अपने मृत नक्सल क्रांतिकारी बेटे के वजूद और विचारों की तलाश में एक माँ की जीवनयात्रा फिल्म ” हज़ार चौरासी की माँ”

Balendushekhar Mangalmurty

गोविन्द निहलानी इंडियन सिनेमा में विचारवान सिनेमा के प्रतिनिधि रहे हैं. उन्होंने अपने विचारों को फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत किया है और व्यवस्था की कमियों, खामियों पर लगातार सवाल खड़े किये हैं, चाहे वे आक्रोश हो, अर्ध सत्य हो, या फिर आघात, द्रोहकाल जैसे फ़िल्में हों. उन्होंने 1084 की माँ फिल्म में फिर से अपने राजनीतिक चिंतन को पुरे यकीं से प्रस्तुत किया. 1998 में रिलीज़ फिल्म “1084 की माँ” बंगाली उपन्यासकार महाश्वेता देवी के उपन्यास पर आधारित है. उन्होंने उपन्यास की मूलकथा के साथ किसी तरह का फेर बदल नहीं किया; सिनेमेटिक फ्रीडम, बाजार की मांग जैसे मुद्दों को लेकर.
1960 के दशक के अंतिम सालों में बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी इलाके से भूमि के न्यायोचित वितरण के मुद्दे को लेकर चारु मजूमदार के नेतृत्व में एक हिंसक आंदोलन शुरू हुआ. और बहुत तेजी से इसने बंगाल के अन्य जिलों में पैर पसारा. बंगाल के ग्रामीण इलाकों से होता हुआ ये हिंसक आंदोलन बंगाल के शहरों में भी पैठ बनाने लगा, फैक्ट्री के मज़दूरों के बीच, यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के बीच. कलकत्ता विश्विद्यालय, जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र छात्राओं ने समाज में क्रांति लाने के उद्देश्य से इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. पर हिंसा का अतीव प्रयोग ने इससे मध्यम वर्ग की सहानुभूति छीन ली. इसके अलावा पूंजीवादी वर्ग- कारखानों के मालिक, बड़े जमींदार आदि इसके खिलाफ शुरू से थे. ऐसे में राज्य प्रशासन ने हिंसक पुलिस एक्शन के जरिये इस आंदोलन की धार कुंद कर दी. बहुत बड़ी संख्या में छात्र, छात्राओं को गिरफ्तार किया गया,जेल में उन्हें असहनीय यातनाएं दी गयीं, काफी बड़ी संख्या में इन आदर्शवादी युवाओं की जेल में ही मृत्यु हो गयी, कई लापता हो गए, जिनका फिर कभी पता नहीं चला. खुद चारु मजूमदार को 16 जुलाई 1972 में कलकत्ता में पुलिस ने हिरासत में ले लिया और फिर 12 दिन बाद 28 जुलाई 1972 को पुलिस हिरासत में ही संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत भी हो गयी.

महाश्वेता देवी जिनके उपन्यास पर गोविन्द निहलानी ने ये फिल्म बनायी.

ये फिल्म नक्सलबाड़ी आंदोलन के शहरी परिदृश्य के बैकग्राउंड में ब्रती चटर्जी नामक आदर्शवादी नक्सल क्रांतिकारी युवक और उसके साथियों की मौत के बाद उनकी माँ और उसके कुछ दोस्तों के नज़रिये से नक्सल आंदोलन की विचारधारा, सिस्टम में मौजूदा सड़ांध, बूर्जुआ वर्ग के खोखले आदर्श, आराम तलबी ज़िन्दगी और विचारों में क्रांति का पोषण, आंदोलन की आगे की राह, दशो दिशा आदि तमाम पहलुओं पर चर्चा करती है और गोविन्द निहलानी हर बार की तरह इस फिल्म में कोई आसान राह सुझाते नज़र नहीं आते. बल्कि उपन्यासकार महाश्वेता देवी सुझाती नज़र नहीं आतीं. मानों उद्देश्य उपाय सुझाना नहीं, बल्कि बहस को जारी रखना है, आगे की राह क्या होगी?

