“एक डॉक्टर की मौत” दीमक लगे सिस्टम की जीत है और डॉ दीपांकर रॉय के सपनों की हार है!

Balendushekhar Mangalmurty

80 के दशक के अंत होते होते “आशिक़ी” और “क़यामत से क़यामत तक” जैसी किशोरवय के प्रेम पर आधारित फिल्मों ने बॉलीवुड को हिंसा और सेक्स से लबरेज फिल्मों के दौर से बाहर निकाला. 80 के दशक के अंत होते होते उदारवाद, वैश्वीकरण, और नीजिकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था में निर्णायक तौर पर दखल देना शुरू कर दिया था. और इसके साथ ही सरकारों की एक्टिविटी का दायरा सिकुड़ने लगा था. और 70 के दशक से फिल्मों के निर्माण में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन के माध्यम से सरकार द्वारा शुरू की गयी फंडिंग भी जल्द ही बीते जमाने की बात होने वाली थी. सरकार की फंडिंग ने सामानांतर सिनेमा को जीवित किया और सिने प्रेमियों को कई यादगार फ़िल्में देखने को मिलीं. सरकारी फंडिंग के अंत होने के दौर में एक और यादगार फिल्म आयी, “एक डॉक्टर की मौत”.
31 अगस्त 1990 को NFDC के फण्ड से तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म ” एक डॉक्टर की मौत” कहानी है डॉ दीपांकर रॉय की, उनके सपनों की, भ्रष्ट और संवेदनहीन सिस्टम से टकरा कर उनके सपनों के चूर चूर होने की, ब्रेन ड्रेन की. फिल्म में मुख्य भूमिका निभायी पंकज कपूर ने और उनकी पत्नी के रूप में शबाना आज़मी. बेहद प्रतिभाशाली पंकज कपूर ने अपने करियर में बेहद कम फ़िल्में कीं. पर जिन फिल्मों में उन्होंने काम किया, उसमे अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी. इंडियन सिनेमा के सबसे नेचुरल एक्टर्स में एक पंकज कपूर को आम तौर पर भारतीय दर्शक मक़बूल फिल्म और जासूस करमचंद और ऑफिस ऑफिस सीरियल में अभिनय के लिए जानते हैं.

फिल्म की कहानी रामपद चौधरी की कहानी “अभिमन्यु” पर आधारित है; हालाँकि इस फिल्म की प्रेरणा रियल लाइफ करैक्टर हज़ारीबाग़ के रहने वाले डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय हैं. 1931 में जन्मे डॉ मुखोपाध्याय टेस्ट ट्यूब से बेबी पैदा करने की तकनीक पर काम कर रहे थे. उसी समय इंग्लैंड में भी डॉ रोबर्ट एडवर्ड्स भी इसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. डॉक्टर एडवर्ड्स के सफल एक्सपेरिमेंट के 67 दिनों बाद 1978 में डॉ मुखोपाध्याय ने दुनिया का दुसरा और इंडिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी ” दुर्गा” पैदा करने में सफलता हासिल कर ली. लेकिन भारत में उन्हें उनके काम के लिए सम्मान नहीं मिला. उलटा मेडिकल फ्रैटर्निटी और सरकार से उन्हें अवहेलना और तिरस्कार मिला. निराशा में डॉक्टर मुखोपाध्याय ने 19 जून 1981 को आत्महत्या कर ली.

फिल्म में तपन सिन्हा ने अंत बदल दिया है. डॉ दीपांकर रॉय आत्महत्या नहीं करते, बल्कि यूएस चले जाते हैं हायर रिसर्च करने का ऑफर मिलने के बाद.

