पेस्टन जी (1988): बम्बई के पारसी समुदाय पर बनी एक यादगार फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

हिंदी मेनस्ट्रीम फिल्मों में जब जब पारसियों का चित्रण किया गया है, अधिकाँश मौकों पर उन्हें मज़ाकिया तरीके से, कैरीकेचर के रूप में प्रस्तुत किया गया है. पर नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन के द्वारा प्रोड्यूस्ड और विजया मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म “पेस्टनजी” लीक से हटकर बॉम्बे के पारसी समुदाय के जीने के तौर तरीकों में झाँकने का एक ईमानदार प्रयास है. फिल्म की कहानी बी के करंजिया ने लिखी है. बी के करंजिया 18 सालों तक फिल्मफेयर मैगज़ीन के एडिटर रहे, फिर इसके बाद वे दस सालों तक फ़िल्मी पत्रिका स्क्रीन के एडिटर रहे. वे NFDC के भी चेयरमैन बने. विजया मेहता थिएटर की बड़ी कलाकार रहीं. उन्होंने विजय तेंदुलकर, श्रीराम लागू और अरविन्द देशपांडे के साथ मिलकर मराठी थिएटर ग्रुप रंगायन का गठन किया। उन्होंने पार्टी, कलयुग जैसी कुछ बेहद महत्वपूर्ण फिल्मों में दमदार भूमिकाएं पेस्टनजी (1988) से पहले राव साहब ( 1986) का निर्देशन किया.

हिंदी फिल्मों में बेहद कम महिला निर्देशकों का दखल रहा है. सई परांजपे, अरुणा राजे और बाद में पूजा भट्ट, तनूजा चंद्र, ज़ोया अख्तर जैसी महिला निर्देशकों को उँगलियों पर गिना जा सकता है. इन्ही बेहद कम महिला निर्देशकों में एक विजया मेहता ने पारसी समुदाय पर एक ईमानदार फिल्म बनायी है.

फिल्म की कहानी:
फिल्म की कहानी 1950 और 60 के दशक में बम्बई के पारसी समाज पर केंद्रित है और दो पारसी दोस्तों पिरोजशाह ( नसीरुद्दीन शाह) और पेस्टन जी ( अनुपम खेर) के आपसी संबंधों के उतार चढ़ाव पर विशेष तौर पर फोकस करती है.

पीरोज थोड़े अलग मिजाज के, थोड़े खंडूस किस्म के इंसान हैं. फिल्म की शुरुआत होती है: पीरोज सी बीच पर एक्सरसाइज कर रहे हैं. हास्यास्पद पोज बनाते हुए, मानो आने जाने वाले लोगों से कोई मतलब नहीं. अपने में खोये. एक बच्ची आकर गौर से देखने लग जाती है, उसे घुड़क देते हैं. घर लौटते समय वे देखते हैं कि कुछ लोग नो एंट्री बोर्ड पर पोस्टर लगा रहे हैं. उन पर भड़क उठते हैं. पोस्टर उखाड़ कर फेंक देते हैं. मॉर्निंग एक्सरसाइज के बाद घर पहुँचते हैं, तो नौकर से हिसाब लेने पहुँचते हैं. नौकर १००ग्राम की जगह 250 ग्राम भिंडी ले आया है. पीरोज भड़क उठते हैं: “बाप दादा इतनी बड़ी जायदाद छोड़कर गया के? मालुम है मोहंगाई कितना बढ़ गया है? तुम्हारा जैसा मानूस पैसा उड़ाता है, इसलिए इंडिपेंडेंट इंडिया में इतनी गरीबाई होती !”

पीरोज क्लब में आये हैं. अपने दोस्त से कह रहे हैं: आजकल टाइम्स ऑफ़ इंडिया मेरे लेटर नहीं छापता. डरते हैं. सच्ची बात किसको अच्छी लगती है !
दोस्त पेसी ( पेस्टनजी; अनुपम खेर) का जिक्र चल रहा है. पेसी आ गया है. दोनों दोस्त स्वाभाव में एकदम अलग हैं. पेसी अपने स्वाभाव में मुखर है, जबकि पीरोज इंट्रोवर्ट हैं. सोचते ज्यादा हैं, बोलते उससे कम हैं. पेसी एक कस्टमर को महाबलेश्वर का ट्रेवल पैकेज बेचने की कोशिश कर रहे हैं. टेबल पर नाश्ता करते हुए पीरोज मन ही मन सोच रहे हैं: पेसी बेचारा कितना बूढ़ा हो गया है !” फिर दिमाग झटकते हैं. “बेचारा क्यों? जैसा करना, वैसा भरना.”

कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है.
दोनों युवा हैं. दोनों दोस्त एक साथ शादी की प्लानिंग कर रहे हैं. मैरिज कौंसलर के जरिये पीरोज जेरू ( शबाना आज़मी) से मिलता है. जेरू सुन्दर है, बातें करने में पारंगत. पर पीरोज असमंजस में है. उसे होरोस्कोप मिलाना है. समय लेगा. पर जेरू के पिता जेरू की जल्द शादी के लिए अदन से आये हैं. जेरू की शादी पेसी से हो जाती है. जेरू और पेसी को आपस में बातें करते देख पीरोज सोचता है: मैंने होरोस्कोप का लफड़ा नहीं किया होता, तो आज जेरू मेरी वाइफ होती !”

मैरिज पार्टी में पीरोज की भेंट मरहूम सॉलिसिटर मिस्त्री की पत्नी सोना मिस्त्री ( किरण खेर) से भेंट होती है. सोना के पति उससे 20 साल सीनियर थे. सोना एक बेहद शोख, हसीं औरत है. वो पीरोज को छेड़ते हुए कहती है: “पारसी हो? सिंगल? I love Rich Single Parsi Bachelors.”
अगले दिन पीरोज पेसी के घर में बैठा हुआ है. पेसी पीरोज से कह रहा है: पंखा नहीं चलाती, खिड़की बंद करके सोती है. सायनस का प्रॉब्लम है न !
जेरू पियानो बजाने लगती है. पीरोज मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा है. पेसी बैट लेकर नीचे चला जाता है, अपार्टमेंट के बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने. पेसी को बच्चों से बेहद लगाव है.

पीरोज ने अपना ट्रांसफर बम्बई से भुसावल करवा लिया है. वहां ऑफिस में बैठा वो पेसी और जेरू के बारे में सोचता रहता है: “भुसावल में आते भी नहीं, चिट्ठी भी नहीं लिखते.”
समय बीत रहा है. 5 साल बाद पिरोज बम्बई लौटा है. पर जेरू को बदला हुआ देख कर हैरत में पड़ गया है. जेरू पहले की तरह खूबसूरत नहीं रही, बिखरी बिखरी, अव्यवस्थित और चिड़चिड़ी स्वभाव की हो गयी है. वो बहुत अपसेट होता है जब जानता है कि पेसी अब सोना मिस्त्री ( किरण खेर) के साथ लिव इन रिलेशन में रह रहा है. महाबलेश्वर में दोनों का हॉलिडे होम चल रहा है. “खुदाई तुमको कभी माफ़ नहीं करेगा, पेसी। मेरी बेचारी जेरु ” उस रात सपने में जेरु को देखता है, वो चिल्ला रही है, “पिरोजशाह मदद करो, मदद करो.”

8 दिनों की छुट्टी लेकर बम्बई आया था पीरोज. पर अब वो भुसवल लौट जाना चाहता है. पेसी मिलने आता है. पेसी बताता है कि जेरू को गर्भपात नहीं हुआ था, बल्कि जेरु ने खुद ऑपरेशन से बच्चा गिरा दिया था. उसकी माँ डिलीवरी के समय मर गयी थी, उसे भी यही डर सता रहा था.
पेसी पीरोज पर आरोप लगाता है, “तू क्या पाक साफ़ है जो पूरी दुनिया पर जजमेंट पास करता रहे? तू क्या समझता है मुझे तेरा जेरू से लगाव पता नहीं? तू क्यों नहीं शादी किया उससे?
तू अपनी जिंदगी जियो, मैं अपनी जिंदगी जियूँगा. दूसरों को जिंदगी का सलीका सिखाने में तुम इतने उलझ गए हो कि तुम्हारे ध्यान में ही नहीं आया कि Jeroo hates You !”

पेसी कमरे से निकल जाता है. सीढ़ियों पर वो गिर पड़ा है, उसे चोट आयी है. ऊपर से पीरोज उसे देख रहा है, एकदम मौन. कोई संवाद नहीं.
खुद को संभालता है पेसी. जाते हुए कहता है, ” जिंदगी खुदाई ने तुम्हे सुकून से जीने के लिए दी है; कम्प्लेन करने के लिए नहीं.”
बेहतरीन कैमरावर्क और नसीर और अनुपम खेर के भाव हैं.

पीरोज भुसवल लौट आया है. उसने तय कर लिया है, पेसी और जेरू के अलावा भी उसकी जिंदगी में बहुत कुछ है. वो बम्बई लौटने के मूड में नहीं है. पूना ट्रांसफर करवाना चाहा, पर हो नहीं पाया.

