औरत की खरीद बिक्री की सच्ची घटना पर आधारित फिल्म “कमला”(1984)

Balendushekhar Mangalmurty

1984 में फिल्मकार जगमोहन मुंद्रा ने मार्क जुबेर, शबाना आज़मी और दीप्ति नवल को लेकर एक फिल्म बनायी थी, जिसने अपने विषय वस्तु के चलते अच्छी खासी चर्चा बटोरी थी. फिल्म आगरा- मोरेना-मैनपुरी- एटा एरिया में औरतों की खरीद बिक्री की प्रथा पर आधारित है, जिसे इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार अश्विनी सरीन ने एक्सपोज किया था. सरीन ने धौलपुर में कमला नाम की महिला को ख़रीदा था ये साबित करने के लिए कि आज भी देश के कुछ इलाकों में इस तरह की निकृष्ट प्रथा बदस्तूर जारी है. फिल्म का स्क्रिप्ट जाने माने नाटककार विजय तेंदुलकर ने लिखा है, जो उनके ही नाटक कमला पर आधारित है.

फिल्म की कहानी:

जयसिंह जादव दिल्ली रिपोर्टर अखबार का एक तेज तर्रार जर्नलिस्ट है. शान शौकत से रहता है, महत्वकांक्षी, हमेशा ब्रेकिंग न्यूज़, स्कूप की तलाश में. उसका मानना है, “Everything is fair in love, war and… Sensitive Journalism !” उसे कहीं से लीड मिलती है कि एक जगह आदिवासी लड़कियों की खरीद बिक्री होती है, जहाँ पैसे देकर उन्हें सेक्स के लिए या घरेलु काम काज के लिए खरीदा जाता है. उसे इसमें एक बिग ब्रेकिंग स्टोरी की सम्भावना दिखाई देती है. वो एक दलाल बिहारी ( मज़हर खान) की मदद से 250 रूपये में एक आदिवासी महिला को खरीदता है. फिल्म में खरीदने के समय का दृश्य revulsion पैदा करता है, जब एक लड़की को बिहारी अपने हाथ की लकड़ी से वक्ष स्थल को ढंकती साड़ी हटा देता है और उसके बदन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह नग्न हो जाता है और उसकी पीठ पर हाथ फेरता हुआ कहता है, जहाँ देखिये साहब, मांस ही मांस. और उसके नितम्ब पर हाथ मारता है.
फाइनली जयसिंह कमला को खरीदता है. अब उसे लेकर दिल्ली जाना है. पर कमला में दासत्व का भाव इतना स्ट्रांग है कि वह मालिक के साथ टमटम पर नहीं बैठती है, बल्कि वो बस तक टमटम के पीछे दौड़ती चलती है.
फिल्म में ऐसे दृश्यों और डायलॉग्स की भरमार है, जो दर्शकों को सोचने पर मज़बूर करते हैं क्या इसी सभ्य कहे जाने वाले देश में ऐसी प्रथा और ऐसे लोग भी रहते हैं. विजय तेंदुलकर हार्ड हिटिंग डायलाग के इस्तेमाल के लिए, सेक्सुअल एंड वायलेंट इमेजरी के इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं, जाहिर है उन्होंने इस फिल्म में शब्दों के इस्तेमाल में कोई कंजूसी नहीं की है.

