सुसमन फिल्म (1987): औद्योगीकरण के चलते हथकरघा बुनकरों की दुर्दशा बयां करती फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

1987 में श्याम बेनेगल ने आँध्रप्रदेश के पोचमपल्ली जिले के हथकरघा कारीगरों पर एक फिल्म बनायी थी, फिल्म में हथकरघा कारीगरों  के जीविकोपार्जन पर औद्योगीकरण के प्रभाव को चित्रित किया गया है. फिल्म डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म के convergence का एक बेहतरीन उदाहरण है और उभरते हुए फिल्मकारों के लिए फिल्म मेकिंग में शानदार लेसन भी.

फिल्म की शुरुआत भारत के विभिन्न क्षेत्रों की नामी साड़ियों के जिक्र, उनके texture, उनके फील पर फैशन डिज़ाइनर मंदिरा ( नीना गुप्ता) की कमेंटरी से होती है. पेरिस में साड़ियों का एक्जीबिशन लगने वाला है और देश के अन्य हिस्सों की साड़ियों के साथ साथ मंदिरा को पोचमपल्ली की नामी इकत साड़ी भी एक्जीबिशन के लिए चाहिए. पोचमपल्ली में रहने वाला रामुलु ( ओमपुरी) एक नामी हथकरघा कारीगर है. रामुलु के परिवार में उसकी पत्नी गौरम्मा ( शबाना आज़मी), एक बेटा और एक बेटी चिन्ना ( पल्लवी जोशी) हैं. उसके साथ ही उसका छोटा भाई लछमैया ( अन्नू कपूर) और उसकी पत्नी जानकी ( ईला अरुण) भी रहते हैं.

रामुलु एक बेहद कुशल हथकरघा बुनकर है, और इकत साडी बनाने में पुरे भारत में उसका जोर नहीं है. पर रामुलु को अपने काम का पर्याप्त मुआवज़ा नहीं मिलता. गांव में एक कोआपरेटिव है, पर कोआपरेटिव को सेक्रेटरी वेंकटेश ( हरीश पटेल) ने कमजोर कर रखा है. वेंकटेश से पहले नरसिम्हा ( कुलभूषण खरबंदा) इस कोआपरेटिव का सेक्रेटरी हुआ करता था, अब वो इकत साड़ियों का आर्डर बाजार से उठाता है और रामुलु जैसे कई कारीगर उसके लिए काम करते हैं. सरकार द्वारा पोषित कोआपरेटिव ठप्प पड़ रही है.
पर रामुलु को नरसिम्हा जैसे मिडिल मैन (जो कि रामुलु का रिश्तेदार भी है ) काम का उचित मुआवज़ा नहीं देते और लाभ का अधिकाँश हिस्सा अपनी जेब में रख लेते हैं. ऐसे में रामुलु इकत साड़ियों का देश भर में सबसे बेहतरीन हथकरघा कारीगर होने के बावजूद आर्थिक संकटों में फंसा रहता है. आर्थिक दिक्कतों का असर घर की शांति पर भी पड़ता है. छोटा भाई लछमैया अपनी पत्नी जानकी को पीटता रहता है. उसका एक दूसरे हैंडलूम वीवर गुंडैया ( पंकज कपूर) की पत्नी येलम्मा ( अनीता कंवर) के साथ सम्बन्ध है.

बेनेगल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में एक “सूरज का सातवां घोड़ा” (1992)

इस बात को लेकर भी जानकी के साथ लछमैया के झगडे आये दिन होते रहते हैं.
एक दिन नरसिम्हा मंदिरा और उसके बॉयफ्रेंड मकसूम को लेकर रामुलु के घर आता है. एक बार फिर ये आर्डर कोआपरेटिव को न मिलकर नरसिम्हा को मिल गया है. एक साड़ी बन रही है लूप पर लगी हुई है. मंदिरा साड़ी को निहार रही है और रामुलु की कला की तारीफ कर रही है. आँगन से लछमैया और जानकी के झगडे की आवाज आ रही है. मंदिरा इससे बेफिक्र साड़ी को निहार रही है. मकसूम कहता है, ” औरत को पीटना यहाँ का नेशनल स्पोर्ट हो गया है.”

