अनुराधा की हार और मिसेज निर्मल चौधरी की जीत के जरिये नारी विमर्श करती क्लासिक फिल्म “अनुराधा”

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

1957 में मुसाफिर और 1959 में अनाड़ी के बाद अनुराधा हृषिकेश मुख़र्जी की निर्देशित तीसरी फिल्म है. प्रेम, फिर विवाह और विवाह के बाद पति के लिए पत्नी का अपना करियर, अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग, परिणामस्वरूप मन में उपजी उलझन और फिर फैसला – इस फिल्म का थीम है. पर क्या एक महिला अपने फैसलों को तर्क और ठोस मानसिक धरातल पर ले पाती है या उसके फैसले उसके नहीं होते? परिस्थितियों में उलझकर क्या वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठती है?

हृषिकेश मुख़र्जी बिमल रॉय के रास्ते चलते हुए व्यवसाय और कला को साधते या साधने का प्रयास करते नज़र आते हैं. ऐसे प्रयास में अक्सरहां वे सवाल खड़े करने के बाद सवाल का जवाब देते नज़र नहीं आते. बल्कि वे दर्शकों पर निर्णय का फैसला छोड़ते हैं.

फिल्म की कहानी पति पत्नी के सम्बन्ध के इर्द गिर्द बुनी हुई है:

13 साल बाद हृषिकेश मुख़र्जी ने 1973 में  एक बार फिर पति पत्नी के संबंधों को, उसके तमाम मतभेदों, मन मुटाव और महत्वाकांक्षाओं के टकराव के साथ उठाया है फिल्म अभिमान में और एक बार फिर वे कोई स्पष्ट उत्तर लेकर नहीं आते और दर्शकों पर निर्णय छोड़ते हैं.

एक अमीर बाप की बेटी अनुराधा रॉय ( लीला नायडू) एक उभरती हुई गायिका हैं. संगीत ही उनका जीवन है. वे डॉक्टर निर्मल चौधरी ( बलराज साहनी) से प्यार कर बैठती हैं. युवा डॉक्टर आदर्शवादी डॉक्टर है, उसके बारे में राय है कि वो बहुत टैलेंटेड डॉक्टर है, पर जीवन में अपने आदर्शों की वजह से सफल नहीं हो पायेगा. निर्मल अकेला है, बचपन में उसकी माँ चल बसी थी इसलिए नहीं , निर्मल के शब्दों में, कि वो बचाई नहीं जा सकती थी, बल्कि गांव में 20-20 कोस दूर दूर तक कोई डॉक्टर नहीं था. डॉक्टरी इलाज की कमी के चलते अपनी माँ को खो देने वाले निर्मल सबक जीवन भर न भूल सका. उसने प्रण कर लिया है कि वो डॉक्टरी का पेशा शहर में पैसे बनाने के लिए नहीं, बल्कि गांव में गरीबों की मदद करने के लिए करेगा.

ऐसे डॉक्टर से शादी का फैसला जब अनुराधा अपने पिता ( हरी शिवदासानी) को सुनाती है, तो वे काफी नाराज़ होते हैं, उन्होंने अपनी बेटी अपने स्वर्गवासी दोस्त के बड़े दीपक ( अभी भट्टाचार्य) से करने का फैसला किया है. दीपक विलायत से पढ़कर आया है, इंजीनियर है. पिता की नज़र में समाज में निर्मल की तुलना में ज्यादा तेजी से आगे बढ़ेगा, पैसे कमायेगा. पर जब अनुराधा पिता की इच्छा के विरुद्ध निर्मल से विवाह कर लेती है, तो पिता अनुराधा से सारे सम्बन्ध तोड़ लेते हैं.

शादी के बाद नव दम्पत्ति एक गांव में आ बसते हैं. आज़ादी के बाद का भारत का एक गांव. गरीबी, भुखमरी से पीड़ित. निर्मल अपने काम में डूब जाता है. इलाज करते करते कभी कभी उसे निराशा घेर लेती है. आनंद के डॉक्टर बनर्जी की तरह वो भी cynic हो उठता है: गरीबी सबसे बड़ी बीमारी है. वो सोचता है. गांव के ज़मींदार का इलाज करते हुए उसके मन में ख्याल आते हैं, अजीब दुनिया है, कोई भूखों मरता है कोई खाके मरता है !!

