शरतचंद्र के प्रेमी ‘देवदास” को ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने अमर कर दिया

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

अगर रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की बात छोड़ दें, तो फिर शरत चंद्र की कृति ” देवदास” पर इंडियन सिनेमा में सबसे अधिक बार फिल्म बनी है. खुद हिंदी में तीन बार. पहली बार 1935 में, जिसमे के एल सहगल देवदास बने थे, फिर 1955 में विमल रॉय ने दिलीप कुमार को लेकर देवदास बनायी, 2002 में संजय लीला भंसाली ने शाहरुख़ खान को लेकर देवदास बनायी. हिंदी के अलावा बंगाली, तमिल, असमिया आदि भाषाओँ में भी ये फिल्म बनी. इसके अलावा देवदास से प्रेरित होकर भी कई फ़िल्में बनीं जैसे अभय देओल को लेकर बनी फिल्म देव डी. कई फिल्मों में देवदास से जुड़े सीन रखे गए. जैसे कागज़ के फूल में गुरुदत्त वहीदा रहमान को पारो की भूमिका में रखते हुए देवदास की शूटिंग करते दिखाए गए हैं.

पर रोचक बात ये है कि देवदास शरत चंद्र की सबसे प्रसिद्द कृति है, हालाँकि शरत खुद इसे अपनी सबसे कमजोर कृति मानते थे. उन्होंने बेहद कम उम्र में ये किताब लिखी थी ( 1900 में 25 साल की उम्र में), पर इस किताब का प्रकाशन 17 साल बाद 1917 में हुआ.

अब तक हिंदी में बनी तीन देवदास में से विमल रॉय की ‘देवदास’ (1955) को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. और ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार के अभिनय को सर्वश्रेष्ठ. महान फिल्मकार सत्यजीत रे दिलीप कुमार को ‘master of method acting’ कहा करते थे. दिलीप कुमार जब बॉलीवुड में आये थे, तो उन दिनों ओवरएक्टिंग का दौर था. दिलीप कुमार को बलराज साहनी, मोतीलाल और अशोक कुमार के साथ एक्टिंग को गैर जरुरी ड्रामा से मुक्त कर स्वाभाविक एक्टिंग से जोड़ने का श्रेय दिया जाता है. दिलीप कुमार ने अपने पात्रों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पर ध्यान दिया और पात्र के सामाजिक, आर्थिक परिप्रेक्ष्य में अभिनय पर जोर दिया. ऐसा करते हुए दिलीप कुमार ने न केवल एक्टिंग को सहज किया, कृत्रिमता से मुक्त किया, बल्कि जनमानस के भी प्रिय बने.

पी सी बरुआ ने बंगाली में 1935 में देवदास बनायी थी. इस फिल्म में उनके कैमरामैन थे बिमल रॉय. बिमल रॉय ने 1955 में खुद देवदास फिल्म बनायी दिलीप कुमार, वैजयंती माला और सुचित्रा सेन को लेकर. और अपनी फिल्म को अपने गुरु पी सी बरुआ को डेडिकेट किया.

“देवदास” दो प्रेमियों देवदास और पारबती ( पारो) के प्रेम और विरह की कहानी है.

“देवदास” दो प्रेमियों देवदास और पारबती ( पारो) के प्रेम और विरह की कहानी है. दोनों पड़ोसी हैं और बचपन में एक साथ खेला करते हैं,स्कूल जाते हैं. देवदास थोड़ा बड़ा होता है तो उसे पढ़ने के लिए गांव से दूर भेज दिया जाता है. जब कलकत्ते से पढ़ कर देवदास लौटता है, तो पारो से मिलने उसके घर जाता है. पारो अब बच्ची नहीं रही है, उसका दिल देवदास के लिए धड़क रहा है, मिलने से शरमा भी रही है. देवदास हिचक कर पारो से कहता है: “कितनी बड़ी हो गयी हो तुम?” पारो की आँखों में सपना पल रहा है देवदास से विवाह का, और सुखद वैवाहिक जीवन जीने का.
पारो की माँ पारो का रिश्ता लेकर देवदास के माँ के पास जाती है, पर बीच में असमान सामाजिक दर्जा आ जाता है. पारो के परिवार वाले देवदास के परिवार वालों की तुलना में नीचे कुल के ब्राह्मण हैं, इसके अलावा पड़ोस में समधियाना का ख्याल रुच नहीं रहा. लिहाजा देवदास और पारो के विवाह को देवदास के पिता सख्ती से ना कह देते हैं.
पारो परेशां हो चली है. एक रात अपनी लज्जा, मर्यादा ताक पर रखकर वो आधी रात में देवदास से अपनी दिल की बात कहने आ जाती है. उसे यकीं है कि देवदास उसे अपना लेगा. उसकी मर्यादा की रक्षा करेगा. पर देवदास फैसला नहीं कर पाता और सुनसान रात में पारो को अपने कमरे में देखकर हड़बड़ा जाता है.

