नानावटी मर्डर केस से प्रेरित गुलज़ार निर्देशित फिल्म “अचानक” जिसमे एक भी गाना नहीं था

Balendushekhar Mangalmurty 

1973 में गुलज़ार ने एक फिल्म निर्देशित की थी, जो नानावटी मर्डर केस से प्रेरित थी, और जिसमे एक भी गाना नहीं था. हालाँकि गुलज़ार एक बेहद शानदार गीतकार रहे हैं, और फिल्म से प्रसिद्द संगीतकार सलिल चौधरी भी जुड़े थे. पर सलिल चौधरी की भूमिका इस फिल्म में बैकग्राउंड म्यूजिक देने की है. फिल्म में मुख्य भूमिका में विनोद खन्ना हैं और एक्ट्रेस हैं बंगाली अभिनेत्री लिली चक्रवर्ती. 1941 में ढाका में जन्मी लिली चक्रवर्ती ने बंगला और हिंदी फिल्मों में काम किया। अचानक के अलावा उन्होंने चुपके चुपके, अलाप आदि हिंदी फिल्मों में काम किया.

नानावटी मर्डर केस से प्रेरित दो और फ़िल्में बनी हैं.

नानावटी मर्डर केस से प्रेरित दो और फ़िल्में बनी हैं. एक, 1963 में सुनील दत्त और लीला नायडू अभिनीत “ये रास्ते हैं प्यार के” और 2016 में अक्षय कुमार अभिनीत ” रुस्तम”.

“अचानक” फिल्म की प्रेरणा भी नानावटी मर्डर केस रही, हालाँकि ये फिल्म पूरी तरह इस मर्डर केस के प्रति समर्पित नहीं रही. 27 अप्रैल 1959 को इंडियन नेवी के कमांडर कावस एम नानावटी ने अपनी अँगरेज़ पत्नी सिल्विया के प्रेमी प्रेम आहूजा की गोली मारकर हत्या कर दी. नानावटी ने गुस्से में आकर नहीं, बल्कि पूरी प्लानिंग के साथ आहूजा का मर्डर किया, खासकर जब आहूजा ने सिल्विया से शादी करने से इंकार कर दिया.

प्रेम आहूजा और नानावटी दोनों एक दूसरे को पिछले 15 सालों से जानते थे. बिजनसमैन प्रेम आहूजा एक प्लेबॉय था, जिसने नानावटी की लम्बे लम्बे समय तक घर से दूर रहने का फायदा उठाते हुए सिल्विया के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेता है.
इस कोल्ड ब्लडेड मर्डर केस ने देश में तहलका मचा दिया. पारसी कम्युनिटी के साथ साथ जनता और मीडिया की सहानुभूति नानावटी के साथ थी. खुद कोर्ट रूम में ट्रायल के दौरान सिल्विया ने भी पति का पक्ष लिया. बॉम्बे सेशन कोर्ट में जूरी ने नानावटी को निर्दोष करार दे दिया, जज ने जूरी के फैसले से असहमति जताते हुए इस केस को बॉम्बे हाई कोर्ट रेफेर कर दिया. बॉम्बे हाई कोर्ट ने नानावटी को हत्या का दोषी माना और आजीवन कारावास की सजा सुनाई. पर नानावटी के पक्ष में अपार जन समर्थन को देखते हुए राष्ट्रपति ने नानावटी को माफ़ी दे दी. नानावटी अपनी फॅमिली के साथ कनाडा चले गए. कनाडा में ही 2003 में उनकी मृत्यु हुई. नानावटी मर्डर केस अंतिम मामला था जिसमे जूरी ने फैसला दिया. केंद्र सरकार ने इसके बाद जूरी सिस्टम को समाप्त कर दिया.

