मैक्लुस्कीगंज को बैकग्राउंड बनाकर बनी फिल्म, “A Death in The Gunj”

Balendushekhar Mangalmurty

2016 में कोंकणा सेन शर्मा ने फिल्म बनायी थी- “A Death in The Gunj”. फिल्म एंग्लो इंडियन लोगों की बस्ती मैक्लुस्कीगंज को बैकग्राउंड बनाकर बनायी गयी है. 1979 का समय है. कोंकणा की ये पहली फिल्म मैक्लुस्कीगंज पर बेस्ड होने की एक बड़ी वजह ये हो सकती है, कि उसकी माँ मशहूर फिल्म मेकर अपर्णा सेन की कोठी रही है वहां, जो अब कोंग्रेसी नेता सुबोध कान्त सहाय ने खरीद ली है. मैक्लुस्कीगंज में कभी एंग्लो इंडियन लोगों की बस्ती रही थी, पर फर्स्ट जनरेशन एंग्लो इंडियन लोगों का देहांत हो चूका है और सेकंड जनरेशन एंग्लो इंडियंस बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसरों की तलाश में या तो इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग या फिर भारत में ही बड़े शहरों जैसे कलकत्ता में जा बसे हैं.

ये ऐसे ही कुछ लोगों की कहानी है जो छुट्टियां बिताने मैक्लुस्कीगंज आये हैं. फिल्म पात्रों के आपसी संबंधों के ताने बाने, उनके रिश्तों के उतार चढ़ाव पर फोकस करती है और फिल्म में रिश्तों की उलझन पर जोड़ है.

फिल्म शुरू होती है. 1979 का साल है. ब्रायन, और नंदू कार की डिक्की खोलकर एक लाश को देखते हैं और सोचते हैं कैसे इसे डिक्की में ठीक से रखा जाए.
वहां से फिल्म फ़्लैश बैक में चली जाती है. एक सप्ताह. सप्ताह का हर एक दिन.
मैक्लुस्कीगंज में नंदू अपने माँ बाप को कोठी पर अपनी बेटी और पत्नी के साथ आया है. उसके साथ है उसका कजिन श्यामल उर्फ़ शुतु और एंग्लो इंडियन मिमी . उन्हें वहां ज्वाइन करने के लिए आते हैं विक्रम और ब्रायन.

ये कलकत्ता में रहते हैं. शुतु की मां बर्धमान में रहती है. शुतु हायर एजुकेशन कलकत्ता में पा रहा है, पर वो फाइनल एग्जामिनेशन में फेल हो गया है. उसने हाल फिलहाल अपने पिता को खोया है. ब्रायन को विदेश में नौकरी का ऑफर मिला है और कुछ दिनों में वो ऑस्ट्रेलिया चला जाएगा. शुतु एक सेंसिटिव पर्सन है और उसके साथ पिता के खोने का दर्द है. पर शुतु की ;सेंसिटिविटी मजाक का विषय बनती है और खासकर वो विक्रम के निशाने पर रहता है. विक्रम और मिमी अफेयर में हैं. विक्रम की हालफिलहाल शादी हुई है. मिमी की तरफ शुतु भी आकर्षित है. विक्रम फ्लेमबॉयंट पर्सन है जबकि शुतु एक शांत, अपने में सिमटा, अपनी मानसिक उलझनों में जकड़ा इंसान है.

शुतु के साथ अधिक समय उसकी भतीजी बिताती है. 6 साल की बच्ची – तानी, नंदू और बोनी की बेटी. एक एक दिन करके समय बीत रहा है. खाते पीते, पार्टी करते, मस्ती में. शुतु विक्रम से मन ही मन ईर्ष्या करता है और चाहता है कि मिमी का प्यार उसे मिले. पर मिमी उस पर ध्यान नहीं देती. पर एक बार बाइक पर बाहर घुमाने के लिए मिमी को विक्रम नहीं ले जाता, और उसका अपमान कर देता है. मिमी अपमानित महसूस करती है. उस रात मिमी और शुतु करीब आते हैं. शुतु का मानो कोई मनचाहा सपना पूरा हो गया हो ! वो ख्वाब बुनने लगता है. एक बार वो बाइक पर मीमी को घुमाने ले जाता है, उसके पीछे तानी भी आती है, उसकी भी इच्छा है कि वो बाइक पर घूमे.

