घरौंदा (1977): बम्बई में घर का सपना संजोये मिडिल क्लास कपल के नैतिक पतन की कहानी

Balendushekhar Mangalmurty

1977 में रिलीज़ हुई फिल्म “घरौंदा” बम्बई के हाउसिंग प्रॉब्लम और मिडिल क्लास कपल, सुदीप ( अमोल पालेकर) और छाया ( ज़रीना वहाब) के एक घर के सपने और इसे साकार करने का प्रयास करते करते उनके नैतिक पतन की कहानी हैं, उनके द्वारा किये गए समझौतों की कहानी है. फिल्म के निर्माता और निर्देशक भीमसेन ने फिल्म मेकिंग से पहले एनिमेटर के रूप में ख्याति अर्जित की थी. डॉ शंकर शेष की कहानी और गुलज़ार के स्क्रीनप्ले और गुलज़ार और भूषण बनमाली के डायलाग से सजी फिल्म बम्बई में घर का सपना संजोये जोड़े के लिए आसान रास्ते की तलाश नहीं करती है. फिल्म में बम्बई शहर भी एक किरदार है, जो अपने स्वाभाव में निर्दयी है, जो आम जन के सपनों को कुचल देता है और उन्हें कई अनचाहे समझौते करने पर विवश करता है.

फिल्म की कहानी:

सुदीप ( अमोल पालेकर) और छाया ( ज़रीना वहाब) लोअर मिडिल क्लास फैमिली से आते हैं. दोनों बम्बई शहर में एक रिच बिजनसमैन मिस्टर मोदी ( श्रीराम लागू) के दफ्तर में काम करते हैं. सुदीप तीन लोगों के साथ रूम शेयर करता है, तो छाया अपने छोटे भाई, बड़े भाई और उसकी पत्नी के साथ एक रूम शेयर करती है. दोनों का एक सपना है कि दोनों शादी करें, पर शादी से पहले एक घर का इंतजाम करना होगा. पर उनकी छोटी आमदनी में घर खरीदना इतना आसान नहीं. पैसे जुटाने के लिए सुदीप ओवर टाइम कर रहा है, छाया भी हाथ पांव मार रही है. अंत में अँधेरी ईस्ट में अपने रूम पार्टनर गुहा ( साधु मेहर) की मदद से सुदीप और छाया ने एडवांस जमा कर दिया है. गुहा ने भी उसी अपार्टमेंट में एक फ्लैट बुक करवा लिया है. पर बिल्डर फ्रॉड निकलता है. वह लोगों के पैसे लेकर फरार हो जाता है. सदमे में गुहा ने आत्महत्या कर ली है. सुदीप और छाया के खून पसीने की मेहनत से जमा की गयी पूंजी रातों रात उड़ जाने से दोनों के घर का सपना बिखर कर रह गया है.

ऐसी स्थिति में सुदीप को एक ही रास्ता सुझाई देता है, जो नैतिक पतन की दास्ताँ है. सुदीप छाया से कहता है, तुम मोदी ( जो कि विधुर हैं, सीनियर सिटीजन हैं और दिल के मरीज हैं, पर पैसे वाले हैं और छाया में रूचि लेते हैं.) से शादी कर लो, कितने दिन जियेगा? इसके बाद ही अपना घर बन सकता है ! पहले तो इस मशविरे पर छाया काँप जाती है, पर उसके छोटे भाई का भी सपना है कि वो अमेरिका हायर स्टडीज के लिए जाए. उहापोह से उबरने में ज्यादा वक़्त नहीं लेती छाया. उसने तय कर लिया है, ” हर चीज कीमत मांगती है. गोविन्द को पढ़ाने का वायदा किया है. मैं ये कीमत चुकाऊँगी.” छाया की शादी मिस्टर मोदी से हो जाती है. छाया अब मिसेज मोदी बन गयी है.

