प्रेम त्रिकोण के कसमकस में उलझी तीन जिंदगियों की कहानी “इजाज़त”

Balendushekhar Mangalmurty 

महेंद्र ( नसीर), सुधा (रेखा) और माया ( अनुराधा पटेल) के प्रेम त्रिकोण पर आधारित फिल्म “इजाज़त” इंडियन सिनेमा के बोल्ड एक्सपेरिमेंट्स में गिना जाएगा. 80 के दौर में जब हिंसा और सेक्स से लबरेज़ फिल्मों का दौर चल रहा था, उस दौर में गुलज़ार ने  मानवीय रिश्तों पर बेहद संजीदा फिल्म बनायी “इजाज़त”. 1987 में रिलीज़ हुई ये फिल्म सुबोध घोष की बंगाली कहानी “जातुगृह” पर आधारित है. इस कहानी पर 23 साल पहले 1964 में एक बंगला फिल्म भी बन चुकी थी, जिसे तपन सिन्हा ने निर्देशित किया था और उत्तम कुमार इस फिल्म के प्रोडूसर थे. फिल्म के मुख्य कलाकार उत्तम कुमार और अरुंधति देवी थे. फिल्म की कहानी कुछ इस तरह से थी: शतदल ( उत्तम कुमार) और माधुरी ( अरुंधति देवी) एक लम्बे अरसे के बाद रेलवे स्टेशन पर मिलते हैं. कहानी वहां से कई फ्लैशबैक के जरिये कही जाती है. पेशे से इंजीनियर शतदल और माधुरी खुशहाल दंपत्ति थे. पर उनके रिश्ते में दरार आती है जब माधुरी माँ नहीं बन पाती, शतदल को बच्चे से बहुत प्यार है. अंततः दोनों अलग होने का फैसला कर लेते हैं. पर जब दोनों लम्बे अरसे के बाद रेलवे स्टेशन पर मिलते हैं, तो पाते हैं कि उनका आपस का प्यार ख़त्म नहीं हुआ है.

गुलज़ार ने इस मूल कहानी में ट्विस्ट करते हुए माया का किरदार जोड़ा है, जो पति पत्नी के सम्बन्ध को प्रेम त्रिकोण की शक्ल देता है. इंडियन सिनेमा में अक्सरहां प्रेम त्रिकोण को वैवाहिक जीवन की बोरियत से एस्केप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, अफेयर के रूप में, जो तब तक चलता है, जब तक पत्नी अपने आप को पति की आकाँक्षाओं के अनुरूप ढाल नहीं लेती. और जब ऐसा होता है, तो प्रेम त्रिकोण को सुविधाजनक तरीके से समाप्त कर दिया जाता है. और विवाह की पवित्रता बरकरार रखने के पक्ष में तर्क ठेल दिए जाते हैं.

पर गुलज़ार अपनी फिल्म में प्रेम त्रिकोण में उलझे तीनों किरदारों को एक डिग्निटी देते हैं, और इसे शार्ट टर्म फ़्लिंग न समझ कर परिपक्व नज़र से देखने की वकालत करते हैं. और ये परिपक्वता इस फिल्म को एक यादगार फिल्म बनाती है.

फिल्म की कहानी:

प्रेम त्रिकोण का संजीदा चित्रण

महेंद्र ( नसीर) ट्रेन से उतरा है. रात का समय है, प्लेटफार्म पर सन्नाटा पसरा है. तेज बारिश हो रही है. उसकी अगली ट्रेन सुबह को है. वो वेटिंग रूम में रात गुजारने के लिए आता है. यहाँ अचानक वो सुधा ( रेखा) से टकरा जाता है. सुधा की ट्रेन भी कैंसिल हो गयी है. सुबह 7.30 बजे उसकी ट्रेन है. कभी महेंद्र और सुधा मैरिड कपल थे. सुधा टीचर है. म्यूजिक पढ़ाती है. महेंद्र एक सफल फोटोग्राफर है. बातचीत से कहानी आगे बढ़ चलती है.

महेंद्र: चश्मा कब से लगा लिया?
सुधा: 2- 2.5 साल हो गए.
अच्छा लगता है. समझदार लगती हो.
आपने दाढ़ी कब से बढ़ा ली?
पिछले कुछ दिनों से? क्या समझदार नहीं लगता?
नाह.
कहाँ रहते हो? पूछने पर महेंद्र खो सा जाता है: वही शहर, वही गली, वही घर. सब कुछ वही… सब कुछ वही तो नहीं है, पर है उसी जगह !