फिल्म की कहानी:

कलकत्ता, 1970.
एक रात नंदिनी चटर्जी को फ़ोन आता है. कांतपुकुर पुलिस मोर्ग ( लाशघर) आकर ब्रती चटर्जी की लाश की शिनाख्त कर जाईये. लाश का चेहरा बिगड़ा हुआ है. गले पर बाएं तरफ तिल का निशान है. लाश मिसेज चटर्जी को नहीं दी जाती है. ब्रती के साथ उसके दोस्तों की लाशें भी पड़ी हुई हैं. लाशों का सामूहिक दाह संस्कार पुलिस ही कर रही है. मिसेज चटर्जी मौत का सन्नाटा चेहरे पर ओढ़े अपने बेटे को अंतिम विदाई दे रही हैं. पिता दिब्यनाथ चटर्जी साथ नहीं आये. हायर मिडिल क्लास से आने वाले और जीवन में सफल मिस्टर चटर्जी को इस बात की ज्यादा चिंता थी कि कहीं उनकी गाडी मोर्ग के आसपास न दिख जाए; कहीं उनका नाम लाश से न जोड़ दिया जाए. अगले दिन मिस्टर चटर्जी और उनके बड़े बेटे ने राहत की सांस ली कि ब्रती का जिक्र अख़बारों में नहीं आया. सब कुछ ठीक से मैनेज हो गया.

कहानी रह रह कर फ्लैशबैक में जाती रहती है. मिसेज चटर्जी अपने बेटे को याद करती रहती हैं. चटर्जी परिवार में ब्रती सिर्फ अपनी माँ के करीब था. पिछले दो एक साल से अपने बाबा की एक बात से भी सहमत नहीं ब्रती। ब्रती यूनिवर्सिटी का एक होनहार स्टूडेंट है, स्कॉलरशिप होल्डर. मिस्टर चटर्जी बूर्जुआ समाज और उसके मूल्यों के प्रतिनिधि हैं, जबकि ब्रती समाज को बदलने का बीड़ा उठाये हुए नक्सलबाड़ी आंदोलन का एक क्रांतिकारी। पिता उसके मूल्यों को चुनौती देते हैं: तुम्हारे ऊँचे आदर्श सिर्फ कहने की बातें हैं. सब अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक़ चोरी भी करते हैं, बेईमानी भी करते हैं और रिश्वत भी लेते हैं. रिश्वत का पैसा सिस्टम में घूमता रहता है और इससे किसी को नुकसान भी नहीं होता है.
ब्रती इस बात का पुरजोर विरोध करता है: नुकसान तो होता है बाबा. सारा सिस्टम सड़ गया है, लोगों का उस पर से विश्वास उठ गया है.
मिस्टर चटर्जी के अपने उसूल हैं. वे सिस्टम के बेनेफिशियरी हैं. ब्रती, भूखे पेट क्रांति नहीं होती और पुलिस की गोलियों से किसी का पेट नहीं भरता.

ब्रती घर में माँ से ही सुकून से बातें करता है. क्लास, वैल्यूज, मोरालिटी, एट्टीट्यूड आदि पर वो बोले जा रहा है. उसकी ये बड़ी बड़ी बातें माँ को समझ नहीं आ रही हैं. “तुम कुछ बदलते जा रहे हो बरती. पहले जैसे नहीं रहे.” ब्रती के शर्ट के बटन टांकते हुए माँ बोलती है.

माँ यादों के गलियारे से निकलकर फिर से वर्तमान में आ जाती है. अभी दो दिन भी नहीं हुए और ब्रती की तस्वीर- हर चीज यहाँ से हटा दी गयी, जैसे वो यहाँ कभी रहा ही नहीं. ऐसा क्या किया था उसने कि शर्म आ रही है इन्हे ब्रती का नाम लेते हुए? माँ अपने बेटे को कितना कम जान पायी !

पुलिस चटर्जी फॅमिली के घर आयी है. ब्रती के सामान की तलाशी ले रही है. पुलिस इंस्पेक्टर उसकी डायरी पलटते हुए मिसेज चटर्जी से कहता है, “आप उसकी परवरिश ठीक ढंग से नहीं कर पायीं, वर्ना वो एक गुंडा कैसे बन जाता?”
माँ समझने की कोशिश कर रही हैं. “ओह्ह मैं कैसी माँ थी, जिसने कुछ नहीं देखा, कुछ नहीं सुना. बस तुम्हारे चेहरे की मुस्कान को देखकर मुस्कुराती रही, आराम की नींद सोती रही.  मुझे तुम्हारी हर धड़कन महसूस करनी चाहिए थी.” माँ ब्रती की तस्वीर सीने से लगाए रोने लगी है.

