूप से जितनी बार चुनाव स्थगित हुए, लालू यादव अपने निर्वाचन क्षेत्र में यह घोषणा करके अपना लाभ निकालने में सफल रहे कि शेषन, कांग्रेस और भाजपा, ‘सभी सवर्णों के प्रतीक वंचितों और पिछड़ी जातियों से बिहार पर शासन करने का उनका अधिकार छीनने की साजिश रच रहे थे।’

वी.पी. सिंह, जो अस्वस्थ थे और राजनीति से आत्मारोपित अर्ध-सेवानिवृत्ति ले चुके थे, साजिश के कोण को सहारा देने स्वयं बिहार आए। बिहार में उन्होंने चुनाव के तीसरे स्थगन के बाद सार्वजनिक सभाओं की एक शृंखला को संबोधित करते हुए कहा, ‘मंडल को पलटकर पुरानी शोषक व्यवस्था को वापस लाने का निश्चित और निर्धारित प्रयास किया जा रहा है.’ लालू यादव का वोट बैंक और समृद्ध हो गया।

बहुत से लोग, जिनमें लालू यादव के अपने सहयोगी और मित्र भी शामिल थे, वर्ष 1995 में लालू की जीत के स्तर से हैरान थे, लेकिन स्वयं लालू हैरान नहीं थे। वे जानते थे कि इस लंबे चले चुनाव में भले इस बार बूथ कैपचरिंग कम हुआ है लेकिन मेरे जातिवाद का बीज अब फलदार वृक्ष बन गया है। 1995 के चुनाव में कुछ इसी कारण से मतपेटियों से ‘जिन्न’ निकला और लालू जीत गए। दर्जनों अपराधी पहली बार बिहार विधानसभा में चुनकर आए

 


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