देवदासी प्रथा के खिलाफ संघर्ष की दास्तान फिल्म “गिद्ध” (1984)

Balendushekhar Mangalmurty

1984 में टी एस रंगा ने देवदासी प्रथा के खिलाफ संघर्ष पर एक फिल्म बनायी थी, गिद्ध. फिल्म को नेशनल फिल्म अवार्ड में स्पेशल जूरी अवार्ड से सम्मानित किया गया था. मंदिरों में देवताओं और देवियों की सेवा के लिए युवतियों की नियुक्ति की जाती थी, जिन्हे देवदासी कहा जाता था. इनका देवताओं से बाकायदा विवाह होता था, और ये मंदिरों में ही रहती थीं, पर  मंदिर के पुजारियों, मंदिरो के संरक्षकों के द्वारा देवदासियों का यौन शोषण भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय बन गया. कई समाज सुधारकों ने इसके खिलाफ आवाज उठायी, कालांतर में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने भी इसे अच्छी नज़रों से नहीं देखा. ये देखा गया कि मंदिरों में देवदासियों के तौर पर दलित युवतियों की भर्ती की जाती रही है, जाहिर है जातीय व्यवस्था में दलित युवतियों के शारीरिक शोषण का मसला पुरे जोर से उभर कर सामने आया. भारत सरकार ने देवदासी प्रथा पर 1988 में कानूनन रोक लगा दी. कानूनन रोक लगने से काफी पहले से इस व्यवस्था में निहित शोषण के खिलाफ आवाज उठ रही थी. इस रोक से चार साल पहले टी एस रंगा ने फिल्म बनायी थी, जो इसी विरोध की दास्तान है.

फिल्म की कहानी:
महाराष्ट्र- कर्णाटक बॉर्डर पर एक गांव है, जहाँ देसाई जमींदार है. उसके खेत में कृषक मज़दूर काम करते हैं. इस गांव में देवदासी प्रथा का प्रचलन है जहाँ दलित युवतियों को देवी येलम्मा की सेवा के नाम पर मंदिर में रख लिया जाता है, और जो वास्तव में पुजारी, देसाई जैसे धनिकों की वासनापूर्ति का माध्यम बनती हैं. इसी गांव में बसया ( ओमपुरी) और हनूमी (स्मिता पाटिल) भी रहते हैं. दोनों कृषक मज़दूर हैं, देसाई के खेतों में काम करते हैं. जब भोजन के लिए पर्याप्त पैसे नहीं जुटते, तो भरण पोषण के लिए रह रहकर बसया अपनी पत्नी हनूमी के पास ग्राहक लेकर आता है. कई साल पहले हनूमी देवदासी रह चुकी थी.
पर हनूमी और बसया अब देवदासी प्रथा के खिलाफ हैं. दोनों अपनी बेटी और भांजी लक्ष्मी को देवदासी बनाने के खिलाफ हैं और लक्ष्मी के मां बाप को भी सचेत करते रहते हैं. इसी गांव में मास्टरजी ( एम के रैना) हैं, जो देवदासी प्रथा के खिलाफ दलितों को एकजुट कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें गांव में दबंग लोगों के रोष का सामना करना पड़ता है, पर वे अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं करते. मास्टरजी से हनूमी को भी हौसला मिलता है, दोनों को लेकर गांव वाले तरह तरह की बातें भी करते हैं, पर मास्टर जी को इससे फर्क नहीं पड़ता.

इस गांव में एक दलाल है वीरप्पन ( नाना पाटेकर) जो गांव की लड़कियों को अच्छी जिंदगी के नाम पर फुसलाकर बम्बई ले जाता है और वहां उन्हें देह व्यापार में लगा देता है. एक दिन वीरप्पन की नज़र लक्ष्मी पर पड़ती है. वह उसमे जबरदस्त सम्भावना देखता है. उसी गांव में सुंदरी भी रहती है, जो बम्बई से अच्छा ख़ासा पैसा कमा कर लायी है. वीरप्पन जब जब गांव आता है, सुंदरी के पास ही ठहरता है.

बस्ती में लोगों को देवदासी प्रथा के खिलाफ एक जुट करते रहते हैं बसया और हनूमी। ये येलम्मा की मर्जी नहीं, गांव के धनिकों की मर्जी है, लोगों को समझाती है हनूमी.

बसया की भांजी लक्ष्मी 13 साल की किशोरी है, जिस पर देसाई की नज़र है. इसी पर पाटिल की भी नज़र है. और लक्ष्मी पर वीरप्पन की भी नज़र है. लक्ष्मी और अपनी बेटी को देवदासी बनने से बचाने के लिए दोनों प्राणी कृतसंकल्प हैं, पर राह आसान नहीं है. देसाई बसया की जमकर पिटाई करवाता है और दोनों को काम से निकाल देता है. उधर लक्ष्मी की माँ उसे पाटिल के सुपुर्द करने को तैयार बैठी है. इसके लिए उसने पाटिल से 800 रूपये भी ले लिए हैं.
लक्ष्मी को हासिल करने के लिए पाटिल और देसाई के बीच प्रतिस्पर्धा सी चल रही है. लक्ष्मी के मन में बम्बई की बेहतरीन ज़िन्दगी को लेकर खूबसूरत ख्याल पक रहे हैं. वो सोचती रहती है, उसका नारायण मामा उसे लेकर बम्बई जाएगा. वह रोज बम्बई जाने वाली बस देखती रहती है.
देसाई मास्टरजी को भी धमकाता है. ” आपको बच्चों को पढ़ाने के लिए रखा गया है, वहीँ तक सीमित रहिये.” लेकिन मास्टरजी समझने को तैयार नहीं.