मिसेज चटर्जी अपने बेटे को समझने के लिए उसके दोस्तों से मिलने का फैसला करती है. रिक्शे पर मिसेज चटर्जी चली जा रही हैं. कलकत्ते की दीवारों पर पोस्टर्स लगे हैं: Hate the Moderate, Mark Him, Destroy Him. Naxalbari Zindabad ! ब्रती के दोस्त सोमू मंडल के घर की तलाश कर रही है. सोमू की माँ दहाड़ पार कर रोने लगती है: चला गया रे, बेटा चला गया !

यहाँ रुका था बरती. इस छत के नीचे आखिरी रात बितायी थी. वो कमरे को देख रही है- एक हसरत से.
सोमू की माँ बता रही है: सोमू के बाबा बहुत परेशान थे उस रात. बस्ती की हवा ख़राब थी. क्षण- क्षण रात गिनते रहे. इतनी परेशानी में भी हंस रहा था. खिला- खिला चेहरा, खुली- खुली हंसी, घर भर जाया करता था.

क्या ब्रती यहाँ अक्सर आया करता था?
हाँ. तुम्हार बिटवा बहुत कोमल रहे.

मिसेज चटर्जी को ब्रती के इस जीवन, और दोस्तों के बारे में कुछ पता नहीं. वो बैंक की नौकरी में ही व्यस्त रही. सोमू की माँ समझ नहीं पा रही है कि ब्रती इतने अच्छे घर का लड़का इस रास्ते पर क्यों चला?
दीदी तुम्हे खबर तो रही होगी कि क्या करता है, किससे मिलता है, कहाँ जाता है?
मिसेज चटर्जी ना में सर हिलाती है.

माँ याद कर रही है. ब्रती उस रोज एक फ़ोन का इन्तजार कर रहा था. उसने नंदिनी के बारे में भी बताया था. नंदिनी उसके साथ यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी. देखने में सीधी सादी, सांवली. बॉस को पसंद नहीं आएगी. ब्रती अपने पिता से चिढ़ता है. वो बचपन से देखता आया है पिता के अन्य औरतों के साथ सम्बन्ध रहे हैं, माँ से दुर्व्यवहार करते आये हैं. माँ को उन्होंने पायदान के रूप में इस्तेमाल किया है. माँ के सामने अपने पिता को ब्रती बॉस कहकर सम्बोधित करता है.

“उस रात क्या हुआ था? मैं सब जानना चाहती हूँ.”
सोमू की माँ बता रही है. उस रात बस्ती के गुंडों ने घर पर हमला बोल दिया था. और ब्रती और उसके साथियों की पीट पीट कर हत्या कर दी थी. ब्रती के सीने में तीन गोलियां दाग दी थी. पुलिस ब्रती और उसके साथियों की लाश घसीट कर ले गयी थी.
“तुम्हार बिटवा का चेहरा दिल से हटता नहीं. जिनके पास कुछ नहीं होत है, उनका दिमाग पगला ही जात है, पर उसका दिमाग काहे फिरा?”

ब्रती का जन्मदिन था अगली सुबह. 17 तारीख को. 21वां साल शुरू हो जाता. मिसेज चटर्जी वापस लौट रही हैं. सोच रही हैं, ” सोमू की माँ कम से कम जानती है कि सोमू ने क्या किया, कैसे किया. पर ब्रती, तुमने मुझे क्यों नहीं बताया? अपने मन का बड़ा अंश चुरा कर इसे किसी और की झोली में डाला.”

बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म “आरोहण”(1982)

आज मिसेज चटर्जी की छोटी बेटी तुली की सगाई है. आज वो बैंक नहीं जा रही है. उसे नंदिनी से मिलने जाना है. वो तुली पर बिगड़ती है: किस कड़वाहट से अपने भाई का नाम लेती है तुली !