कहानी यहाँ से फ्लैशबैक में चली जाती है.

सुधा और महेंद्र पिछले पांच साल से engaged हैं, पर शादी नहीं की है. महेंद्र के जीवन में एक और महिला है माया ( अनुराधा पटेल). महेंद्र माया से प्रेम करता है. पर किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहा है.
सुधा उसे समझाती है: जिंदगी को लगाम न डालिये. आपके मोड़ने से ये नहीं मुड़ेगी. माया को लेकर अपने दादू से बात कीजिये.

सुधा से बातचीत के बाद महेंद्र ने मन बना लिया है. पर माया जा चुकी है. बिना कुछ बताये. बस एक चिट्ठी भर छोड़ गयी है. एक नज़्म लिखी हुई है:
” अबकी मैं आगे- आगे चलता हूँ,
तू मेरा पीछा करके देख.”

कहाँ गयी है? पूछने पर माया की दोस्त मोना कहती है: खुद नहीं जानती तो बतायेगी क्या?
माँ बाप ने उसे उसी दिन त्याग दिया था जब वो एक्ट्रेस बनने के लिए फिल्म इंस्टिट्यूट ज्वाइन किया था.

ढूंढने से नहीं मिलेगी वो, वो चीज ही कुछ ऐसी है.
माया एकदम वाइल्ड स्पिरिट है. खुद में बेचैन. मानो उसे किसी चीज की खोज है. एक वजूद की. एक राह पर चल रही है, जिस राह में एक सराय है महेंद्र, जिस सराय में वो जब जब थक जाए चलते चलते, वो शरण लेने चली आये. पर महेंद्र उसकी मंज़िल नहीं।

बेहद खूबसूरत तरीके से माया कहती है: ” मैं सूखे पत्ते की तरह महेंद्र के कालर पर जा अटकी.”

माया का कुछ अता पता नहीं. महेंद्र ने सुधा से शादी कर ली है.

एक दिन डार्क रम में महेंद्र शादी की फोटोज डेवलप कर रहा है. सुधा को कुछ पैसे धोबी को देने हैं. वो महेंद्र के पर्स से पैसे लेती है, तो वहां माया की फोटो लगी हुई है. मन कसैला सा हो जाता है.
सुधा कहती है, मैं तंग ख्यालात हूँ, स्वार्थी हूँ, पोसेसिव हूँ. मुझे ये पसंद नहीं.
महेंद्र समझाता है: “माया बहुत ज्यादा इस घर में बसी हुई थी. हर जगह से निकाल दिया है. कहीं किसी कोने में बसी है, वहां से भी हट जायेगी.”
सुधा के स्वर में अफ़सोस है: “मैं कहाँ कहती हूँ कि हटा दो या निकाल दो उसे. बस ये कि इस घर में सब कुछ बंटा सा लग रहा है. जिस चीज को छूने जाती हूँ, लगता है किसी और की चीज छू रही हूँ. पूरा- पूरा अपना कुछ भी नहीं लगता.”

कहानी फिर से वेटिंग रूम में पहुँच जाती है.
बारिश तेज होती जा रही है. महेंद्र सिगरेट पीना चाह रहा है. सुधा अपने पर्स से माचिस निकालती है.
“अरे, पहले तो मेरे लिए रखती थी, अब किसके लिए?”
अपने लिए.
“अरे, सिगरेट पीना शुरू कर दिया क्या?”
आपके भूलने की आदत नहीं गयी, मेरी रखने की आदत नहीं गयी.
आदतें भी अजीब हैं. सांस लेना भी क्या आदत है. जिए जाना भी क्या रवायत है. जिए जाते हैं, जिए जाते हैं. आदतें भी अजीब हैं.
माया की नज़्म है न?
महेंद्र हाँ में सर हिलाता है.
माया को बारिश बहुत पसंद थी न?
थी तो.
अब नहीं जाती वो बारिश में घूमने?
महेंद्र एकदम से बातचीत का मैटर बदल देता है.

बातचीत करते हुए दोनों के बीच थोड़ी गर्म बहस सी हो जाती है.
सुधा: देखिये ये घर नहीं, वेटिंग रूम है.
महेंद्र: घर भी तो वही था…
मैंने तो कुछ कहा नहीं था, कुछ माँगा नहीं था.
वही तो. कुछ कहा होता तो। ..

स्टेशन मास्टर के आने से बातचीत का सिलसिला भंग होता है.

