केरल में शोषक सामंतवादी व्यवस्था की पृष्ठभूमि में प्रेम की यादगार दास्ताँ, फिल्म ” चिरुथा” (1981)

Balendushekhar Mangalmurty

1981 में केरल के महान उपन्यासकार टी एस पिल्लई की कहानी पर एक फिल्म बनी, जिसका नाम था ” चिरुथा”. चिरुथा की कहानी जहाँ एक तरफ केरल के समाज में व्याप्त सामंती शोषण और उसके खिलाफ दलितों के आवाज उठाने की कहानी है, वही दूसरी तरह इसके सामानांतर चिरुथा, चाथन और कोरन के उद्दात प्रेम की अद्भुत दास्ताँ है.
कहानीकार टी एस पिल्लई  ने केरल में भूमिहीन कृषक मज़दूरों के शोषण के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन की पृष्ठभूमि में निःस्वार्थ प्रेम का ऐसा ताना बाना बुना है कि दर्शक चमत्कृत हो जाते हैं.

केरल के कुट्टनाड में चिरुथा अपने माँ बाप के साथ रहती है. चिरुथा का पिता उसकी शादी उसी से करेगा, जो उसे एक निश्चित राशि दहेज़ में देगा. एक गरीब भूमिहीन कृषक मज़दूर कोरन (Inayatullah Kantroo) उससे प्रेम करता है, ऐसे में दहेज़ की राशि जुटाने के लिए वो ज़मींदार थामरन ( सुधीर दलवी) के पास जाकर अपने आपको बंधुआ मज़दूर बना देता है. कोरन और चिरुथा की शादी हो जाती है और दोनों वैवाहिक जीवन बिताने लगते हैं. कोरन के साथ ही चिरुथा भी खेतों में काम करती है. दोनों फूस की टूटी फूटी झोपडी में रहते हैं.

गांव की अधिकाँश जमीन थामरन की है और उसका बेटा चाको अपने खेतों में काम करने वाली औरतों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाता रहता है. कुछ इच्छा से तैयार हैं, कैईयों के साथ वो जबरदस्ती करता है. गांव में थामरन के शब्द भी कानून हैं, न्याय इन गरीबों के लिए नहीं है.
कई प्रभावी दृश्य बन पड़े हैं, जो तत्कालीन सामाजिक विषमता को दिखाते हैं. एक दृश्य में चाको (कल्याण चटर्जी) रात में एक कृषक मज़दूर की झोपडी पर पहुंचता है और पुरुष को कहता है, “जाओ उस पार से पान बीड़ी लेकर आओ.” वो आदमी चुपचाप चला जाता है. चाको झोपडी के अंदर जाता है. अंदर उसकी औरत बैठी हुई है. उस औरत के साथ चाको शारीरिक सम्बन्ध बनाता है. औरत भी उसके साथ अपनी इच्छा से शामिल होती है.
एक दूसरा दृश्य. चाको की पत्नी अपने कमरे में लेटी हुई है. तभी चाको एक लड़की को पकडे कमरे में घुसता है. उसकी पत्नी बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकल जाती है. और चाको उस डरी सहमी लड़की के साथ जबरदस्ती करता है.
एक दृश्य में एक कृषक मज़दूर चिन्ना काम पर नहीं आया. थामरन नाराज है. चाको अपने आदमियों के साथ झोपड़े पर जाता है, चिन्ना की बेतरह पिटाई करता झोपडी भी जला देता है.
ऐसी विषमताओं से भरे समाज में रहते हैं कोरन और चिरुथा. चिरुथा पर भी चाको की नज़र है. कई बार खेत आते जाते चाको उसका पीछा करता है.

