बिहार की राजनीति में कब बाहुबली राजनेता बन बैठे पता ही नहीं चला/ भाग11: कौन दल इनसे अछूता है?

प्रियदर्शन शर्मा 

सच ही कहा गया है कि अपराध का सबसे अच्छा संरक्षण और पोषण सत्ता के संसर्ग में ही होता है। आपराधिक जमीन के विस्तार के लिए राजनीतिक जमीन की तलाश निहायत ही जरूरी है।

कहते हैं हर एक ‘अति’ का अंत होता है लेकिन बिहार के लिए दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 2000 और 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद लालू का तो करीब करीब अंत हो गया लेकिन बिहार की राजनीति में बाहुबलियों की प्रत्यक्ष भागीदारी अब कोई मुद्दा नहीं रहा। हर दल में नेता कम और बाहुबली ही ज्यादा हो गए। 2005 के बाद से सत्ता पर राज भले बदल गया लेकिन सत्ता में भागीदार या परोक्ष रूप से कई ऐसे लोग हैं जो जिनकी पृष्ठभूमि अपराध रही है। विपक्ष-पक्ष सब समान है इस मामले में।

हर इलाके में कोई न कोई लोकल बाहुबली है जो एक विधानसभा क्षेत्र की सियासत तो करता ही रहा। कुछ मौजूदा समय में भी हैं तो कुछ के रूप बदल गए, मसलन अगर खुद चुनाव नहीं लड़ सकता तो पत्नी या काई रिश्तेदार।

सीतामढ़ी में राजेश चौधरी, अनवारुल हक, श्रीनारायण सिंह , अवनीश कुमार सिंह का प्रभाव रहा। मोतिहारी में बबलू देव, रमा देवी, सीताराम सिंह, राजन तिवारी, गप्पू राय का प्रभाव तो बेतिया में सत्तन यादव, बीरबल यादव, पूर्णमासी राम का प्रभाव। गोपालगंज में सतीश पांडे, जितेन्द्र स्वामी का प्रभाव है। आरा, बक्सर में आइए तो यहां की राजनीति अलग तरीके से होती है। यहां लाल झंडे की सियासत भी है सो समीकरण समय के हिसाब से बनते बिगड़ते हैं। सुनील पांडे और भगवान सिंह सरीखे नेता रहे। सीवान में शहाबुद्दीन आज भी मौजूद है। बेगूसराय -मोकामा में तो कई सूरमा हैं। बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, नवादा और पटना के ग्रामीण इलाकों में तो न जाने कितने बाहुबली हुए।

पटना जिले में अनंत सिंह , सूरजभान, रीतलाल यादव (खगौल), रामानन्द यादव पिछले कई वर्षों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में सक्रिय हैं। नवादा के एक कोने में बाहुबली अखिलेश सिंह (वारसलीगंज), पँकज सिंह ( स्व. आदित्य सिंह के पुत्र) , अशोक महतो, कौशल यादव जैसे लोग प्रभावी रूप से सक्रिय हैं। बिहारशरीफ में पप्पू खां। वैशाली और तिरहुत में मुन्ना शुक्ला एंड टीम। पूर्णिया और कोसी के इलाके में तो पप्पू यादव, पप्पू देव, तस्लीमु्ददीन, आनंद मोहन के अलावा शंकर सिंह, अवधेश मंडल, दिलीप यादव, किशोर कुमार मुन्ना भी प्रभावित करने वाले लोगों में शामिल हो गये हैं।

ये है बिहार की सियासत के अपराधीकरण की कहानी का कमोबेश पूरा खाका। वैसे और भी कई दबंग लोग हैं जिनका खास खास इलाके में खासा प्रभाव है। वैसे कुछ लोगों के नाम छूट गये होंगे, ऐसा संभव है। लेकिन मोटा मोटी बिहार की सियासत में बाहुबलियों के दबंगई की यही तस्वीर है।

हालांकि पिछले 15 बरस में इसमें कई बदलाव भी हुआ। मसलन 2000 में विधायक बनने के बाद से सूरजभान पर कोई केस मुकदमा नहीं हुआ, लेकिन शहाबुद्दीन हो या अनंत इनका आचरण और बोली व्यवहार यथावत है।

खैर, अब आप देखिए कि ये लोग कौन से दल में है और कौन सा दल इन बाहुबलियों से अछूता है।


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