महेंद्र कुछ खाने का इंतजाम करने के लिए बाहर निकलता है. सुधा टेबल पर महेंद्र के बिखरे सामानों को सहेज कर रख रही है.

पुरानी यादों में खो जाती है सुधा.

सुधा महेंद्र के लिए चाय लेकर आयी है. “सुबह सुबह कितनी कप चाय पी लेते हैं आप?” जितनी मिल जाए. अरे बैठो। कुछ खबर सुनो. सुबह- सुबह बीबियों की तरह काम शुरू कर दिया है !दुनिया में क्या हो रहा है, उसमे तुम्हे कोई दिलचस्पी है?
घर में क्या हो रहा है, उसमे कोई दिलचस्पी है आपको?
सुधा नाश्ता बनाने में लग गयी है.
तुम्हे देखकर लगता नहीं कि पहली बार शादी हुई है तुम्हारी.
मतलब?
मतलब एकदम एक्सपर्ट बीबी दिखाई देती हो !!
दोनों ठठाकर हंस पड़ते हैं.

तभी फ़ोन बज उठता है. माया का कॉल है.
“उससे कह दो, दफ्तर में फ़ोन कर ले.”
फोन कट गया है.
महेंद्र सुधा को समझा रहा है: सुधा, तुमसे कुछ छुपाया नहीं. माया से बर्दाश्त नहीं होता तो वो फ़ोन कर लेती है. मुझसे बर्दाश्त होता है तो मैं फोन भी नहीं करता, मिलता भी नहीं. सच तो ये है कि हम दोनों एक दूसरे को छोड़कर जीने की कोशिश कर रहे हैं. मेरे साथ तो तुम हो, उसके साथ तो कोई भी
फ़ोन फिर बज उठा है.

ऑफिस में माया का कॉल आया है.
महेन, साँसे बहुत छोटी- छोटी हो रही हैं सेवईयों की तरह. एक बहुत लम्बी सांस दे दो न मुझे. प्लीज बहुत दिनों तक तुम्हे तंग नहीं करुँगी.
रिसीवर से हाथ छूट जाता है. महेंद्र की ऑंखें भर आयी हैं.

उथल पुथल थोड़ा प्रेम और थोड़ी शिकायत के बीच सुधा और महेंद्र का वैवाहिक जीवन चल रहा है. एक दिन. माया का खत आया है. कुछ और सामान रह गया है उसका, भिजवाना है उसे.
सुधा हैरत में है. ” सब भिजवा तो दिया”

चिट्ठी खोलकर पढ़ रहा है महेंद्र.

“सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी हैं
वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल…”

सुधा चौंक कर महेंद्र के काँधे का तिल देखती है. दर्द से चिंहुँक कर कहती है: “मैंने क्यों वो सब सामान भिजवाया? वैसे भी दिन रात माया हमारे साथ रह रही है.”

महेंद्र और सुधा हनीमून पर जा रहे हैं.
सुधा पूछ उठती है: ” ये अचानक से बाहर जाने का प्लान कैसे बना लिया? कहीं किसी से भाग तो नहीं रहे?”
महेंद्र सुधा का इशारा अच्छी तरह समझ रहा है: ” देखो सुधा, दिन रात माया का ख़याल अच्छा नहीं. मैं माया से प्यार करता हूँ, ये सच है और मैं उसे भूलने की कोशिश कर रहा हूँ, ये सही है. लेकिन इसमें तुम मेरी मदद नहीं करोगी तो मेरे लिए बहुत मुश्किल होगी, क्योंकि मुझसे ज्यादा वो तुम्हे याद है.”

महेंद्र सुधा को समझा रहा है: “जो बीत गया, उसे बीत जाने दो. उसे रोक कर मत रखो.”

फिल्म फिर फ्लैशबैक से वर्तमान में चली आयी है. दोनों चाय पी रहे हैं. तभी बिजली चली जाती है. महेंद्र लालटेन के इंतजाम में बाहर निकल रहा है. सुधा ने अँधेरे के डर से महेंद्र का हाथ थाम लिया है. अचानक लोहे के बेंच से टकरा कर सुधा के ठेहुने पर चोट लग गयी है. महेंद्र से उसे फटकारा. फिर उसे ख्याल आया अब चीजें पहले जैसी नहीं रही हैं.
“सॉरी सुधा, इतने साल गुजर गए, आदत नहीं गयी.”
“आदत भी चली जाती है; अधिकार नहीं जाते.” सुधा ने बहुत गहरी बात कह दी है.