कोरन दिन रात खेत पर मेहनत करता है, चिरुथा नाराज भी होती है, तबियत खराब हो जायेगी, मेरे साथ वक़्त नहीं बिताते, फलां फलां. पर कोरन पर इन सब बातों का कुछ असर नहीं होता. वो खेत में लहलहाती फसल को देखकर खुश है. फसल तैयार हो गयी है. कोरन दूसरे मज़दूरों के साथ धान की फसल काटने में लगा है. धान की कुछ बालियां उसने अपने लिए अलग से रख लिया है. उसके पिता (खोखा मुख़र्जी) उसके पास आये हैं. गांव में भोजन नहीं था, भूख से परेशान होकर आये हैं. पिता को कांजी पिलाने के लिए उसने कुछ धान की बालियां रख ली हैं. थामरन उसे काफी फटकारता है. बुझे मन से कोरन धान की बालियां अलग रख देता है. उसने इस खेत में दिन रात मेहनत की है, और इतनी सी बालियां भी नहीं ले सकता. चिरुथा भी अपने आंचल से धान की बालियां रख देती है.

उस रात कोरन का पिता कांजी सुड़क सुड़क कर पी रहा है. मानो काफी दिनों की भूख मिटा रहा हो.
अगले दिन कोरन थामरन के पास जाता है और सहज भाव से पूछता है: मेरे खेत में कितना धान निकला? मैं दिन रात खेत में काम किया, मेरे को मालूम होना मांगता कि खेत में कितना धान निकला? इस पर थमरण उसे चाबुक से बहुत बुरी तरह पीटता है. बाकी लोग देख रहे हैं. थमरण चीखता है, देखते क्या हो, काम करो. सब यंत्रवत काम में लग जाते हैं, मानो ये उनके लिए कोई मुद्दा नहीं हो.
अगले दिन कोरन का हिसाब हो जाता है. उसके लोन को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाता है. और कुछ पैसे हाथ में थमा दिए जाते हैं.
“अप्पा बीमार, मेरे को धान मांगता, पैसे नहीं.”
पर थामरन उसकी एक नहीं सुनता.
अप्पा चल बेस. अंत समय तक अफ़सोस करते रहे कि मैंने ही कांजी पीने की इच्छा की थी, मेरे बेटे को चाबुक से थमरण ने पीटा.
अप्पा को दफनाने के लिए कोरन थामरन से थोड़ी जमीन मांगने जाता है. पर उसे दुत्कार मिलती है.
अप्पा की लाश को पानी में बहाना पड़ता है.

इन कटु अनुभवों ने कोरन को उद्द्वेलित करके रख दिया है. वो क्रांतिकारी बन गया है. “मेरे को लड़ना; सबके भले के लिए लड़ना” वो लोगों को एकजुट करने में लग गया है. इन लोगों के पास जमीन नहीं है. जमीन तो थामरन के पास है. वे पम्पा नदी में अपनी अपनी नावों में बैठे हैं और कोरन भाषण दे रहा है, ” हमको भूख से नहीं मरना, हमको लड़ के मरना”
चिरुथा प्रेग्नेंट हो गयी है. चिरुथा को डर है कि थामरन उसे मार सकता है. पर कोरन आंदोलन के बारे में सोच रहा है. वो न्याय की लड़ाई पर सोच रहा है. एक रात जब कोरन झोपडी पर नहीं होता है, तो चाको चिरुथा के साथ बलात्कार करने की मंशा से झोपडी में घुस आता है. ऐन मौके पर मीटिंग से कोरन लौट आता है. झड़प में कोरन चाको की गला दबा कर ह्त्या कर देता है.
उस रात कोरन गर्भवती चिरुथा को लेकर चाथन ( उदय चन्द्र) की झोपडी पर जाता है. चाथन चिरुथा से प्रेम करता था,वो चिरुथा से शादी नहीं कर सका. उसने अभी तक शादी नहीं की है.
बेहद भावुक दृश्य बन पड़ा है. चाथन की झोपडी में बेहोश पड़ी है चिरुथा, कोरन के पीछे थामरन के लोग लगे हैं, उसकी कभी भी ह्त्या हो सकती है. या अगर पुलिस पकड़ लेती है, तो लम्बे समय तक जेल जाना होगा. दोनों स्थिति में चिरुथा और अजन्मे बच्चे का क्या होगा? कोरन चाहता है कि चाथन चिरुथा से शादी कर ले. जाने से पहले कोरन चिरुथा के माथे पर हाथ रखकर फफक रहा है, ” मेरे को जाना चिरुथा; मेरे को समझना, मेरी चिरुथा”

