JNU में विद्यार्थियों की पिटाई पर खीसे निपोड़ने वालों का वर्ग चरित्र: एक मार्क्सवादी व्याख्या !

Balendushekhar Mangalmurty

कई वाहयात लोग हैं जो JNU या दूसरे यूनिवर्सिटीज में छात्र छात्राओं की पिटाई पर खीसें निपोर रहे हैं। कई मेरे फ्रेंड लिस्ट में भी हैं। नहीं हटाता हूँ ऐसे लोगों को। क्योंकि फ्रेंड लिस्ट से हटाना कोई उपाय नहीं है। हालांकि उनकी खिखी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, खिखियाते रहें।

दो तरह के लोग हैं जो JNU में स्टूडेंट्स की पिटाई पर खिखिया रहे हैं। एक जिनके बाल बच्चे पढ़ रहे हैं प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में, जिनके लिए JNU के कुछ हज़ार की फीस के बजाय लाखों रुपये की फीस कोई इशू नहीं है। जिनके पास अपना कारोबार है, जो समृद्ध हैं। ऐसे लोगों को हायर एजुकेशन में सब्सिडी, स्टेट का रोल समझ मे नहीं आता है और कभी आएगा भी नहीं।

पर इनके साथ खिखियाने वाले दूसरे लोग भी हैं। जो अशिक्षित हैं, कम पढ़े लिखे लोग हैं, जो व्हाट्सप्प के अफवाहों से अपना ज्ञान वर्धन करते हैं, जिनका किताबों से सम्पर्क नहीं है, जो गप्प सुनकर अपनी राय बनाते हैं। हालांकि इनके मन मे शिक्षा की साध है और ये चाहते हैं कि अगर सस्ती अच्छी शिक्षा मिले क्वालिटी युक्त, तो जीवन बेहतर हो सकता है। ये समाज के संसाधन विहीन वर्ग से आते हैं, जिनके हाथ मे इंटरनेट क्रांति और संचार के माध्यम के सस्ते होने के चलते मोबाइल तो आ गया और दुनिया से जुड़ भी गए, पर जो एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था और भविष्य को लेकर आशा से वंचित हैं। इस वर्ग ने भीड़ बना रखी है, भीड़तंत्र का सबसे बड़ा सप्लायर है और सुविधा सम्पन्न वर्ग के साथ मिलकर खिखी कर रहा है।

जाने अनजाने ये तबका समृद्ध वर्ग और समृद्ध वर्ग के साथ जुगलबंदी किये सत्ता पक्ष के हितों के पोषण के लिए इस्तेमाल हो रहा है। इनको नौकरी और अच्छी शिक्षा मिले, ऐसा करने में सरकार को मेहनत लगती है तो ऐसा करो, एक इलीट वर्ग का कांसेप्ट ( ऑफ कोर्स एक फाल्स misleading नैरेटिव) खड़ा करो और उसके खिलाफ इस वर्ग को भड़काओ। सच्चाई ये है कि जो JNU की सस्ती और गुणवत्ता युक्त शिक्षा का फायदा उठा रहे हैं, उनमें से अधिकांश मिडिल क्लास फैमिलीज़ के स्टूडेंट्स हैं, जो एंट्रेंस पास करके अपने मेरिट से पढ़ने गए हैं।

असली मलाई तो ये खिखियाने वाला इलीट क्लास खा रहा है और निशाने पर कोई और आ रहा है।

इसे मैं अपने उदाहरण से समझाता हूँ। मान लीजिए मैं पीएचडी करना चाहता हूं। अगर मैं रांची के उषा मार्टिन, icfai, यूनिवर्सिटीज से करूँ, या फिर एमिटी जैसे यूनिवर्सिटीज से, तो क्या होगा? मुझे 5-6 लाख रुपये लगेंगे। अब इतने पैसे का इंतजाम कैसे हो? मान लीजिए हो भी गया तो इतने पैसे देने के बाद फैकल्टी की क्वालिटी को लेकर मन संशय में रहेगा। तो फिर में सोचने लगूंगा यार मैं पटना या रांची यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर लूं, तो कम पैसे में पीएचडी हो जाएगा। तो कम पैसे में पीएचडी तो हो जाएगी पर यहां भी फैकल्टी का मसला है। क्वालिटी प्रोफेसर्स।

तो कम पैसे और साथ ही क्वालिटी प्रोफेसर्स एक साथ जहां मिल रहे हैं, वे हैं जादवपुर, JNU, जामिया, अलीगढ़, हैडराबाद यूनिवर्सिटी आदि। और फिलहाल आप देख रहे हैं कि ये सब निशाने पर हैं। सबको बदनाम करने की साजिश चल रही है। अब अगर ये खत्म हो जाएंगे तो आप कहाँ पढ़ेंगे? एमिटी में, जिओ यूनिवर्सिटी में? उषा मार्टिन में?
हैं इतने पैसे?

तो ऐसे में खतरे को भांपते हुए जहां इस निचले तबके को अपने भाई बहनों के साथ मिलकर सरकार की दमन नीति के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, तो वहां आप विद्यार्थियों की पिटाई पर खिखी कर रहे हैं? सोचिए, आप अगर देश मे हर स्टेट में बेहतरीन यूनिवर्सिटी की मांग के लिए नहीं लड़कर खींसे निपोर रहे हैं, तो अपने साथ जो अन्याय किया, वो तो किया ही, अपनी अगली पीढ़ी को भी सस्ती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रहे हैं।

इसलिए इलीट तबके (जिसके पास पैसा है, जो आराम से अपने वातानुकूलित घरों पर बैठ के सोशल मीडिया पर खीखी कर रहा है) के करैक्टर को समझिए और खिखी न कीजिये। सिर्फ मोबाइल हाथ मे आ जाने और फेसबुक फ्रेंड हो जाने से और व्हाट्सप्प ग्रुप बना लेने से आप दोनो वर्ग के हित मिल नहीं जाते।

इसलिए सरकार से क्वालिटी एजुकेशन मांगिये। आखिर सरकार को हम किसलिए चुनते हैं? हमारी हड्डियां तोड़ने के लिए? एजुकेशन का इंतजाम नहीं करेगी, हेल्थ सेक्टर ठीक नहीं करेगी, स्वच्छ पीने का पानी भी नही देगी, तो क्या सिर्फ चंद पूंजीपतियों के एजेंट के रूप में काम करेगी?


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