गांव में एक आत्माराम है जिसे लोग जोरू का गुलाम कहकर चिढ़ाते हैं. पत्नी के दांत में दर्द होता है, तो आत्माराम अपने जबड़े को थामे डॉक्टर के पास इलाज के लिए आता है. लोग हँसते हैं, पर आत्माराम के बहाने फिल्म एक सवाल खड़े कर रही है, क्या पत्नी के बारे में सोचना, उसका ख्याल करना क्या नामर्दी है? क्योंकि बस कंडक्टर सीना चौड़ा करके डॉक्टर से कहता है पत्नी उससे कहती रहती है, पर वो अनसुनी कर देता है. कहीं न कहीं ये सवाल हमें निर्मल के अनुराधा के प्रति दृष्टिकोण पर भी ध्यान लेकर जाते हैं.

शादी से पहले अनुराधा का अपना करियर था, उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं, पर शादी के बाद वे गांव में आकर बंध ही गयी है, शाम के बाद गांव में कोई सोशल लाइफ नहीं, पति के पास उसके लिए वक़्त नहीं. बस अपनी बेटी रानू से बात चीत करके वो अपने दिन जैसे तैसे काटती है.

निर्मल से पूछती है, सबकी बिमारी के बारे में सोचते हो, कभी मेरी बिमारी के बारे में सोचते हो? क्यों तुम्हे क्या बीमारी है, निर्मल आश्चर्यचकित होकर पूछता है.
प्रेम की नींव पर अपने दाम्पत्य जीवन की शुरुआत करने वाले दंपत्ति के जीवन में प्रेम कैसे ख़त्म होता जा रहा है, निर्मल इस एहसास से परे है. संगीत को अपना जीवन समझने वाली अनुराधा को वो कहता है, तुम्हारा संगीत मुझे डिस्टर्ब कर रहा है, यह खिड़की बंद कर दो.
शादी की सालगिरह पर अनुराधा वही साडी पहन कर सजती है, पर निर्मल खुद के द्वारा गिफ्ट की गयी साडी को पहचान नहीं पाता पर आश्चर्य यही निर्मल एक बीमार स्त्री के पति को डांटता है, इतना काम कि बीबी का भी ख्याल नहीं रख सकते. फिर शादी क्यों की?

इधर अनुराधा घर में बैठी बैठी बोर हो रही है. वीणा पर धूल की मोती परत जम गयी है, उसके गीतों की डायरी पड़ी पड़ी धूल खा रही है. सपने धीमी लेकिन निश्चित मौत मर रहे हैं. साथ में पुरानी खुशमिज़ाज़, सपनों से आंदोलित अनुराधा भी.
” बंद करो इसे, गाना तो कब का ख़त्म हो गया” घर में घुसते हुए निर्मल कहता है. रिकॉर्ड चल रहा है. अनुराधा कहती है, “हाँ गाना तो ख़त्म हो गया है. ‘

खिड़की पर खड़ी अनुराधा हर घडी बाहर देखती हुई एक बार बार इमेजरी के रूप में फिल्म में इस्तेमाल किया गया है. मानो घर अनुराधा के लिए बंदी जीवन है.
देखते देखते दस साल बीत जाते हैं. एक दिन गांव के बाहर की सड़क पर भीषण मोटर दुर्घटना हो जाती है. घायल युगल को डॉ निर्मल मुख़र्जी के पास इलाज के लिए लाया जाता है. पुरुष, अनुराधा का पुराना मित्र दीपक है. और महिला दीपक की साथी है. महिला बहुत जख्मी है, दीपक अनुराधा के घर ठहरता है. दीपक के अनुरोध पर अनुराधा गाना सुनाती है. उसे गीत के बोल याद नहीं, वो डायरी निकालती है. दीपक अनुराधा के गायन में खोया हुआ है, पर निर्मल किताब को पलट रहा है. एकदम निर्विकार.
दीपक बार बार अनुराधा को उसके सपनों की याद दिलाता है. ” तुमने सोने को मिटटी में ,अनुराधा? ” अनुराधा दाम्पत्य जीवन, अपनी बेटी, अपने पति के तरफ फ़र्ज़ का हवाला दे रही है, दीपक उसे अपने प्रति फर्ज की याद दिलाता है. तुम्हारी असली पहचान अनुराधा रॉय है, मिसेज चौधरी नहीं.