फिल्म फिर से फ्लैशबैक में चली जाती है. हनीमून से सुधा और महेंद्र लौट रहे हैं. प्लेन में उसे एयरहोस्टेस बर्थडे गिफ्ट देती है.
“This is Maya. ऐसा वो ही कर सकती है.”
सुधा कहती है: इस पगली पर प्यार भी आता है, तरस भी आता है.
“कभी कभी उसके लिए बहुत डर भी लगता है. Impulsive है.” एक लम्बी सांस छोड़ते हुए महेंद्र कह रहा है.

माया ने स्लीपिंग पिल्स खा लिए हैं. उसने आत्महत्या करने की कोशिश की है. कहीं न कहीं जीवन का खालीपन उसे अब अपनी जकड में ले रहा है. महेंद्र माया से मिलने अस्पताल गया है.
माया कहती है: “ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है कि मैंने तुम्हारे लिए ख़ुदकुशी की है.” फिर दूसरे ही पल निहायत ही भोलेपन से पूछती है, ” तुम दूसरी शादी नहीं कर सकते? मुझसे कर लो न !”
“यू क्रेजी !!”

सुधा माँ के पास जाने का तय कर रही है. उसे महेंद्र के पॉकेट से रुमाल मिला है. उस पर माया के लिखे शब्द हैं.

सुधा कभी दरवाजे के अंदर आ नहीं पायी और माया कभी पूरी तरह दरवाजे के बाहर जा नहीं पायी. और महेंद्र। .. महेंद्र भी दरवाजे की चौखट पर खड़ा रहा है.
सुधा और महेंद्र के रिश्ते में गर्मी नहीं है, व्यवहारिकता है. माया और महेंद्र के रिश्ते में पैशन है, गर्मी है, स्पॉनटेनिटी है, unpredictability है. माया उसके क्रिएटिव एनर्जी के लिए जरुरी है. दो स्त्रियों के बीच फंसा है महेंद्र. न वो सुधा को छोड़ सकता है, न माया को. दोनों उसके वजूद के लिए जरुरी है. एक उसके घर के अस्तित्व के लिए, मानसिक संतुलन के लिए, सुकून के लिए, तो दूसरी उसके क्रिएटिव टैलेंट को नयी ऊंचाई देने के लिए.

सुधा धोबी को महेंद्र के कपड़े दे रही है. माया का ईयर रिंग महेंद्र के पैंट की जेब से निकल आया है.
सुधा महेंद्र से पूछती है: ” आप क्या इन दिनों माया से मिलते रहे हैं?”
महेंद्र evasive है.
मैं समझती थी कि आप मुझसे कुछ नहीं छुपाते. महेंद्र ने तय किया है कि वो माया को घर लेकर आएगा. सुधा से मिलाने. वो माया को फ़ोन लगाता है. माया बेहद खुश है. पर सुधा एकदम नाराज. उसे माया से बिलकुल नहीं मिलना है.
महेंद्र चीखता है: “आ जायेगी तो क्या हो जाएगा? तुम्हारा घर तो नहीं ले जायेगी?”
माया फ़ोन पर है. वो सुन लेती है.

महेंद्र सुधा के विरोध के बावजूद माया को लाने चला गया है. पर माया घर पर नहीं है. लौट कर घर आता है. सुधा भी नहीं है. एक चिठ्ठी छोड़ गयी है. महेंद्र एकदम से सदमे में आ जाता है. उसे हार्ट अटैक आता है.
सुधा पंचगनी में स्कूल टीचर बन गयी है. वो दादू को महेंद्र से अपनी शादी के बारे में बात करने से रोकती है.
दादू थकी हारी आवाज में कहते हैं, ” थोड़ा समय बीत जाने दे. इस बीच अगर लेने आ जाए तो चली जाना. नहीं आये तो ठीक है.”

सुधा को दूर के स्कूल में पढ़ाने का मौका मिला है. उसने मौका को लपक लिया है. महेंद्र को चिट्ठी डाल दी है: ” मैं एक साधारण औरत हूँ. जिद्दी हूँ. आप माया से शादी कर लीजियेगा. जहाँ जा रही हूँ, वहां का पता आपको नहीं दे रही हूँ.”
सुधा बहुत दूर चली गयी है, महेंद्र की जिंदगी से.

