बिहार की राजनीति में कब बाहुबली राजनेता बन बैठे पता ही नहीं चला/ भाग10: कहानी सूरजभान सिंह की

प्रियदर्शन शर्मा 

और एक वक्त ऐसा भी आ गया कि बिहार में बाहुबली ही अपराध-मुक्त समाज के लिए नेतृत्व देने लगे।

जी हां, याद कीजिए वर्ष 2000 जब लालू की अराजक सत्ता से बिहार को मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे विपक्ष का नेतृत्व करने वाले नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने। वे 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने और पर्याप्त बहुमत नहीं होने पर इस्तीफा दे दिया… लेकिन इस दौरान देश ने पहली बार देखा कि बिहार की सत्ता अब बाहुबलियों के हाथों चलेगी। सूरजभान, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला जैसे १४ बाहुबली निर्दलीय चुनाव जीते जिनमें ज्यादातर जेल से ही जीते थे। उस समय पटना के बेऊर जेल में बंद सूरजभान का एक बयान सुर्खियां बना जिसमें उन्होंने नीतीश के लिए पर्याप्त बहुमत हो जाने की बात कही थी।

मेरे मित्र रंजन ऋतुराज ने उस समय के राजनीतिक परिदृश्य का रोचक चित्रण करते हुए लिखा था … 2000 के चुनाव में अधिकतर बाहुबली जीत के आये। हश्र यह हुआ की चौदह विधायक का समर्थन बेऊर जेल से नितीश कुमार को मिला और उस तरह के विधायक के नेता थे – मोकामा वाले सूरजभान सिंह। कहा जाने लगा – उन सात दिनों में – जेल से ही सूरजभान ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। दरअसल जगन्नाथ मिश्र और लालू राज से 2005 के बाद नीतीश राज तक आते आते जो बदल गए वो विधायक-सांसद बन गए जो बन्दूक थामे रहे वो किसी गली में कुत्ते की मौत मर गए। जो नहीं मरे वे ठेकेदार बन गए। नीतीश ने ऐसे सभी बाहुबलियों की नकेल तो कस ही दे, फिर चाहे वे किसी जाति के हों। इसलिए नीतीश के एक खासमखास ने हाल ही में कहा था – वे लोग बाहुबली हैं और मैं महाबली हूं।

खैर बहुमत नहीं जुटा और लंबे जद्दोजहद और विधायकों के लिए खजाने का मुंह खोल देने के बाद लगातार तीसरी बार लालू-राबड़ी बिहार की सत्ता पर काबिज हो गए। इस चुनाव ने एक ओर जहां १४ बाहुबलियों के चुनाव जीतने के कारण सुर्खियां बटोरी तो दूसरी ओर लालू ने अपनी खिसकती जमीन को बचाने के लिए बिहार के बंटवारे पर सहमति जताई।

एकीकृत बिहार में विधानसभा की 345 सीटें और लोकसभा की ५४ सीटें थी लेकिन दक्षिण बिहार के इलाकों में लालू की पकड़ कमजोर हो चुकी थी। इसी कारण से २००० के चुनाव में लालू को झटका लगा था। वहीं उस समय केंद्र में अटल बिहारी की सरकार थी जो भाजपा का जनाधार मजबूत करना चाहते थे और इसके लिए देश में कई छोटे छोटे राज्यों के गठन को अटल सरकार मंजूरी देने की पक्षधर थी। इसका कारण यह भी था कि अटल सरकार को लगता था कि अगर झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ जैसे राज्य बने यहां भाजपा सत्तासीन हो जाएगी और भाजपा का जनाधार बढेगा। वहीं दक्षिण बिहार में कमजोर होते लालू भी बिहार पर अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहते थे।

अंतत: वर्षों से जो मांग ठंडे बस्ते में पड़ी थी उसे अटल और लालू सरकार ने अपने अपने स्वार्थ के लिए हवा दी और बिहार का बंटवारा हो गया। सत्ता के लोभ में राजनेताओं को राज्य बांट दिया। बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 द्वारा बिहार विधानसभा की सीटें 345 से घटाकर 243 कर दी गई। इसी अधिनियम द्वारा बिहार से अलग कर झारखंड राज्य की स्थापना की गई। बचे हुए बिहार में राजद सशक्त हो गई और झारखंड में भाजपा।

वहीं 2000 में सत्ता से दूर होने जा रहे लालू यादव को कांग्रेस का भी साथ मिला। यह अपनी किस्म का प्रत्यक्ष प्रलोभन था कि कैसे समर्थन के लिए लालच दिया जा रहा है। कांग्रेस के 23 विधायकों को राबड़ी देवी कैबिनेट में शामिल किया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सदानंद सिंह को असेंबली स्पीकर भी बनाया गया। इसके अतिरिक्त उस राबड़ी सरकार में भी कई बाहुबली शामिल थे। आप चाहें तो अपने हिसाब से जंगलराज के उन बाहुबलियों का नाम जोड़ सकते हैं ….


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