फिल्म की कहानी:
फिल्म की शुरुआत कुछ इस तरह होती है. कलकत्ता के एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टर दीपांकर रॉय देर रात अपने घर में बने लैब में माइक्रोस्कोप पर झुके हुए हैं. पत्नी परेशां होकर आती है: तुमने होश है कितने बजे हैं? हाँ. कितने? यही कोई 10-11 बजे होंगे. पत्नी सीमा ( शबाना आज़मी) कहती है, रात के २ बज रहे हैं. दीपांकर माइक्रोस्कोप से नज़र एक पल को भी नहीं हटाते: एक इंटरेस्टिंग रिजल्ट आ रहा है. सीमा चिढ जाती है: रिजल्ट तो तुम्हे पिछले 10 सालों से मिल रहा है. कब तक ऐसे चलेगा?
दीपांकर कोई जवाब नहीं देते. सीमा चिढ कर सोने चली जाती है; पागल, मैड मैन ! रयूड, सेल्फिश, खुदगर्ज ! पता नहीं क्या देखा था मैंने इसमें ! गलती तो मेरी ही है जो इससे शादी की थी !

छोटी छोटी घटनाओं से तपन सिन्हा डॉ दीपांकर रॉय का किरदार उकेरते हैं और पत्नी के साथ उनके संबंधों को उजागर करते हैं.
रात भर अपने लैब में लगे डॉ सुबह नाश्ते के टेबल पर पत्नी से कहते हैं: सीमा मुझे पैसे दे दो. मेरे पास ट्राम का किराया नहीं है. पत्नी उनसे नाराज रहती है कि मैंने नाश्ता किया या नहीं, ये भी नहीं सोचते. वो सोचती है, जिस दिन मेरे पिता गुजरे थे, उस दिन भी तुम लैब से नहीं निकले थे. तुम्हे पत्नी की जरुरत नहीं है. एक नौकर से भी तुम्हारा काम चल जाएगा.

पर तमाम शिकायतों के बावजूद दीपांकर और सीमा का प्रेम अथाह गहराई लिए हुए है. दीपांकर दिन रात अपने काम में खोये, नितांत अव्यवहारिक, मैड जीनियस; तो सीमा एक व्यवहारिक महिला; दीपांकर की छोटी से छोटी जरूरतों का ख्याल रखने वाली, सलीके से घर को चलाने वाली। दीपांकर स्वीकार करते हैं, सीमा अगर तुमने अपने जेवर बेच कर घर में लैब सेट अप करके नहीं दिया होता; तो मैं नब्ज़ देखने वाला डॉक्टर बनकर रह जाता.

रात भर अपने लैब में कुष्ठ रोग का इलाज खोजने में तरह तरह के एक्सपेरिमेंट में लगे डॉ दीपांकर दिन में कलकत्ता के अस्पताल में काम करते हैं. वहां उनकी भेंट साइंस जर्नलिस्ट अमूल्य से भेंट होती है. वे अमूल्य से नाराज होते हैं. पीएचडी करके वो जर्नलिस्म में क्यों चला गया? अमूल्य कहता है, “I love science; I can’t leave Science.” दादा, मेरे अंदर आपके जैसा टैलेंट नहीं है; मैं आपके काम को दुनिया में प्रचारित करूँगा.

रिसोर्स क्राइसिस के बीच डॉ दीपांकर कुष्ठ रोग के इलाज के लिए वैक्सीन ईजाद करने में लगे हैं. एक रात बुन्सेन बर्नर पर परखनली में लिक्विड गर्म करते हुए अचानक बर्नर का तेल ख़त्म हो जाता है; डॉ तेजी से किचन में आते है. सीमा खाना बनाने की तैयारी में है. कड़ाही स्टोव पर गर्म हो रहा है. वो कड़ाही को उतारकर स्टोव को लेकर लैब में चले जाते हैं. सीमा दीपांकर को देखती रह जाती है. फिर जब डिनर में डॉ को दो केले और ब्रेड मिलते हैं, तो सीमा उन्हें उनकी कारस्तानी की याद दिलाती है.