नंदिनी घर के अंदर भी आँखों पर काला चश्मा चढ़ाये हुए है. नंदिनी कहती है: अनिंदया ने हमें धोखा दिया, पर ब्रती को उस पर भरोसा था, अजीब सा भरोसा. उस दिन मीटिंग चल रही थी, पार्टी प्रोग्राम पर बहस हो रही थी. हमें स्टूडेंट्स के बीच भी फैलना चाहिए. हम फैक्ट्री ,खेतों में फैले.
क्लास एनिमी को ख़त्म करना ही होगा.
पर क्या शहर में ऑपरेशन टिक पायेगा?
;हमारा असली एरिया गांव ही है, पर शहर इन्ही गांवो से घिरा है. कैसे छोड़ दें?
लेकिन एक मामूली ट्रैफिक पुलिसमैन की हत्या गैर जरुरी है. इससे कलकत्ते का आम आदमी हमारे खिलाफ हो जायेगा.
नंदिनी को शक है कि अनिंदया ने मीटिंग के टाइम और प्लेस की सूचना पुलिस को दी थी. उस दिन पुलिस क्रैकडाउन में उनका साथी नीतू पकड़ा गया था. नंदिनी याद कर रही है समाज में बदलाव लाने के ऊँचे आदर्शों के साथ, शोषण और गैर बराबरी पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को बदलने का सपना लिए उन्होंने आंदोलन ज्वाइन किया था. पर आकाश उठी उनकी ऑंखें देख नहीं पायी अपनी खामियां, राह से टूटी, बिछुड़ी पगडंडियां.

बिहार के गलीज सामंती समाज की गन्दगी को उघार कर रख देने वाली फिल्म है “दामुल”

नंदिनी आक्रोश में है जिस तरह से मीडिया उन्हें गुमराह युवा घोषित कर रहा है, जिस तरह उन्हें एडवेंचर की तलाश में भटके युवा के रूप में चित्रित कर रहा है. कहने को गिरफ्तारियां बंद हो गयी हैं, पर सब कुछ चल रहा है शांति की आड़ में. 16 से 40 की एक पूरी पीढ़ी ख़त्म कर दी गयी, पुरे तंत्र को बदलने की हिम्मत थी जिसमें, जिसने एक सपने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी.

नंदिनी खुद दो साल पुलिस कैद में रहकर आयी है. टार्चर, हज़ार वाट के बल्ब की रौशनी में बायीं आँख से देखने की क्षमता खो बैठी है. इलाज के लिए पैरोल पर बाहर है.
नंदिनी मिसेज चटर्जी से कह रही है, वो ब्रती से प्यार करती थी, बहुत प्यार.
ब्रती कहता था आप बहुत ईमानदार हैं.
मिसेज चटर्जी सुखद आश्चर्य से पूछती हैं, ब्रती ऐसा कहता था?
क्यों उसने आपसे कभी नहीं कहा? उसकी बातों से तो लगता था आप उसके बेहद करीब हैं.
“ब्रती जब भी अपने घर के बारे में बात करता, तो लगता दो ब्रती बात कर रहे हैं. एक में रोष और छटपटाहट होती, पर ज्योंही आपकी बात करने लगता, तो उसकी आवाज बेहद कोमल हो जाती.”
“तुम्हे ऐसा लगा?” माँ की आवाज नेह से भींग गयी है.

“आगे का क्या सोचा है?”
नंदिनी कहती है, लड़ाई का तरीका भले बदले, पर लड़ाई जारी रखनी होगी. लड़ने से फर्क पड़ता है.

मिसेज चटर्जी घर लौट आयी हैं. बेहद क्षुब्ध हैं. “घर, घर, ये घर. 24 घंटे मैंने इस टूटे घर को संभाला है और कब हाथों से मेरी जिंदगी फिसल गयी, ये पता ही नहीं चला. बेकार, एकदम बेकार और इसी में मैंने ब्रती को खो दिया.”

तुली की सगाई की पार्टी चल रही है. वाइन पर क्रन्तिकारी कविताओं की बात चल रही है. ब्रती के बारे में उलटी सीधी बातें हो रही हैं. सब राग रंग में मस्त हैं. मिसेज चटर्जी बुर्जुआ समाज का दोहरा चेहरा देख कर घिन्न से भर आई हैं.
“दुनिया की सारी सुंदरता, सारी कविता क्या सब इन्ही के लिए है? क्या व्रती, सूमो, पार्थो इन्ही के हवाले दुनिया छोड़कर चले गए?” माँ फर्श पर चीख मारकर ढेर हो जाती है. अपेंडिक्स फट गया है.

“एक डॉक्टर की मौत” दीमक लगे सिस्टम की जीत है और डॉ दीपांकर रॉय के सपनों की हार है!