पर शादी के बाद सुदीप का प्लान उल्टा पड़ जाता है. छाया बजाय सुदीप की प्लानिंग का हिस्सा बनने के, एक कर्तव्यपरायण पत्नी बनने की ओर अग्रसर है. वह मिस्टर मोदी के तबियत का पूरा ख्याल रखने लगी है. ऐसे में मिस्टर मोदी का स्वास्थ्य बेहतर होता जाता है. शुरुआत में छाया असहज फील करती है, पर वो समय के साथ मोदी की ओर झुक जाती है. सुदीप ने छाया के सामने अश्लील प्रस्ताव रखकर नैतिक ऊंचाई खो दी है. वो बार बार किसी न किसी बहाने से छाया से मिलने की कोशिश करता है, पर छाया उससे दूरदूर भागती है.
सुदीप का अपने काम में मन नहीं लगता है. वो दिन भर इधर उधर भटकता रहता है. कभी अपने काम में बेहद सजग सुदीप अब ऑफिस आने में भी कोताही बरतने लगा है. उसने दफ्तर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया है. वह अब अपने रूम पर भी कम ही रहता है. देनदार उसके पीछे पड़े हैं. वो भागता फिर रहा है. कोठे पर भी जाने लगा है. वो एकदम से लक्ष्यविहीन हो गया है और पतन की राह पर तेजी से चल पड़ा है.

ऐसा लगता है सुदीप जैसे छाया को खोकर जीवन की जंग हार गया हो. सुदीप ने अपना सब कुछ गंवा कर अब बम्बई हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया है. अंतिम बार वो छाया से मिलने आया है और उसे बताता है रात के 11. 30 में उसकी ट्रेन है, वो स्टेशन पर छाया का इन्तजार करेगा. मिस्टर मोदी छज्जे पर खड़े सुदीप और छाया की बात सुन लेते हैं. वे अपने स्टडी रूम में चले जाते हैं. उन्हें दिल का दौरा पड़ता है. उन्हें लगता है छाया उन्हें छोड़कर चली गयी है. पर छाया कहीं नहीं गयी है. वो मिस्टर मोदी से कहती है, जाना होता तो मैं आती ही क्यों?
अंतिम दृश्य में सुदीप बम्बई छोड़ कर जाने की जिद छोड़ देता है और इसी शहर में रहकर फाइट करने का सोचता है. वो अब अपना जीवन छाया के परे देख रहा है. वो मिस्टर मोदी की नौकरी फिर से स्वीकारने से इंकार कर देता है और कहता है, ” जिंदगी सिर्फ छाया तो नहीं, जो असलियत है वो छाया नहीं.”
अब सुदीप बम्बई में रहेगा और जिंदगी से लड़ेगा.

फिल्म बम्बई के हाउसिंग प्रॉब्लम पर एक निष्ठुर विवेचना है:

फिल्म बिना जजमेंटल हुए, बिना इमोशनल हुए मिडिल क्लास फॅमिली से आये कपल के बम्बई जैसे शहर में, जहाँ जीना ही अपने आप में एक चुनौती है, और घर का सपना देखना तो मानो अपराध ही है, अपने घर के सपने को पूरा करने के लिए अनैतिक रास्ते को अपनाने को भी सर्वाइवल स्ट्रेटेजी के रूप में देखा है. फिल्म में बम्बई भी मानो एक किरदार है. गुलज़ार ने अपने गीतों से इस पुरे मनोविज्ञान को प्रभावी तरीके से चित्रित किया है. जब सपने देख रहे हैं और जब सपने टूट कर बिखड़ जाते हैं, दोनों स्थिति पर गुलज़ार ने पावरफुल तरीके से कलम चलाई है, जिसे भूपेंद्र ने अपने आवाज के जादू से सजाया है. बांग्लादेश की गायिका रूना लैला ने भी एक बेहद शानदार गीत गाया है.
बम्बई शहर बॉलीवुड की कई फिल्मों का विषय रहा है, और कई गाने इस शहर के नाज़ नखरे, इसके चरित्र पर लिखे गए हैं. पर भीमसेन की फिल्म ख़ास है नाटकीयता से बचने के लिए, कोई जजमेंट नहीं देने के लिए. फिल्म में सबसे उम्दा काम किया है मिस्टर मोदी की भूमिका में श्रीराम लागू ने. श्रीराम लागू एक बेहद प्रभावशाली अभिनेता रहे हैं. उनके अभिनय में एक ठहराव दिखता है, मानो अपने भावों को व्यक्त करने के लिए उनके पास काफी समय हो. ऐसे में वे सिर्फ बोलकर अभिनय नहीं करते, बल्कि उनके मौन, उनकी आँखों में भी अभिनय होता है. उन्हें इस फिल्म में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला. फिल्म में जयदेव का संगीत, गुलज़ार और नक्श लायलपुरी के गीतों के साथ मिलकर एक अद्भुत समां बांधता है, जिसके कैद से आजाद हो पाना आसान नहीं है. “दो दीवाने शहर में” गीत के लिए गुलज़ार को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला.
फिल्म एक बार जरूर देखी जानी चाहिए.


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