दीपक की बात उसे उद्द्वेलित करती है, वो विचलित होती है, पर यथास्थिति से निकलने का हौसला नहीं जुटा पाती है, वो दीपक को भला बुरा कहती है. दीपक कहता है, सोये हुए को जगाना आसान है, पर जागे हुए को होश में लाना। .. हहहह ”

इधर निर्मल ने घायल महिला का स्किन ग्राफ्ट करके इलाज कर दिया है. शहर से आये बड़े डॉक्टर ( नासिर हुसैन) और महिला के पिता आश्चर्यचकित हैं. निर्मल खुश है, पर अनुराधा ने उसे फैसला सुना दिया है, वो अपने करियर को पुनर्जीवित करने शहर हमेशा हमेशा के लिए लौट जायेगी. निर्मल मानो अचानक एक सपने से बाहर निकलता है और दुःस्वप्न का सामना करता है. वो उससे डॉक्टर और उनके दोस्त के डिनर तक रुकने का आग्रह करता है. शानदार डिनर होता है. निर्मल की लेबोरेटरी भी देखते हैं दोनों. जब बिजनसमैन निर्मल को २०,००० का चेक देते हैं, तो डॉक्टर ( नासिर हुसैन) वो चेक अनुराधा को ये कहते हुए देते हैं कि इस पुरस्कार की असली हकदार अनुराधा है. जिसने निर्मल के सपनों को साकार होने के लिए अपने सपनों की कुर्बानी दे दी है. अनुराधा को भी मानो झकझोड़ दिया है कर्नल के शब्दों ने.

सुबह का समय है. निर्मल थका हुआ आराम कुर्सी पर ही सोया हुआ है. अचानक बाहर से कार का हॉर्न सुनकर हड़बड़ा कर निर्मल उठता है, बाहर दीपक कार में बैठा है, अनुराधा को शहर ले जाने के लिए. निर्मल तेज क़दमों से आशंकित सीढ़ियों से नीचे आता है, अनुराधा कमरे में झाड़ू लगा रही है. दीपक एक हलकी अफसोसनाक मुस्कान छोड़ता हुआ कार को बढ़ा देता है.

फिल्म में कोई विलन नहीं है, फिल्म में कोई हीरो नहीं, फिल्म में परिस्थितियां ही हीरो या विलन की भूमिका निभाती है.

फिल्म की बात हो और फिल्म के गीत संगीत की बात न हो, तो अन्याय हो जाएगा.
जब हृषिकेश मुख़र्जी फिल्म के संगीत के लिए बड़े गुलाम अली खान के पास पहुंचे, तो उन्होंने कहा, ओपी नैयर को ले लो, वो अभी बेस्ट है. पर ओपी ने बहुत ऊँची कीमत मांगी जो हृषिकेश मुख़र्जी के बजट से बाहर थी, शंकर जयकिशन बेहद व्यस्त थे, उनके पास फिल्म के लिए समय नहीं था. अंततः पंडित रविशंकर फिल्म में संगीत देने को तैयार हो गए, जब उन्होंने फिल्म की कहानी सुनी. शैलेन्द्र गीतकार के रूप में फिल्म का हिस्सा बने. इस फिल्म में रविशंकर ने बेहद खूबसूरत संगीत दिया है,
फिल्म का हर गीत, चाहे वो ” जाने कैसे सपनों में खो गयी अँखियाँ” या फिर राग खमाज पर आधारित ” कैसे दिन बीते, कैसे बीती रतियाँ, पीया जाने न” या फिर ” हाय रे वो दिन क्यों न आये” हो, हर गीत कहानी को आगे बढ़ाता है, और चरित्रों के बीच के तालमेल पर प्रकाश डालता है.
ये तीन गानों की रिकॉर्डिंग के बाद रविशंकर विदेश चले गए अपने प्रोग्राम के सिलसिले में, तब हृषिकेश मुख़र्जी ने राग भैरवी पर आधारित ” सांवरे सांवरे” की रिकॉर्डिंग खुद ही कर ली थी.
इन चार गानों के अलावा एक नृत्य नाटिका भी है जिसमे महेंद्र कपूर, मन्ना डे और लता मंगेशकर की सामूहिक आवाज है, बहुत दिन हुए तारों के देश में” जो कुल 12 मिनट का है और अनुराधा के उभरते सिंगिंग करियर की ओर इशारा करता है. इसके अलावा मन्ना डे का सोलो ” सुन मेरे लाल, यूँ न हो बेहाल” बेहद प्रभावशाली बन पड़ा है.