कोरन पकड़ा जाता है और उसे दस साल की सजा हो जाती है. जेल में उससे मिलने आते हैं चिरुथा और चाथन।
चिरुथा अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में कोरन से सवाल करती है: इसका क्या होना?
पालने का; बड़ा करने का.
अप्पा किधर, पूछे तो?
जेल में बोलने का.
कोरन समझाता है: “जेल में दस साल लगने का. तू मेरे वास्ते रुकने का नहीं. चाथन अच्छा आदमी है, वो तेरा ख्याल रखेगा.”

चिरुथा और चाथन लौट आते हैं. उस बात को दस साल बीत गए हैं. एक दिन अचानक कोरन चाथन से मिलने आ जाता है. चाथन से आंदोलन के बारे में पूछता है. आंदोलन चल रहा है. पर चाथन आंदोलन का हिस्सा नहीं बना. उसे चिरुथा और उसके बच्चे की देखभाल करनी थी. अगर उसे कुछ हो जाता तो इन दोनों को कौन देखता. कोरन जानकर हैरत में पड़ जाता है कि चाथन ने अब तक चिरुथा से शादी नहीं की.
कोरन एकदम टूट कर रोने लगता है: चाथन, तूने मेरे लिए, मेरी जोरू के लिए, मेरे बच्चे के लिए 10 साल… आवाज उसके गले में रुंध जाती है.
10 साल बाद कोरन और चिरुथा मिले हैं. दोनों गले मिलकर रो रहे हैं. नाव खेकर चाथन दूर जा रहा है. चिरुथा का बेटा उसे पुकार पुकार कर रो रहा है.

अंतिम दृश्य में चिरुथा, कोरन खेत में काम कर रहे हैं, आंदोलनकारियों का एक जुलुस इन्क़िलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाता हुआ गुजर रहा है. चाथन इस जुलुस का नेतृत्व कर रहा है.
फिल्म ख़त्म हो जाती है. दर्शक चिरुथा, कोरन और चाथन के उदात्त प्रेम के बारे में सोचता रह जाता है. किसका प्रेम महान? कोरन का, जिसने अपनी चिरुथा की खुशहाली के लिए चाथन के पास ले आया? या फिर चाथन, जिसने चिरुथा के प्रेम में कभी शादी नहीं की, जब अवसर मिला, तब भी उसने चिरुथा का निःस्वार्थ भाव से ख्याल रखा? या फिर चिरुथा, जिसने दस सालों तक कोरन का प्यार दिल में बसा कर रखा?
सवाल कई हैं, पर जवाब आसान नहीं.

महान कथाकार ने जिस तरह सामंती शोषण के पैरेलल प्रेम की कहानी रची, बुनी है, वो अद्भुत है. दर्शक भुलाये नहीं भूलता. फिल्म देखी चाहिए. फिल्म में केरल का बैकवाटर्स भी सिनेमेटोग्राफी ने अच्छा कवर किया है. जिस तरह गंगा के मैदानी इलाकों में गंगा का महत्त्व है, उसी तरह केरल के दैनिक जीवन में बैकवाटर्स का महत्त्व है. फिल्म में संगीत सलिल चौधरी का है. फिल्म में चिरुथा की भूमिका में दीप्ति नवल हैं. दीप्ति नवल के अभिनय को देखने पर महसूस होता है कि वे एक भरोसेमंद अभिनेत्री हैं, जो संजीदा किरदारों को विश्वसनीय तरीके से निभा जाती हैं.


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