काफी समय बीत गए हैं. शायद 30 साल. जॉब से रिटायर हो गयी है मिसेज चटर्जी. उन्होंने ह्यूमन राइट्स डाक्यूमेंट्री सेंटर खोल लिया है. और ब्रती के सपनों को अपना सपना बना लिया है. एक दिन कॉल आता है. नंदिनी मिलना चाहती है. नंदिनी सेंटर पर आती है. दिब्यनाथ चटर्जी भी साथ में हैं. समय के साथ दिब्यनाथ और सुजाता चटर्जी अतीत के कड़वाहट को पीछे छोड़ने में सफल हुए हैं.
नंदिनी इन दिनों आदिवासियों के बीच काम कर रही है. डीएसपी सूरजपाल के खिलाफ केस लड़ रही है. सूरजपाल ने बहुत टार्चर किया था. इसी सिलसिले में कलकत्ता आना जाना होता है. नंदिनी ने शादी नहीं की है. कभी कभी बहुत अकेलापन महसूस होता है, पर खुद को काम में डुबाये रखती है. नंदिनी याद कर रही है. “ब्रती कहा करता था, लोगों को अपने साथ लेकर चलो. अगर उनको अलग कर दिया तो फिर हम अपने मकसद को हासिल नहीं कर सकते.” कितना सही था ब्रती !!
तभी वहां नीतू भी आ जाता है. नीतू अब प्रोफ़ेसर नीतू पॉल बन चुके हैं.
नंदिनी को अब अपने लॉयर से मिलने जाना है. दिब्यनाथ अपनी कार में उसे ड्राप करने जाते हैं. ऑफिस के बाहर नंदिनी को सी ऑफ करने के बाद जैसे ही मिसेज चटर्जी मुड़ती हैं, तो देखती हैं, दो हत्यारों ने प्रोफ़ेसर नीतू पॉल को गोली मार दी है. एक हत्यारा वहां से निकल भागने में सफल हो जाता है, पर दूसरे हत्यारे के पैर से वह लिपट जाती है. चोटिल होती है, पर उसने हत्यारे को नहीं छोड़ा है. अंत में भीड़ ने हत्यारे को पकड़ लिया है.

हॉस्पिटल बेड पर मिसेज चटर्जी ब्रती को याद कर रही हैं. ” अब तुम्हे अपना बेटा नहीं मानती मैं. तुम्हारे सपनों की साझेदार बन गयी हूँ. एक साथी, एक कामरेड, दोस्त !”

फिल्म जया भादुड़ी के लिए कमबैक फिल्म थी:
“हज़ार चौरासी की माँ” फिल्म जया भादुड़ी के लिए कमबैक फिल्म थी. उन्होंने 18 साल के बाद सिनेमा के परदे पर वापसी की. जया भादुड़ी को “1084 की माँ” फिल्म में अभिनय करते हुए देखते हुए ख्याल आता है, कि इंडियन सिनेमा एक बेहद प्रतिभावान अभिनेत्री की सेवा से 18 लम्बे साल तक वंचित रहा. फिल्म में मुख्यतया तीन हीरो हैं: सुजाता चटर्जी के रोल में जया भादुड़ी, उपन्यासकार महाश्वेता देवी और महाश्वेता देवी के उपन्यास को पूरी ईमानदारी से फिल्म के पर्दे पर उतारने वाले गोविन्द निहलानी. फिल्म के डायलॉग त्रिपुरारी शर्मा ने लिखे, जबकि आर्ट डायरेक्शन चोकस भारद्वाज ने किया; फिल्म की एडिटर दीपा भाटिया हैं; फिल्म में संगीत दिया है देबज्योति मिश्रा ने, गायिका हैं परोमा बनर्जी; जबकि फिल्म के डायरेक्शन, प्रोडक्शन और फोटोग्राफी की जिम्मेवारी संभाली गोविन्द निहलानी ने. फिल्म अपने ट्रीटमेंट में हार्ड हिटिंग है. फिल्म का स्क्रीनप्ले गोविन्द निहलानी, महाश्वेता देवी और त्रिपुरारी शर्मा ने मिलकर लिखा है.

अपनी टाइट एडिटिंग के चलते फिल्म दर्शकों को कहीं साँस नहीं लेने देती. फिल्म पर निहलानी की पकड़ बेहद मज़बूत है और लाश नंबर 1084 की माँ मिसेज चटर्जी की भूमिका में जया भादुड़ी इस फिल्म की आत्मा !!

अवार्ड विनिंग डायरेक्टर सुधीर मिश्रा की पहली फिल्म “ये वो मंज़िल तो नहीं” (1987)


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.