फिल्म फिर से फ्लैशबैक से निकलकर वेटिंग हॉल में आ गयी है.
सुबह हो गयी है. महेंद्र एक नींद सोकर उठता है. बाहर निकलता है, देखता है. सुधा प्लेटफार्म के एक चेयर पर बैठी है.
“पता ही नहीं चला कब शॉल ओढ़ाकर चल दी. पानी का ग्लास भी रख दिया. पूरा घर साथ लेकर चलती हो?”
“आपने भी तो सामान ऐसे बिखेर रखा है मानो घर में ही बैठे हों. ”

महेंद्र पुराने दिनों को याद कर रहा है.
“जो हो गया, उसे बदला तो नहीं जा सकता. पछताया जा सकता है. मैंने तुम्हारे साथ बहुत ज्यादती की.”
सुधा ने बातचीत की दिशा बदलने के लिए एकदम से पूछ लिया: “माया कैसी है?”
महेंद्र बताता है: उसके जाने के बाद माया फिर से उसके पास आयी थी. महेंद्र सुधा को लाने के लिए उसके पास जाना चाहता था, पर चिट्ठी ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया था. महेंद्र बहुत स्ट्रेस में था. इसी स्ट्रेस में उसने माया को भद्दे तरीके से डांट दिया था.
बस रात में माया मोटरसाइकिल स्टार्ट करके निकल गयी. महेंद्र ने गाडी से उसका पीछा किया, पर गले का स्कार्फ़ पहिये में फंसने से माया की मौत हो गयी.
माया की मौत की खबर सुनकर सुधा रो पड़ती है.

फिल्म में नसीर और रेखा ने पावरफुल परफॉरमेंस दिया है.

सुधा महेंद्र का सामान समेटकर रख रही है.
“सुधा, सारी रात मैं ही कहता रहा,तुमने कुछ नहीं बताया.”
सुधा बताती है कि माँ का देहांत हो गया है.
“तो… तुम अकेली रहती हो?”
सुधा कुछ जबाब दे पाती, इससे पहले वेटिंग रूम का दरवाज भड़ाक से खुलता है.
“ओह सुधा, ट्रेन कैंसिल हो जाने की बात से मैं कितना परेशां हो गया था !” वो आदमी बोले जा रहा है: अच्छी खूबसूरत पत्नी किस्मत वालों को ही मिलती है. तुमने स्वेटर नहीं पहना है?”
महेंद्र समझ गया है. ये आदमी सुधा का दूसरा पति है.
उसका सामान लेकर कुली के साथ बाहर निकल आया है उसका पति ( शशि कपूर). सुधा को भी जाना है. जाने से पहले वो महेंद्र से कहती है: मैं चलूँ? पिछली बार बिना पूछे चली आयी थी, इस बार इज़ाज़त दे दो.”
महेंद्र की आँखों में कई प्रश्न हैं.
“मैंने पिछले साल शादी कर ली.” सुधा कहती है.
महेंद्र सुधा को सुखी वैवाहिक जीवन के लिए आशीर्वाद देता है और कहता है: “हो सके तो एक बार मन से माफ़ कर देना मुझे.”
सुधा महेंद्र के क़दमों में झुक जाती है. सुधा का दूसरा पति समझ तभी वेटिंग रूम में आ जाता है. वो समझ जाता है कि ये आदमी महेंद्र है, सुधा का पहला पति.

अंतिम दृश्य में महेंद्र अपने सामान के साथ वेटिंग रूम के गेट पर खड़ा है. सुधा अपने पति के साथ प्लेटफार्म पर खड़ी है. दृश्य जम गया है. ट्रेन की कू की आवाज आ रही है.

फिल्म त्रिकोणीय प्रेम सम्बन्ध पर एक बेहद परिपक्व स्टेटमेंट है:

गुलज़ार की फिल्म त्रिकोणीय प्रेम पर एक बेहद परिपक्व स्टेटमेंट है. विजय आनंद की गाइड की तरह समय से आगे की फिल्म.