हिम्मत करके देवदास अपने पिता से अपनी शादी की बात करता है. पर उसे पिता से फटकार मिलती है. देवदास रुष्ट होकर फैसला ले लेता है. वो कलकत्ते के लिए निकल जाता है. पारो पीछे छूट जाती है. कलकत्ते से वो पारो को चिट्ठी लिखता है कि वो अपने पिता के तय किये जगह शादी कर ले और उसे भूल जाए. पर पारो को वो भूल नहीं पा रहा. चिट्ठी डालने के बाद उसे अपने निर्णय पर अफ़सोस होता है. वो अगली ट्रेन से अपने गांव पहुँचता है और पारो से शादी के लिए निवेदन करता है. पर अब पारो का आत्मसम्मान आहत हो चुका है. वो देवदास को उसकी कायरता और अनिर्णय के लिए फटकार लगाती है, और कहती है, “तुम्हारे माता पिता की मर्जी ही सब कुछ है, मेरे माता पिता की मर्जी कोई मायने नहीं रखती है?”
पारो बताती है कि उसकी शादी नारायण बाबू ( देवदास के पिता) से भी बड़ी जमींदारी वाले मानिकपुर के ज़मींदार से तय हो गयी है. देवदास पारो से गर्व से आहत महसूस करता है और उसके सिर पर चाबुक से प्रहार करता है. पारो के सिर से खून निकलने लगता है, और वहां पर दाग बन जाता है. देवदास कहता है, “जब जब तुम इस दाग को देखोगी, तुम्हे मेरी याद आएगी.”
पारो शादी करके ससुराल चली गयी है. देवदास को गांव में मन नहीं लगता. दिन भर गांव में इधर उधर घूमता रहता है बन्दूक लिए, चिड़ियों पर निशाना लगाता. जीवन मानो निरुद्देश्य हो गया है. वह फिर से कलकत्ते चला आता है. पर पारो की याद अब उसे जलाने लगी है. एक दिन हॉस्टल में रहने वाले चुन्नी बाबू ( मोतीलाल) उसे चंद्रमुखी ( वैजयंती माला) के कोठे पर ले जाते हैं. पर देवदास चंद्रमुखी का तिरस्कार करता है.

चंद्रमुखी के साथ आज तक इस तरह किसी ने व्यवहार नहीं किया था. वह देवदास की कठोरता के अंदर एक घायल प्रेमी को पहचान लेती है. वह देवदास के प्रेम में पड़ जाती है. पारो को भूलने की चाह में देवदास शराब का सहारा लेता है, पर पारो की याद दिल से नहीं जाती, अलबत्ता उसका स्वास्थ्य जरूर ख़राब होने लगता है. चंद्रमुखी ने देवदास के लिए कोठेवाली का काम छोड़ दिया है. चंद्रमुखी से उसे सहानुभूति तो है, पर उपारो से प्यार नहीं.

चंद्रमुखी और पारो की तुलना करते हुए एक बार देवदास कहता है, पारो में दर्प है, तुममे घमंड का कतरा नहीं. वो दर्द बर्दाश्त नहीं कर सकती, तुम दर्द सहती हो हर घड़ी. उसे सब प्यार करते हैं, तुम्हे सब नफरत करते हैं. ” पर मैं चंद्रमुखी, तुमसे नफरत नहीं करता. चंद्रमुखी बस इतने से मानो जीने का सहारा पा जाती है.

देवदास का अब गांव जाना कम हो गया है. एक बार पिता के देहांत होने पर गांव आता है. अपने बड़े भाई ( इफ्तिख़ार ) से सम्पत्ति को लेकर झगड़ा करता है. फिर कलकत्ते लौट जाता है.
चुन्नी बाबू जब उसे इतनी ज्यादा शराब पीने से रोकते हैं, तो देवदास कहता है, “कौन कम्बख्त बर्दाश्त करने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूँ कि जी सकूँ.”