रामुलु को पेरिस एक्जीबिशन के लिए दो साड़ियां बनाने का काम मिल गया है. लछमैया रामुलु को काम के लिए एडवांस मांगने को कहता है, साथ ही अच्छे दाम भी. पर रामुलु न नरसिम्हा को कुछ बोलता है, न मंदिरा को. मीटिंग से घर लौटते समय लछमैया रामुलु को कहता है, ” अम्मा से डायरेक्ट मांगते तो मिल भी जाता.” रामुलु चिंतित है, ” बड़ा काम है ! कैसे पूरा करूंगा इस लकड़ी के ढांचे पर? ये करघा नहीं, जेल है मेरा. इसमें बंद करके डाल दिए हमकू।” रामुलु के अंदर गुस्सा है, नरसिम्हा खून चूसता है, पैसा भी नहीं देता.” उसने सोच लिया है उसका बेटा ये काम नहीं करेगा. पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनेगा.
गौरम्मा अपनी बेटी चिन्ना की शादी के जतन में लगी हुई है.
रामुलु अपने काम में लग जाता है. हथकरघा चलाते हुए ध्यानमग्न रामुलु और बैकग्राउंड से पंडित जसराज की मधुर आवाज में कबीर का गान चल रहा है, ” झीनी झीनी बीने चदरिया.”

देवदासी प्रथा के खिलाफ संघर्ष की दास्तान फिल्म “गिद्ध” (1984)

इस बीच गांव से कई हथकरघा कारीगर रोजगार की तलाश में भिवंडी चले गए हैं. पार्वतम्मा का एक बेटा नागेश्वर उर्फ़ नागुलु ( रवि झांकल) भिवंडी में पॉवरलूम पर काम करने चला गया है. वो रह रहकर गांव आया करता है अन्य कारीगरों को साथ ले जाने के लिए. नागुलु के साथ ही गौरम्मा अपनी बेटी चिन्ना की शादी की बात चला रही है. पर नागुलु के पास रहने के लिए अभी अपनी खोली नहीं है. पेशगी के तौर पर 5000 रूपये लगेंगे, ये तय होता है कि 2500 रूपये नागुलु जुटाएगा और आधी रकम गौरम्मा देगी. पार्वतम्मा अपने बेटे नागुलु से चिन्ना की शादी का वायदा करती है.
पर्वतम्मा का दूसरा लड़का है भीमा ( के के रैना) जो पढ़ा लिखा है और कोआपरेटिव के क्षरण को लेकर चिंतित है. उसके पिता ने अभी के कोआपरेटिव के प्रेसिडेंट ( मोहन अगाशे) के साथ मिलकर हैंडलूम बुनकरों की कोआपरेटिव शुरू की थी, जो एक तो औद्योगीकरण की चोट से तो दूसरी ओर नरसिम्हा जैसे मिडिल मैन की बिजनस टैक्टिस से पतनशील अवस्था में है. बची खुची कसर वैंकटेश जैसे बेईमान सेक्रेटरी पूरा कर रहे हैं.

वेंकटेश ने नरसिम्हा को मंदिरा का आर्डर पूरा करने के लिए कोआपरेटिव का रेशम दिया है. मंदिरा का बॉयफ्रेंड मकसूम हथकरघा पर साड़ियों के बुनने को लेकर मंदिरा की तरह सेंटीमेंटल नहीं है. बल्कि वो सोचता है कंप्यूटर पर डिज़ाइन बहुत आसानी से तैयार किये जा सकते हैं, पर मंदिरा की राय मकसूम से अलग है. उसका मानना है कि जो फील आदमी के साथ से बुने डिज़ाइन में होता है, वह कंप्यूटर पर तैयार किये गए डिज़ाइन में नहीं.
भीमा गुस्से में है. वेंकटेश को धमकाता है भीमा: “कोआपरेटिव तुम्हारी पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं है. सोसाइटी का आर्डर और अब माल भी? नरसिम्हा को !”

रामुलु का काम बढ़ रहा है. काम की क्वालिटी और प्रोग्रेस से मंदिरा खुश भी है. पर बेटी की शादी के लिए 2500 रूपये जुटाने के लिए कुछ रेशम एक अलग साड़ी बनाने के लिए गौरम्मा रख लेती है. रामुलु इसे अनैतिक मानता है और इसका विरोध करता है, पर गौरम्मा की जिद के आगे झुक जाता है. पर तीसरी साडी की बात सामने आ जाती है. और मंदिरा और नरसिम्हा दोनों रामुलु को बहुत खरी खोटी सुनाते हैं.