शाम में जब दोनों लौटते हैं, तो तानी का कहीं पता नहीं चल रहा. सब परेशां हैं. शुतु को जमकर खरी खोटी सुनाते हैं. सब मिलकर तानी को खोजने निकलते हैं. जंगल में सर्च पार्टी में नंदू और शुतु एक साथ हैं. जंगल में तानी को खोजते खोजते शुतु एक गड्ढे में गिर जाता है. पर उसे साथ लिए बगैर नंदू कोठी पर लौट आता है. नंदू घर पहुँचता है तो पाता है कि तानी को विक्रम ने खोज लिया है. डिनर पर जब एक साथ सब जुटते हैं तो शुतु नहीं पाया जाता. उसे खोजने के लिए नौकर को भेजा जाता है. नौकर उसे लेकर आता है. शुतु कोठी पर पहुँचता है तो देखता है उसे किसी ने मिस नहीं किया। सब डिनर में लगे हुए हैं. शुतु को बेहद तकलीफ होती है.
नंदू की माँ शुतु को समझाती है कि वो घर लौट जाए और अपनी माँ का ख्याल रखे. शुतु बर्धमान का टिकट ले आता है. मीमी से जब वो कहता है कि वो उससे मिलने कलकत्ता आएगा, तो मिमी उसे बेहद कोल्ड रिस्पांस देती है और उसे पढ़ाई पर ध्यान लगाने की सलाह देती है.
अगले दिन नंदू के पिता ओपी शूटिंग प्रैक्टिस करने की तैयारी कर रहे हैं. और लोग गार्डन के एक कोने में धुप सेंक रहे हैं. विक्रम और मिमी एक दूसरे के बेहद करीब समय बिता रहे हैं. शुतु को ओपी समझा रहे हैं कि कैसे फायरिंग की जाती है. शुतु रह रह कर विक्रम और मिमी की ओर देख रहा है मानो उसके हृदय से धुंआ निकल रहा है, मानो उसका कुछ बेशकीमती खो रहा है.
तभी अचानक से शुतु ओपी से गन छीन लेता है. विक्रम उसकी ओर बढ़ रहा है. गन दे दो. कूल डाउन, शुतु. सब हतप्रभ हैं. पर शुतु अपने गर्दन से सटा कर गन फायर कर देता है. विक्रम का चेहरा खून से नहा जाता है.

यहाँ से फिल्म फ्लैशबैक से निकलकर उस समय पर चली जाती है, जहाँ ब्रायन और नंदू कार की डिक्की खोलकर लाश को ढंग से रखने पर चर्चा कर रहे होते हैं. लाश को डिक्की में एडजस्ट करने के बाद कार कलकत्ता की ओर निकल पड़ती है.
कार की फ्रंट सीट पर नंदू और ब्रायन बैठे हुए हैं और बैक सीट पर शुतु !!

दर्शक सोच में पड़ जाता है अगर शुतु कार में बैठा हुआ है, तो फिर डिक्की में लाश किसकी है? कोई जवाब नहीं है इसका.

फिल्म को अगर गौर से देखें तो फिल्म फिल्मकार की पहली फिल्म की कमजोरियां समेटे हुए हैं. सस्पेंस फिल्म में बनाया गया है, जबकि फिल्म जासूसी थ्रिलर नहीं है. फिल्म ह्यूमन रिलेशन्स पर फोकस करती है, ऐसे में गंज ( मैक्लुस्कीगंज) कहीं उभरकर नहीं आ पाता। ये फिल्म किसी और हिल्ली लोकेशन पर फिल्मायी जाती और वो नाम रख दिया जाता, तो फर्क नहीं पड़ता. कहानी कोठी के अंदर ही चलती रहती है, और ये कोठी हिंदुस्तान में कहीं भी हो सकती थी.
पर इसके बाद भी फिल्म एक वार्म फीलिंग दे पाने में सफल हो पाती है, वजह इसके चरित्रों का चरित्र चित्रण, समर्थ एक्टिंग और फिल्म की धीमी गति, जिसके चलते फिल्म घटना प्रधान न होकर, चरित्र प्रधान हो पाती है और हम विक्रम के arrogant haughty करैक्टर को समझ पाते हैं, शुतु के साथ सिम्पथी एक्सप्रेस कर पाते हैं, ओपी के रूप में ओमपुरी के रिटायर्ड लाइफ और आराम का आनंद ले पाते हैं, नंदू के बिग ब्रदर एट्टीट्यूड को समझ पाते हैं.

कुल मिलाकर फिल्म एक अच्छी फिल्म कही जायेगी. इसे देखा जा सकता है. बस मैक्लुस्कीगंज को समझने की उम्मीद इस फिल्म से न रखी जाए.


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