फिल्म नारी विमर्श करती है, पर नारी विमर्श को बढ़ाती नज़र नहीं आती

हमारी फ़िल्में अक्सरहां गड़बड़ा जाती हैं जब अनुराधा ने तय कर लिया कि उसे निर्मल को छोड़कर चले जाना है, तो ये उसका हार्ड फैक्ट, तर्क पर आधारित फैसला था, पर एक डिनर पार्टी में डॉक्टर की तारीफ़ उसके निर्णय को बदलने पर मज़बूर कर देती है. संगीत उसका पहला प्यार है, उसे भी एक पहचान चाहिए, और निर्मल अपनी धुन में सब कुछ भूल चुका है. अमीर घर की लड़की अपने घर को छोड़ कर आयी है, पिता से विद्रोह करके उसके पास आयी है, पर वो ये सब देख नहीं पाता। निर्मल उसका फैसला नहीं बदल सकता, और उसने भी अपना मन बना लिया है, पर डॉक्टर की तारीफ, उसके त्याग की, समर्पण की प्रशंसा उसे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को मज़बूर कर देती है. तो क्या संगीत उसका प्यार नहीं है, बल्कि अपनी पहचान, एक रिकग्निशन उसकी जरुरत है? एक आइडेंटिटी उसे भी चाहिए, जो डॉक्टर के शब्द के जरिये उसे मिलते हैं, उसके आत्मसम्मान को एक दिलफ़रेब सहलाना हुआ है और अब वो निर्मल को छोड़ कर नहीं जाएगी.
अनुराधा अपना जीवन मिसेज निर्मल चौधरी के रूप में गुजारेगी, अनुराधा रॉय उभरती हुई गायिका मर गयी है, नहीं कह सकते कि एक स्त्री के लिए ये सम्मान का रास्ता मिला है, परिवार के लिए उसने अपने सपनों की बलि चढ़ा दी है, वे सपने जो उसे बार बार अतीत कीओर ले जाते थे पर अब उसके मन के सारे अंतर्विरोध शांत हो चुके हैं. क्या सच में उसे हर सवाल का समाधान मिल गया है? हृषिकेश मुख़र्जी ये फैसला दर्शकों पर छोड़ते हैं.

फिल्म नारी विमर्श करती है, पर नारी विमर्श को बढ़ाती नज़र नहीं आती.  पुरुषवादी सोच सदैव इस पर सहमत रहा है. पति पत्नी के करियर का जब सवाल आये, तो परिवार के हितों की बेदी पर पत्नी के करियर की ही बलि दी जाती है. भारतीय समाज इस स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट है और फिल्म भी यही समाधान दिखाती है. पर इस समाधान के साथ फिल्म अनुराधा के तमाम मनोदशा को खारिज भी करती नज़र आती है, जिसे बहुत मेहनत से हृषिकेश मुख़र्जी तैयार करते नज़र आते हैं.
इस लिहाज से महेश भट्ट की अर्थ ज्यादा सार्थक फिल्म बन सकी है. क्योंकि फिल्म के अंत में अपने पति से ठुकराई, अपमानित शबाना आज़मी अपने पुरुष मित्र का साथ लेने से इंकार करती है और फिल्म ये सन्देश देती है कि एक महिला के लिए पुरुष का हर स्टेज पर साथ desirable हो सकता है, जरुरी नहीं.

फिल्म में लीला नायडू सरप्राइज पैकेज हैं, पर फिल्म में scene stealer बलराज साहनी हैं:

फिल्म में लीला नायडू सरप्राइज पैकेज की तरह हैं. 1954 में दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं में शुमार लीला नायडू ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि उनका फिल्मों के काम करने में उनकी कोई रूचि नहीं थी और वे राज कपूर को चार बार मना कर चुकी थीं. पर जब उन्होंने अनुराधा फिल्म का स्क्रिप्ट पढ़ा, तो वे अपने आप को रोक नहीं सकीं। हीरोइन ओरिएंटेड फिल्म में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है, अनुराधा के मन की व्याकुलता को उन्होंने जिया है, हालाँकि फिल्म में बलराज साहनी की एक्टिंग सबसे बेहतरीन है. एकदम नेचुरल अंदाज़,बिना किसी ड्रामा के उन्होंने आदर्शवादी डॉ निर्मल चौधरी के किरदार को जिया है, एक डॉक्टर जो गांव में जाकर गरीबों की सेवा में इतना तल्लीन हो गया है कि अपनी पत्नी को उसने guranteed ले लिया है, और होश में तब आता है जब वो अपनी पत्नी को खो देने वाला होता है. बिना ओवर द टॉप एक्टिंग के बलराज साहनी ने आदर्शवादी डॉक्टर के किरदार को इंडियन सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया है. आप लम्बे अरसे तक इस डॉक्टर को नहीं भूलेंगे. फिल्म के अन्य कलाकारों ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.

फिल्म हालाँकि व्यवसायिक दृष्टि से सफल नहीं हुई, वैसे इसे बेस्ट फीचर फिल्म का प्रेजिडेंट मैडल मिला. “अनुराधा” इंडियन सिनेमा का क्लासिक है. इस जरूर देखा जाना चाहिए.

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