पर न चंद्रमुखी, न शराब देवदास का गम दूर कर पाने में सफल है. देवदास पारो में गम में गलता जा रहा है, एक छोटी सी भूल और उसकी इतनी बड़ी सजा !! चंद्रमुखी से पूछता है, क्यों पारो की याद मुझे हमेशा सताती है?”
चंद्रमुखी की आँखों में आंसू देखकर देवदास कहता है, ” तुम तो पारो नहीं हो, फिर क्यों रोती हो?”

देवदास के पिता के देहांत के बाद अब देवदास की माँ काशी में बस गयी है. अब देवदास का अपने गांव से नाता टूट चुका है. शांति की तलाश में देवदास अपने पुराने भरोसेमन्द नौकर धरमदास ( नासिर हुसैन) के साथ देशाटन पर निकल पड़ता है. लाहौर, मद्रास, हर दिशा में जा रहा है. पर शांति कहीं नहीं है. तबियत दिन प्रतिदिन बिगड़ रही है. देवदास बुखार में तड़पता रहता है. शराब उसके लिए जहर है, पर एक दिन कम्पार्टमेंट में चुन्नी बाबू फिर से टकरा जाते हैं. चुन्नी बाबू की जिद पर देवदास फिर से शराब पी लेता है. उसकी हालत बिगड़ चली है. उसके मृत्यु के दिन नज़दीक आ रहे हैं. एक दिन ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रूकती है. कुली आवाज लगा रहा है, मानिकपुर जाने के लिए यही उतरें। अंत समय नज़दीक देखकर देवदास पारो से मिलने चल पड़ता है. ठण्ड की रात में बैलगाड़ी चल रही है. देवदास को अंत समय में जीवन की पुरानी घटनाएं याद आ रही हैं. मन के पट पर चलचित्र की भाँती घटनाएं चल रही हैं. देवदास की सांसे कम होती जा रही हैं. पर रास्ता मानो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. गाड़ीवान से पूछता है, “भाई, क्या ये रास्ता कभी ख़त्म नहीं होगा?”

देवदास पारो की हवेली के दरवाजे पर पहुंचता है. सुबह होते होते भीड़ लग जाती है. हवेली के अंदर पारो को खबर मिलती है कि कोई उसके ससुराल का देवदास मुख़र्जी मर गया है. पारो चीत्कार कर उठती है. वो देवदास के दर्शन के लिए दरवाजे की ओर बेसुध दौड़ती है. न परदे की खबर है, न सामाजिक मर्यादा की. पर दरवाजा बंद कर दिया जाता है. पारो बेहोश होकर दरवाजे पर गिर जाती है. देवदास की लाश को अनाथ की तरह गांव वाले जला देते हैं.

बिमल रॉय इस फिल्म में मीना कुमारी को पारो और नरगिस को चंद्रमुखी के रोल में लेना चाह रहे थे. पर कमाल अमरोही के अनावश्यक हस्तक्षेप के चलते मीना कुमारी ये रोल नहीं कर सकीं वही, नरगिस को चंद्रमुखी का रोल स्वीकार नहीं था, उन्हें पारो का रोल चाहिए था. ऐसे में दक्षिण की उभरती अभिनेत्री वैजयंतीमाला को चंद्रमुखी और बंगाल की अभिनेत्री सुचित्रा सेन को पारबती ( पारो) की भूमिका में लिया गया.

इस फिल्म को तीसरा सबसे बेहतरीन फिल्म होने का नेशनल अवार्ड मिला. बेस्ट फिल्म का फिल्म फेयर अवार्ड देवदास को नहीं मिला, बल्कि झनक झनक बाजे पायल फिल्म को मिला. पर  बिमल रॉय को बेस्ट डायरेक्टर, दिलीप कुमार को बेस्ट एक्टर, मोतीलाल को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का और वैजयंती माला को सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्म फेयर अवार्ड मिला. लेकिन वैजयंतीमाला ने अवार्ड लेने से इंकार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगता था चंद्रमुखी का रोल पारो के रोल के पैरेलल है और ऐसे में उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मिलना चाहिए था. इस साल बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड “सीमा” फिल्म के लिए नूतन को दिया गया था.