जयसिंह कमला को दिल्ली अपने घर ले आया है. कमला सोचती है कि मालिक ने ख़रीदा है, अब मैं मालिक की जिम्मेवारी हूँ. खरीद फरोख्त में उसे कोई दिक्कत नहीं महसूस होती, कुछ भी अनैतिक नहीं लगता. खुद की हैसियत गाय बैल से अधिक नहीं लगाती. उसके आने से घर में जयसिंह और उसकी पत्नी सरिता ( शबाना आज़मी) के बीच तनाव बढ़ता है, काका साहेब से उसकी बहस होती है. काका साहेब भी दिल्ली से दूर एक छोटे से शहर में एक छोटा अखबार चला रहे हैं और इस तरह की सनसनीखेज ख़बरों को उचित नहीं मानते और जयसिंह के हमेशा स्कूप के पीछे भागने की प्रवृति पर तंज कस्ते हैं, पर जयसिंह पर इन बातों का असर नहीं होता. वो एक बेहद सफल जर्नलिस्ट है और एक शानदार सुख सुविधा से संपन्न लाइफ स्टाइल जी रहा है और अपनी सफलता के लिए अपने सहकर्मियों के बीच ईर्ष्या का भी विषय है. नौकरानी ( सुलभा देशपांडे) सोचती है कि शायद घर में एक और नौकरानी आ गयी है. पर जल्द ये स्पष्ट होता है कि कमला की हैसियत एक स्कूप से अधिक कुछ नहीं है.
अपने अख़बार के एडिटर जसपाल जी ( शफी इनामदार) से बात करके उसे प्रेस कांफ्रेंस में पेश करता है. प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार और अन्य गेस्ट्स शराब पी रहे हैं और हंसी ठिठोली कर रहे हैं, मानो कमला इंसान नहीं हो, कोई सामान हो. कमला लोगों को देखकर प्रतिक्रिया समझ नहीं पा रही, वो भी हंसती है.

फिल्म में एक दृश्य है, जो एक तरफ कमला की मासूमियत दिखाता है, वहीँ दूसरी ओर कमला की मासूम से सवालों के बहाने स्त्री की अस्मिता का सवाल उठाता है. कमला सरिता से पूछती है, मालिक ने तुम्हे कित्तो में खरीदो? सरिता कहती है, 700 रूपये में. कमला हैरत में पड़ जाती है, बहुत ही महंगा भयो सौदा ! क्योंकि सरिता तो खेती भी नहीं कर सकती, बच्चे भी मालिक को नहीं दिए. उसे सरिता की हैसियत अपने जैसी ही लगती है. वो उसे बड़ी दीदी कहने लगी है और काम का बंटवारा कर रही है. बर्तन, पोछा आदि वो कर लेगी और सरिता दीदी हिसाब किताब रखा करेगी। बच्चे भी वो पैदा कर देगी. साहब जितने चाहें, ले लें. महीने के 15 दिन सरिता साहब के साथ सोयेगी, और 15 दिन कमला.

सरिता जो शुरू में इस मासूमियत भरे सवालों का लुत्फ़ ले रही थी, और खेल समझकर हिस्सा ले रही थी, मानो एक नींद से जाएगी. उसे लगने लगा मानो अभी तक वो स्लीप वाकिंग कर रही थी, अब एक झटके से उसकी आँख खुल गयी हो. क्या है उसका अपना अस्तित्व? कहाँ है उसकी अपनी मर्जी? क्या सिर्फ पति की सेवा करना ही उसका एकमात्र काम है और जयसिंह की पत्नी होना ही उसकी पहचान है !
जब जयसिंह उसे जोशी की पार्टी में ले जाना चाहता है, तो सरिता ने अपने तेवर बदल लिए हैं. उसे पार्टी में नहीं जाना है. ” उन्होंने मुझे नहीं बुलाया है, उन्होंने तुम्हारी पत्नी को बुलाया है. मैं तो कमला हूँ, तुम्हारी दासी !”

जयसिंह की स्टोरी खलबली मचा रही है. पोलिटिकल इस्टैब्लिशमेंट अब अखबार के मालिक और सम्पादक पर दवाब बना रहा है. जयसिंह पर भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग के ग्राउंड पर केस हो सकता है. वो कमला को लेकर नारी आश्रम चला जाता है. कमला समझ नहीं पा रही है, जब घर है तो फिर यहाँ क्यों रहना? मालिक ने उसे ख़रीदा है, तो मालिक ही उसे पालन पोषण करें. उसका काम मालिक की सेवा करना है.