फिल्म की कहानी:

फिल्म में मेजर रणजीत खन्ना को कोर्ट ने अपनी पत्नी पुष्पा ( लिली चक्रवर्ती) और अपने मित्र प्रकाश की हत्या के जुर्म में सजाये मौत सुनाया है. रणजीत आर्मी का डेकोरेटेड मिलिट्री अफसर है. उसके सीनियर लेफ्टिनेंट कर्नल बख्शी ( इफ्तेखार), जो उसके ससुर भी हैं के शब्दों में, वो हर पल ज़िंदा था, छलकता रहता था.. दुश्मनों की बड़ी फ़ौज से खड्काली चौकी बचाने के लिए वीर चक्र से सम्मानित रणजीत एक जिंदादिल इंसान है जिसका मानना है कि शराब और बिना गाली के एक सोल्जर का कोई वजूद नहीं.

रणजीत को अपनी पत्नी पुष्पा से बेहद प्रेम है. ड्यूटी पर रहने के दौरान उसकी पत्नी और वे दोनों एक दूसरे को चिट्ठी कैसेट में रिकॉर्ड करके भेजते रहते हैं. एक बार दौड़ लगाते समय लेफ्टिनेंट कर्नल बख्शी उसे पत्नी की आवाज में टेप रिकार्डेड गाना सुनते पकड़ लेते हैं और उसे कड़ी सजा देते हैं.

फिल्म की कहानी एक सीधी दिशा में नहीं चलती, बल्कि फ्लैशबैक में बार बार जाती रहती है. उसे याद करते हुए बख्शी कहते हैं, जो कुछ उसने आर्मी में सीखा, उसे अपने दो अजीज लोगों पर इस्तेमाल किया. बख्शी हॉस्पिटल में डॉक्टर चौधरी ( ओम शिव पुरी ) के सामने बैठे हुए हैं. गोलियों से घायल रणजीत का अस्पताल में इलाज चल रहा है. इलाज के दौरान डॉक्टर, नर्स रणजीत के विल पावर से चमत्कृत रह जाते हैं और उससे लगाव हो जाता है.

रणजीत बेड पर लेटा है. कहानी एक बार फिर फ्लैशबैक में चली जाती है. रणजीत अपनी बहादुरी के लिए मैडल लेकर घर लौटा है. वह पुष्पा को मैडल दिखाना चाह रहा है. घर पर पुष्पा नहीं है. मेड ने कहा, प्रकाश के साथ वो उसके झील की तरफ फिशिंग के लिए गयी है. रणजीत जल्दी जल्दी वहीँ पहुंचता है. पर वहां अपने जिगरी दोस्त प्रकाश और पुष्पा को प्रेम में मगन देखकर रणजीत एक बार को गश खाकर गिर जाता है. मैडल उसके हाथ से छूट जाता है. मानो मैडल की चमक धुल धूसरित हो गयी हो. कहानी वहां से युद्ध के मैदान में चली जाती है.

रणजीत परेशां है. घर लौट आया है. पुष्पा भी आती है कुछ देर में. रणजीत को अचानक से घर पर देखकर हैरत में पड़ जाती है. रणजीत के लिए कपडे अलमीरा से निकालती है, तो उसके कपड़ों से प्रकाश की तस्वीर निकल आती है.
रूम में अकेले होने पर रणजीत उस तस्वीर को टुकड़े टुकड़े करके खिड़की से उड़ा देता है, मानो उसकी हरकत उसकी मनोदशा का परिचायक है.
अगले दृश्य में रणजीत और प्रकाश, प्रकाश के बोट हाउस पर हैं. प्रकाश हंसी मजाक की बातें कर रहा है. पीछे खड़ा रणजीत सुन रहा है और चेहरे पर कठोरता के भाव आते हैं. उसका हाथ उसके चाकू पर जाता है. अगला दृश्य में दिखता है कि तालाब के पानी में खून की बूंदे मिल रही हैं.
अगले दृश्य में घर पर रंजीत और पुष्पा बैडरूम में लेटे हुए हैं. कैमरे का फोकस बार बार दीवार पर टंगी दो तलवारों पर जा रहा है. मानो कहानी कहने के मूल मंत्र की ओर इशारा हो. चेखोव कहते हैं, अगर कहानी में दीवार पर तलवार टंगी दिखाई गयी है, तो उसका इस्तेमाल होना चाहिए.
पुष्पा सोई हुई है. रणजीत के हाथ पुष्पा के गालों, सिर को सहलाते हुए धीरे धीरे उसके गर्दन की ओर बढ़ जाते हैं. अगले दृश्य में पुष्पा मृत पायी जाती है.
दोनों ही दृश्यों में graphical वायलेंस का इस्तेमाल नहीं किया गया है. संकेतों से कहानी आगे बढ़ाई गयी है.