एक दृश्य में एक दलित किशोरी को येलम्मा की सेवा की खातिर देवदासी बनाया जा रहा है. उसके माँ बाप को देसाई 1000 रूपये, एक साड़ी दे रहा है.

हनूमी अपनी बेटी की शादी के लिए कर्ज मांगने मास्टरजी के पास जाती है,पर 300 रूपये का कर्ज देना मास्टरजी के बस के बाहर की बात है. मास्टरजी कहते हैं, ” उसूल होना अच्छी बात है, पर इस दुनिया में उसूलों पर जीने के लिए भी पैसे की जरुरत है.” हनूमी देसाई के पास जाती है. देसाई बदले में लक्ष्मी की मांग करता है. हनूमी को ये सौदा मंज़ूर नहीं. हनूमी को बेटी की शादी के लिए पैसे सुंदरी देती है. बेटी की धूम धाम से शादी हो जाती है. अब हनूमी लक्ष्मी की शादी करने के मंसूबे बना रही है, ताकि लक्ष्मी एक इज़्ज़तदार जिंदगी जी सके. पर एक रात हनूमी की बेटी लौट आयी है, अकेली. उसे उसका पति बात बात में पीटता था, वो अपनी माँ से कहती है, गलती की शादी करके.

” उसूल होना अच्छी बात है, पर इस दुनिया में उसूलों पर जीने के लिए भी पैसे की जरुरत है.”

लक्ष्मी को पीरियड शुरू हो गया है. लक्ष्मी की माँ खुश है कि गांव में लगने वाले मेले के समय लक्ष्मी को पाटिल को सौंप देगी. एक दिन बसया को बुलाकर देसाई ने 1000 रूपये गिनकर धर दिए और कहा, अगर तुम लोग अपनी खैर चाहते हो, तो दो दिन में लक्ष्मी को मेरे पास भेज दो. मेले का समय आ गया है. दूर दराज के इलाके से लोग मेले में जुट रहे हैं. लक्ष्मी भी अपनी मामी और मामा के साथ मेले में घूम रही है. लक्ष्मी को लेकर मेले में ही देसाई और पाटिल के आदमियों के बीच झड़प हो जाती है. इस झड़प के बीच बसया और हनूमी लक्ष्मी को लेकर निकल जाते हैं, पर इससे पहले वे बस पर लक्ष्मी को बिठा पाते, देसाई तीनो को पकड़ कर अपने खलिहान पर ले आया. पर खलिहान में आग लग जाने से तीनो फिर भाग निकले.

पुलिस आकर हनूमी को पकड़ कर ले जाती है. उस पर देसाई के खलिहान पर आगजनी और एक कम उम्र बच्ची को देवदासी बनाने का आरोप है. मास्टरजी की भी बदली हो गयी है. अब कोई नहीं जो पुलिस के पास जाकर उसकी बात रखे. दो दिन बाद हनूमी पुलिस स्टेशन से छूट कर आ जाती है. कैसे छूटी हनूमी? हनूमी कहती है, “अरे पुलिस भी तो मरद ही है न? छोड़ दिया.” लक्ष्मी को पाटिल को सौंपने की तैयारी चल रही है. इसी तैयारी के बीच से हनूमी और बसया लक्ष्मी को लेकर गांव से निकल भागते हैं. उसे बम्बई जाने वाली बस पर बिठा देते हैं. अब दोनों को सुकून है कि लक्ष्मी देवदासी नहीं बनेगी. नारायण मामा को तार करके सूचित कर देंगे दोनों.
अंतिम दृश्य में अपनी आँखों में सपने भरे लक्ष्मी बस से बम्बई जा रही है. पर रास्ते में उसे वीरप्पन मिल जाता है. ” मैं भी बम्बई ही जा रहा हूँ” कहकर लक्ष्मी के बगल में बैठ जाता है. बस तेजी से चलती हुई रात के अँधेरे में खो जाती है.

फिल्म सोचने पर मज़बूर कर देती है. लक्ष्मी को देवदासी बनने से रोकने का हनूमी और बसया का प्रयास फिर असफल हो गया. वो गांव से निकली तो बम्बई शहर के देह व्यापार के जाल में फंस गयी. समाज के निम्न तबके का प्रतिरोध स्टेट के असहयोग के चलते बेहद कठिन हो जाता है. औरत सदियों से शक्तिशाली लोगों के हाथ दिलबहलाव का साधन रही है. इसे सदियों से धर्म, सामाजिक व्यवस्था, परंपरा का आवरण दिया जाता रहा है.
मास्टरजी की बात दिमाग में देर तक गूंजती रहती है, ” उसूल होना अच्छी बात है, पर इस दुनिया में उसूलों पर जीने के लिए भी पैसे की जरुरत है.”

दीप्ति नवल निर्देशित एक खूबसूरत फिल्म ” दो आने की धुप, चार आने की बारिश” (2009)

 


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