वक़्त की कमी का एहसास है डॉ दीपांकर को. वो किसी महफ़िल में नहीं जाते. रिश्तेदारों के लिए उनके पास वक़्त नहीं है. आखिरकार 10 वर्षों के अथक मेहनत, रातों की नींद हराम करके डॉक्टर कुष्ठ रोग का वैक्सीन खोजने में सफल हो जाते हैं. डॉक्टर के चेहरे पर संतोष के भाव हैं: आखिरकार दुनिया से कुष्ठ रोग हमेशा हमेशा के लिए मिटाया जा सकेगा.
सीमा को अपने पति की उपलब्धि पर गर्व है. कलकत्ता में उनकी बहन खुश है. पर हर कोई खुश नहीं है डॉ दीपांकर की उपलब्धि से.
बहनोई डॉ अभिजीत परेशां है. उसे अपने सफल प्रैक्टिस, अपनी दौलत अधूरी लगती है. अभिजीत बचपन के दिनों को याद कर रहा है, दीपांकर कहा करता था सिलेबस में क्या रखा है? सिलेबस के बाहर की दुनिया अनजानी है अनजानी चीज ही तो इंटरेस्टिंग होती है.
हेल्थ डिपार्टमेंट के डायरेक्टर उससे सवालात करते हैं. उनके अलावा डॉ रामानंद चटर्जी जैसे लोग दीपांकर की खोज पर संदेह व्यक्त करते हैं. लेक्चर के लिए दीपांकर को बुलाया जाता है, जहाँ दीपांकर का मजाक उड़ाया जाता है. दीपांकर को माइल्ड हार्ट अटैक आता है.
दीपांकर के करैक्टर पर हमला बोला जाता है. गाना गाता है, हारमोनियम बजाता है. इतना टैलेंटेड था तो मामूली MBBS ही क्यों रह गया? हमलोगों की तरह हायर डिग्री क्यों नहीं हासिल की? तमाम तरह के अनप्रोफेसनल आरोप लगाए जाते हैं. दीपांकर को इन्क्वारी कमिटी के सामने पेश होने को कहा जाता है. दीपांकर नाराज है क्या उसने कोई क्राइम किया है, जो इन्क्वायरी कमिटी के सामने उपस्थित हो. दुखद स्थिति उतपन्न होती है, क्योंकि इन्क्वारी कमिटी में कोई माइक्रो बायोलॉजिस्ट नहीं है. बल्कि कुष्ठ आश्रम चलाने वाले लोग हैं. वो फ़्रस्ट्रेटेड हो रहा है. उसे एहसास हो रहा है, उसके काम को रिकग्निशन मिलना तो दूर, उलटे उसका हौसला तोड़ा जा रहा है.
पर उसके कुछ समर्थक भी हैं. उसके सीनियर डॉ कुंडू उसके साथ हैं. डॉ कुंडू ने उसके नोट्स को अमेरिका जॉन एंडरसन फाउंडेशन भेज देते हैं. फाउंडेशन के वैज्ञानिक इस खोज पर बेहद प्रसन्न हैं और वे डॉ दीपांकर को लेक्चर के लिए आमंत्रित करते हैं. पर दीपांकर के विदेश जाने की राह में डिपार्टमेंट रोड़े अटका रहा है. फाउंडेशन की चिट्ठी उससे छुपाई जाती है.
और उसका ट्रांसफर कलकत्तेसे से दूर एक गांव के अस्पताल में कर दिया जाता है. दीपांकर निराश हो चला है. वो अपना पेपर नहीं लिख पा रहा है. उसका समय बर्बाद हो रहा है.
उसे खोजते खोजते जॉन एंडरसन फाउंडेशन की डॉ एमिली बर्नार्ड मिलने आती है. हेल्थ डिपार्टमेंट के डायरेक्टर पर प्रेशर बनता है और दीपांकर को कलकत्ते बुला लिया जाता है. दीपांकर पेपर लिखने में जुट गया है. काफी समय जाया हो गया है. सीमा भी साथ है. दीपांकर सिर्फ रिसर्च करेगा; घर मेरी कमाई से चलेगा.