कहानी फिर से उछल कर अलग टाइम फ्रेम में चली जाती है. कोर्ट से अंतिम इच्छा के तौर पर रणजीत ने अपनी पत्नी के कमरे में कुछ समय बिताने की इच्छा जाहिर की है. जज ने उसकी इच्छा मान ली है. कमरे में उसे पुष्पा का मंगलसूत्र मिलता है. उसे आता है कि पुष्पा की इच्छा थी कि अगर वो मर जाए तो उसके मंगलसूत्र को गंगा में बहा दिया जाये. रणजीत पुलिस के पहरे के बीच कमरे से खिड़की के रास्ते फरार हो जाता है.
उसकी तलाश में पुलिस लग जाती है. जंगल में रणजीत भागा जा रहा है. पुलिस के ट्रेंड डॉग्स उसके पीछे लगे हैं. आर्मी ट्रेनिंग में सीखे गए सबक का इस्तेमाल वो पुलिस पार्टी को देर तक चकमा देने में करता है. पर अंत में पुलिस उसे बन्दूक के निशाने पर ले लेती है.

वो अस्पताल में पड़ा है. उसके ससुर बख्शी साहब हायर कोर्ट में उसकी जान बख्शने के लिए अपील करते हैं. अपील खारिज हो जाती है. यह समाचार सुनकर हॉस्पिटल के डॉक्टर और नर्स बेहद उदास हो जाते हैं. खुद बख्शी साहब की आँखों में आंसू हैं. रणजीत को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाता है.

विनोद खन्ना के करियर की अहम् फिल्म:

फिल्म अपने अंत के लिहाज से नानावटी मर्डर केस हिस्ट्री से हट गयी है. इस फिल्म को महज 28 दिनों में पूरा कर लिया गया था. ख्वाजा अहमद अब्बास ने इसकी कहानी लिखी थी. इससे पहले गुलज़ार ने विनोद खन्ना के साथ मेरे अपने फिल्म में काम किया था. इस फिल्म में भी “कोई होता जिसको हम अपना कह लेते” गाने की धुन को बैकग्राउंड म्यूजिक में सलिल चौधरी ने इस्तेमाल किया है, जब लेफ्टिनेंट कर्नल बख्शी मेजर रणजीत से अंतिम सैल्यूट ले रहे होते हैं.

बॉलीवुड में अभी विनोद खन्ना का सिक्का जमा नहीं था और राजेश खन्ना की आंधी में विनोद खन्ना अपने आकर्षक व्यक्तित्व और चुनिंदा सफल फिल्मों जैसे इम्तिहान, मेरे अपने, अचानक आदि के बलबूते अपनी एक ख़ास जगह बना रहे थे और ओशो के चेले बनने से पहले अगले कुछ वर्षों में अमिताभ बच्चन के करिज्मा को जबरदस्त टक्कर देने वाले थे.

गुलज़ार जैसे समर्थ गीतकार और सलिल चौधरी जैसे दिग्गज संगीतकार के रहते हुए भी फिल्म में एक भी गाना न होना फिल्म मेकिंग के प्रति दोनों की ईमानदारी को दर्शाता है. फिल्म अपनी कसी पटकथा के लिए लीनियर स्टोरी टेलिंग को छोड़ने के लिए देखने लायक है.

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