फिल्म दिलीप कुमार के अभिनय, बिमल रॉय के निर्देशन के अलावा कमल बोस की सिनेमेटोग्राफी के लिए भी जानी जाती है. फिल्म में एस डी बर्मन का संगीत और साहिर लुधियानवी के गीत हैं. फिल्म में बाउल संगीत की परंपरा में कुछ गीत हैं, वहीँ चंद्रमुखी पर ठुमरी फिल्माए गए हैं. तलत महमूद की आवाज में दर्द से भरा एक नगमा काफी मक़बूल हुआ, मितवा नहीं आये. रफ़ी की आवाज में भी एक गीत है, “मंज़िल की चाह में”. पारो पालकी में जा रही है, उधर से चंद्रमुखी भी आ रही है. रास्ते में दोनों की नज़रें मिलती हैं. कहारों का कोरस और रफ़ी की आवाज. बेहद प्रभावशाली गीत बन पड़ा है.

बिमल रॉय की “देवदास” शरत के ‘देवदास” के साथ छेड़छाड़ नहीं करती:

देवदास के किरदार को ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने अपनी नेचुरल एक्टिंग से इंडियन सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया. बिमल रॉय ने उपन्यास की मूल भावना से खिलवाड़ नहीं किया और 1900 के शुरूआती दशकों के बंगाल, तत्कालीन समाज के चित्रण पर ध्यान दिया है. दिलीप कुमार ने सिर्फ डायलाग ही नहीं, बल्कि चलने, देखने, ठहराव लेने, चुप्पी हर भाव से देवदास को जिया है. देवदास एक एंग्री यंग मैन है, उसे गुस्सा है समाज से, अपने घरवालों से जिन्होंने पारो से उसके मिलन को रोका. पर तमाम गुस्से के बावजूद वो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का शिकार हो जाता है, वो ठोस निर्णय नहीं ले पाता। पारो के प्रति अपनी भावनाओं के प्रति भी वो निश्चित नहीं है. पारो यक़ीनन देवदास से ज्यादा दृढ़निश्चयी है, तभी तो वो अपनी मर्यादा का ख्याल न करके आधी रात को देवदास के कमरे में चली आती है, और देवदास उसके दुस्साहस से हतप्रभ है.

पारो से बिछड़ने के बाद देवदास पारो के प्रति अपनी भावनाओं को समझ पाता है. पर तमाम शिक्षा और तरक्की के रास्ते उपलब्ध रहने के बावजूद देवदास अतीत से निकल नहीं पाता। वो घुलता रहता है, खुद को बर्बादी के रास्ते पर ले जाता है. ये कहीं न कहीं उसका व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध है. वो चंद्रमुखी के साथ वक़्त तो बिताता है, पर उसे अपना प्रेम नहीं दे पाता। अपने अनिर्णय के चलते देवदास शेक्सपियर के किरदार ” हैमलेट” की याद दिलाता है. साथ ही मन में ये ख्याल भी आता है कि कहीं न कहीं शरत चंद्र लैला मजनू और हीर रांझा के 20वी सदी के अवतार को गढ़ने की महत्वाकांक्षा लिए देवदास उपन्यास लिख रहे होंगे.

बिमल रॉय की फिल्म हालाँकि व्यवसायिक रूप से सफल नहीं रही, पर फिल्म इंडियन सिनेमा का ट्रू ब्लू क्लासिक है. फिल्म को दिलीप साहब की बेमिसाल अदाकारी के लिए तो देखना ही चाहिए, पर साथ ही मोतीलाल के किरदार चुन्नी बाबू के लिए और साथ ही सुचित्रा सेन के पारो के लिए भी देखा जाना चाहिए.
फिल्म देखने के बाद दर्शकों के मन में सवाल तैरता रह जाता है कि आखिर क्या बात है, बिना कोई हीरोइक क्वालिटी लिए देवदास कैसे जनमानस पर छा गया है. क्या मानव को उसके स्वाभाविक गुण, दुर्गुण के साथ चित्रित करने की शरत की खासियत और आम जीवन की तर्ज पर किसी विलेन का न होना और परिस्थितियों का दोषी होना फिल्म और इस उपन्यास की कालजयी अपील के लिए जिम्मेवार है? सवाल रह जाता है, स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाता.

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