अचानक एक दिन उसे कॉल आता है. पेसी का हार्ट अटैक से देहांत हो गया है. अंतिम संस्कार में आया है. अंतिम संस्कार के लिए पैसे सोना मिस्त्री ने ही दिए हैं.
पीरोज सोचता है, ” पेसी मर गया है, तो भी सोना उसका पीछा नहीं छोड़ती.” वो उसके पैसे देने सोना के घर आया है. वहां उसे पता चलता है कि पेसी ने एक विल बनायी है, जिसमें जेरू के लिए व्यवस्था की है. सोना और पेसी का एक छोटा बच्चा है, जिसका नाम पेसी ने पीरोज ही रखा था. सोना ने एक कमरे को म्यूजिक एंड डांस लेसन के लिए किराये पर दे रखा है.
लौटते समय पीरोज के मन में ख्याल आ रहा है कि बेवजह वो जजमेंटल होता रहा. मैं हमेशा सोचता था कि जिंदगी। .. मैं गलत सोचता था.

जेरु के यहाँ आया है. जेरु की मदद करना चाहता है पीरोज. पर जेरु मानो अपनी दुनिया में मगन है. उसके टेबल पर फिक्स्ड डिपाजिट करने के लिए जरुरी कागज़ात छोड़कर जेरु के घर से निकल आया है.
सीढ़ियों पर उतर रहा है और सोच रहा है: ” हरेक की ज़िन्दगी अलग-अलग, हरेक नू सुख अलग-अलग,
तुम अपनी जिंदगी जियो पिरोजशाह पीठावाला,
और शुक्र मानो खोदाय का कि उसने तुमको जिंदगी दी
सुख से जीने के लिए ( वो अपने मरहूम दोस्त पेसी के शब्द दुहरा रहा है)

एक मीठे एहसास वाली फिल्म है ” पेस्टन जी”:

मीठी याद देकर फिल्म ख़त्म हो जाती है, दर्शकों के मन में एक सवाल उमड़ता रहता है: जब फिल्म का मुख्य किरदार पिरोजशाह है, तो फिर फिल्म का टाइटल ” पेस्टनजी” क्यों है? ये वजह हो सकती है कि फिल्म में पेसी और उसके जीवन से जुड़े लोगों को उसके दोस्त पीरोज के नज़रिये से दिखाई गयी है. इसलिए पीरोज पर पेसी ने जजमेंटल होने का आरोप भी लगाया है. अंग्रेजी में एक कहावत है, Perception is stronger than reality ! फिल्म पीरोज के परसेप्शन पर जोर देती है. कई फ़िल्में हैं, जहाँ नसीर करैक्टर के स्किन में घुस गए हैं, फिल्म पेस्टनजी उन फिल्मों में एक है. फिल्म नसीर के मज़बूत कन्धों पर टिकी है. पारसी मैनरिज़्म, उठने बैठने, बोलने का अंदाज़, एकदम परफेक्ट है. शबाना भी ऑथेंटिक लग रही हैं. हालाँकि उनका स्क्रीन स्पेस कम है, पर उन्होंने इसमें यादगार भूमिका निभायी है. फिल्म के पारसी किरदारों ( असल में पारसी) ने सहज रूप में भूमिका निभायी है. पर और लोग स्ट्रगल करते नज़र आ रहे हैं. राजन कोठरी की सिनेमेटोग्राफी पुरे माहौल को एक ऑथेंटिक टच देती है. फिल्म के कई दृश्य शानदार बन पड़े हैं. खास कर लिफ्ट वाले दृश्य और घुमावदार सीढ़ियों को दिखाने का तरीका. जब अनुपम खेर अंतिम बार नसीर से मिल कर लौटते हैं, और सीढ़ी उतरते समय थोड़ा ठिठकते हैं। उस समय कैमरा ऊपर से उन्हें कैप्चर करता है. तब मन में कुछ खटकता है और फिर अनायास ही, पेसी की मृत्यु की सूचना मिलती है. वनराज भाटिया का बैकग्राउंड म्यूजिक सूथिंग है, कानों को चुभता नहीं, और माहौल को बनाने में मदद करता है. रेनू सलूजा की एडिटिंग ने दर्शकों को फिल्म से बांधे रखा और फिल्म किसी मोड़ पर ढीली नहीं होती. फिल्म को बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला.

श्याम बेनेगल की एक यादगार फिल्म “त्रिकाल” (1985)


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.