और गाइड के रोजी की तरह माया का किरदार भी एक विद्रोही किरदार है. दोनों जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चाहती हैं. जहाँ रोजी के जीवन में राजू गाइड है, वहीँ माया के जीवन में भी महेंद्र है. पर महेंद्र राजू गाइड के विपरीत शादी शुदा है. वो रोजी की तरह अपने जीवन में लक्ष्य को लेकर स्पष्ट नहीं है. रोजी को नृत्य करना है, अपनी चुनी राह पर चलकर वो सफलता की ऊंचाइयों को छूती है, और राजू गाइड को अपने जीवन से निकालने में भी नहीं हिचकती है. पर माया एक रेस्टलेस स्पिरिट है. बेचैन आत्मा. उसे खुद की तलाश है. उसे परेशान कर रहा है उसका अतीत, जहाँ उसने देखा है अपने माँ बाप को लड़ते हुए. वो समझ नहीं पा रही है कि जब दोनों साथ नहीं रह सकते, तो रिश्तों को ढो क्यों रहे हैं?
इसी कारण वो रह रहकर महेंद्र से दूर चली जाती है. पर महेंद्र उसके जीवन में स्टेब्लिटी के लिए जरुरी है. इसलिए वो लौट लौट कर महेंद्र की जिंदगी में आती है. वो परम्पराओं में यकीं नहीं करती. वो समाज द्वारा स्थापित वर्जनाओं को तोड़ने में यकीन करती है. कभी वो महेंद्र से शादी की बात करती है, तो कभी बिना शादी के उसे महेंद्र से बच्चा चाहिए.
कभी वो बेहद मज़बूत स्त्री दिखती है, पर उसका एकाकीपन उसे अंदर से fragile बना देता है. महेंद्र उसके उथलपुथल भरे जीवन का एंकर है. वो महेंद्र की क्रिएटिविटी की प्रेरणा है, जो सुधा नहीं बन सकी. माया इंडियन सिनेमा का एक बेहद जटिल किरदार है.

पूरी फिल्म में नसीर और रेखा छाए हुए हैं. अनुराधा पटेल का रोल बेहद छोटा है. स्क्रीन पर उसे स्पेस कम मिला है, हालाँकि वो पूरी फिल्म में छायी हुई है, महेंद्र और सुधा के बीच चर्चा के जरिये.
इस फिल्म में संजीव कुमार महेंद्र के रोल के लिए ओरिजिनल चॉइस थे, पर उनके असामयिक देहांत के चलते नसीर इस फिल्म में आये. नसीर ने महेंद्र की जीवन के अंतर्द्वंद्व को पूरी ईमानदारी से जिया है. रेखा भी अपने रोल में बेहद परिपक्व लगी हैं. कई जगह रेखा बेहद मैजेस्टिक लगी हैं. मसलन जब महेंद्र सुधा के ठेहुने पर लगी चोट पर स्पिरिट लगाता है, और सुधा दर्द से चिहुंक कर महेंद्र की ओर देखती है, और बैकग्राउंड में आशा भोंसले की आवाज में गाना शुरू होता है, “कतरा कतरा मिलती है, कतरा कतरा जीने दो” वो बेहद खूबसूरत दृश्य बन पड़ा है. अनुराधा पटेल भी माया की भूमिका में जंची हैं. अनुराधा पटेल को इस फिल्म में अभिनय के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया था.

इस फिल्म को इसके संगीत के लिए भी याद किया जाएगा और गुलज़ार के बेहद खूबसूरत लिरिक्स के लिए. फिल्म के चारो गाने काफी पसंद किये गए. इस फिल्म का संगीत देने समय आर डी बर्मन लीन फेज से गुजर रहे थे. सत्तर का उनका स्वर्णिम दौर पीछे छूट गया था. और वो इंडस्ट्री में पांव जमाये रखने के लिए संघर्ष कर रहे थे. पर इस फिल्म में उन्होंने आशा भोंसले की आवाज का जिस खूबसूरती से इस्तेमाल किया, वो 80 के दशक के बेस्ट म्यूजिकल क्रिएशन में गिना जाएगा. इस फिल्म को दो नेशनल अवार्ड मिले: आशा भोंसले को मेरा कुछ सामान” गाने के लिए. और गुलज़ार को इसी गीत के लिए बतौर गीतकार.
इस फिल्म को दो फिल्मफेयर अवार्ड भी मिले. गुलज़ार को गीतकार का; सुबोध घोष को कहानीकार का.

फिल्म अपने अंत के साथ एक टीस का अहसास छोड़ जाती है और दर्शकों को एहसास कराती है कि दौर कोई भी हो, गुलज़ार जैसे फिल्मकार अपनी रूचि, अपने विश्वास के लिए फ़िल्में बनाते हैं, बाज़ार के नाम पर समझौता नहीं करते.
इस फिल्म को जरूर देखा जाना चाहिए.

Contact: bsmangalmurty@gmail.com

उफनती गंगा में सूअरों को पार कराने का दृश्य नसीर और शबाना के अभिनय की ईमानदारी की पराकाष्ठा है !

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