राजनीतिक दवाब बढ़ता जा रहा है. राजनीतिक आकाओं को बर्दाश्त नहीं कि देश में इस तरह की भी प्रथा है, ये बात जनता के सामने आये. बात को दबाने के लिए एक रात कमला को नारी आश्रम से गायब कर दिया जाता है. इस घटना को हैडलाइन खबर बनाने के लिए जयसिंह ने स्टाफ को निर्देश दिया, उसे लगता है मामला और तूल पकड़ेगा और उसे और प्रसिद्धि मिलेगी. अगली सुबह चाय की चुस्की के साथ अखबार पलट रहा है, पर हैडलाइन की बात तो दूर, अखबार के किसी पेज में उसका जिक्र तक नहीं. वो एडिटर जसपाल जी से मिलने जाता है. एडिटर पोलिटिकल प्रेशर की बात कहकर उससे इस्तीफा ले लेते हैं.
अंतिम दृश्य में सरिता ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया है. सरिता काका साहेब से पूछती है, आदमी बड़ा होकर बड़ा क्यों नहीं होता, मालिक क्यों बन जाता है? काका साहेब सरिता को समझा रहे हैं, पुरुष का अहंकार बड़ा होता है. जयसिंह भी अहंकार का गुलाम है. पुरुष वो गुलाम है, जो अहंकार का नकाब ओढ़कर अपने आप को मालिक समझता है. पर जब ये नकाब उतरता है, तो बुरी हालत होती है.

गाडी आ गयी है. जयसिंह नशे की हालत में बड़बड़ाता हुआ उतरता है, अखबार को, मालिक को, एडिटर को गालियां बक रहा है, वहीँ लॉन में लुढ़क गया है. काका साहेब सरिता को इशारा करते हैं. सरिता जयसिंह को सँभालते हुए घर के अंदर ले जाती है.

फिल्म दर्शकों की सम्वेदनशीलता को झकझोरती है:
फिल्म दर्शकों की सम्वेदनशीलता को झकझोरती है. फिल्म में शबाना आज़मी हैं, पर ज्यादा चैलेंजिंग रोल दीप्ति नवल के हिस्से आयी है. दीप्ति नवल ने अपने किरदार की मासूमियत, अपने घर से बाहर की दुनिया की एकदम समझ न रखने वाली महिला का किरदार बेहद विश्वसनीय तरीके से निभाया है. मार्क जुबेर ने भी नैतिकता के बोझ से मुक्त, महत्वकांक्षी, फोकस्सड जर्नलिस्ट की भूमिका में जान डाल दी है. फिल्म चूँकि सत्य घटना पर आधारित थी, इसलिए रिलीज़ होने के साथ ही चर्चा का विषय बन गयी.
फिल्म ख़त्म होने पर कई सवाल खड़े करती है. क्या औरत की खरीद बिक्री में शहरी, सभ्य कहे जाने वाले समाज की भी तो भूमिका है. कानून की पहुँच कमला जैसी औरतों तक क्यों नहीं हो सकी? जयसिंह की भी तो तारीफ नहीं कर सकते, जिसके लिए कमला एक वस्तु मात्र है, करियर में एक और अवार्ड हासिल करने का जरिया मात्र. अपनी महत्वाकांक्षा और तरक्की की चाह में वो अपनी पत्नी की इच्छा अनिच्छा भी कभी नहीं पूछता. कमला तो कमला, सरिता को भी वो कितना सम्मान देता है? जब बैडरूम में उसके सेक्सुअल एडवांस को सरिता रिजेक्ट करती है, तो जयसिंह को ये अपना अपमान लगता है. वो समझ ही नहीं पाता कि सरिता की अपनी इच्छा अनिच्छा भी हो सकती है. उसे बस इतना समझ आता है कि वो थका हारा घर लौटता है और सरिता की ये ड्यूटी है कि वो उसे सुख दे. सरिता, कमला और जयसिंह तीनों इसी रिग्रेसिव सोसाइटी और मेंटालिटी की उपज हैं और साथ ही भुक्तभोगी भी, साहेब के शब्दों में कहें तो, गुलाम हैं.

जगमोहन मुंद्रा की फिल्म देखी जानी चाहिए तमाम असहज करने वाले सवालों से दो चार होने के लिए.


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