और एक दिन अमूल्य समाचार लेकर आता है. फॉरेन जर्नल में कुष्ठ रोग के वैक्सीन की क्रांतिकारी खोज के बारे में छपा है. डॉ कुंडू, डॉ दीपांकर, सीमा सब प्रसन्न होकर सुन रहे हैं. अमूल्य पढ़ रहा है. पर ये क्या? इसका क्रेडिट तो MIT के दो वैज्ञानिकों को दिया गया है.
दीपांकर जीवन की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई हार गया है.

सीमा सोई हुई है. अचानक उसकी नींद टूटती है, दीपांकर बेड पर नहीं है. वो लैब की ओर बढ़ती है. सन्न रह जाती है. लैब के सारे चूहे मरे पड़े हैं. दीपांकर एक कोने में बैठा है, एकदम शांत.
दीपांकर की टूटी आवाज सीमा के कानों में आती है, “मुझे इन्हे मारना ही पड़ा सीमा. और कोई चारा नहीं था. ये सब लेप्रोसी के रोग से तड़प रहे थे.” ये हत्या थी, दीपांकर के सपनों की ह्त्या !!

अगले दिन सब बैठे हुए हैं. डॉ एमिली बर्नार्ड की चिट्ठी मिलती है. शिकागो में एक इंटरनेशनल रिसर्च लैब बन रहा है, जहाँ काम करने के लिए एक इंटरनेशनल टीम जुटाई जा रही है; डॉ दीपांकर को भी इस हाई प्रोफाइल टीम के साथ काम करने के लिए न्योता दिया गया है.
अमूल्य और डॉ कुंडू चाहते हैं कि दीपांकर देश में ही रहकर काम करे. इससे दूसरे युवा वैज्ञानिकों को इंस्पिरेशन मिलेगा.
डॉ दीपांकर कहते हैं, मैं देश विदेश नहीं जानता. मैं सिर्फ इंसानों को जानता हूँ…. इंसान जो यूनिवर्स का हिस्सा है. मैं बस काम करना चाहता हूँ.
इतना बड़ा मौक़ा !! सीमा और दीपांकर की नज़रें मिलती हैं. सीमा की आँखों में आंसू हैं, ख़ुशी के आंसू. हाँ में उसका सर हिलता है.
अंतिम दृश्य में प्लेन टेक ऑफ कर जाता है !! दीपांकर अब अमेरिका में रिसर्च करेंगे.
कई सवाल पीछे रह जाते हैं. क्या भ्र्ष्ट सिस्टम से यूँ ही टैलेंट हतोत्साहित होता रहेगा? क्या ब्रेन ड्रेन से देश को नुकसान नहीं हुआ? या फिर डॉ दीपांकर सही हैं- रिसर्च देश की सीमा से बंधा नहीं है. पूरी मानवता को फायदा होता है !!

पंकज कपूर ने डॉ दीपांकर के काम्प्लेक्स करैक्टर को जिस तरह उसकी सम्पूर्णता में जिया है, उसकी मिसाल इंडियन सिनेमा में कम है:

फिल्म इंडियन सिनेमा का क्लासिक है. 90 के दशक में भेड़ चाल से हटकर। फिल्म याद की जायेगी अपनी पटकथा के लिए, करप्शन, निर्मम सिस्टम पर सवाल खड़े करने के लिए. फिल्म याद की जायेगी पंकज कपूर की संजीदा एक्टिंग के लिए. डॉ दीपांकर के काम्प्लेक्स करैक्टर को जिस तरह से पंकज कपूर ने बेहद नेचुरल वे में परदे पर जिया है, वह अद्भुत है और इसकी बेहद कम मिसाल है.
फिल्म को सेकंड बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला, इसके अलावा तपन सिन्हा को बेस्ट डायरेक्टर का और पंकज कपूर को स्पेशल जूरी अवार्ड मिला. तपन सिन्हा को बेस्ट स्क्रीनप्ले का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला.

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