काम के लिए लछमैया गुंडैया और उसकी पत्नी को लेकर आया है. गुंडैया को मालुम है कि लछमैया के उसकी पत्नी येलम्मा के साथ शारीरिक संबंध हैं. पर वो इसे अनदेखा करता है, पर एक बार येलम्मा पर चोरी का आरोप लगता है तो फिर गुंडैया और अपमान नहीं सह पाता. वह और येलम्मा नागुलु के साथ भिवंडी चले जाते हैं. नागुलु के साथ उसकी नयी नवेली पत्नी चिन्ना भी है. खोली के लिए पैसे का इंतजाम नहीं हो सका, पर पार्वतम्मा अपने बेटे के साथ चिन्ना की शादी के वचन से पीछे नहीं हटी.

भीमा का फोकस कोआपरेटिव सोसाइटी को ठीक से चलाना है. वह कच्चे माल से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन, मार्किट, प्रॉफिट हर एंगल पर गांव के बुनकरों से बात कर रहा है.

औरत की खरीद बिक्री की सच्ची घटना पर आधारित फिल्म “कमला”(1984)

इधर चोरी के आरोप से आहत रामुलु ने काम छोड़ दिया है. एकदम खामोश रहता है. एक यादगार दृश्य में रामुलु जब नशे की हालत में किचेन से जलती लकड़ी लेकर आता है, और हैंडलूम में आग लगा देना चाहता है, तो गौरम्मा उसे ऐन मौके पर रोकती है. अपमानित रामुलु अपनी पत्नी की बाहों में फूट फूट कर रोने लगता है.
रामुलु का काम में जी नहीं लग रहा है. गौरम्मा ने काम संभाल रखा है पर मंदिरा काम की क्वालिटी से संतुष्ट नहीं. वो गौरम्मा को कहती है कि रामुलु को समझा बुझाकर काम पर वापस लगाए. एक मार्मिक दृश्य में गौरम्मा हैंडलूम चलाते हुए रामुलु की ओर देखती है, पर रामुलु मुंह फेरकर लेट जाता है. हैंडलूम चलाते चलाते निराशा से टूटकर गौरम्मा रोने लगती है. जब लछमैया ने गुंडैया की पिटाई की और फिर पत्नी को पीटा तो रामुलु ने उसे घर से निकाल दिया. लछमैया हैदराबाद चला जाता है.
मंदिरा इन नए डेवलपमेंट्स से परेशां है. एक्जीबिशन का समय नज़दीक आता जा रहा है. मंदिरा मकसूम को समझाती है, “ये कोई कारीगर नहीं कि एक को हटा कर दूसरे को रख लें. ये कलाकार हैं.” बेटी की शादी की तैयारी के नाम पैसे जुटाने के नाम पर गौरम्मा फिर से रामुलु को तैयार करती है.

इधर बीच बीच में नरसिम्हा भी कभी रेशम के दाम बढ़ने के नाम पर, तो कभी दूसरे कारीगर को रखकर काम करवाने के नाम पर मंदिरा से अधिक पैसे निकलवाने की चेष्टा में लगा रहता है. पर ये फायदा सिर्फ नरसिम्हा की जेब में जाना है. रामुलु या उसके साथ काम कर रहे दूसरे बुनकर को कुछ फायदा नहीं होने वाला है.

भीमा ने कोआपरेटिव सोसाइटी के सेक्रेटरी वेंकटेश के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. जिसका परिणाम ये होता है कि वेंकटेश को इस्तीफा देना पड़ता है और अब नया सेक्रेटरी बनने वाला है भीमा. उधर भिवंडी से चिन्ना की चिट्ठी आती रहती है. अपनी खोली नहीं है, इसके चलते उन्हें एक ही खोली में तीन अन्य लोगों के साथ रहना पड़ता है. मशीन पर काम करते हुए, पॉवरलूम के शोर से एडजस्ट करते हुए वे भी धीरे धीरे मशीन होते जा रहे हैं. काम में आनंद अब पुराने दिनों की बात है. अब बस एक ही मकसद है, किसी तरह पैसा कमाना और जीवन बसर करना. कलाकार अब कारीगर बन गए हैं. वे अपनी स्वायत्तता खो चुके हैं. भिवंडी में चॉल में मज़दूर नेता मज़दूरों को बेहतर वर्किंग कंडीशंस के लिए, बेहतर मज़दूरी के लिए एकजुट करने में लगे हैं.

इस दमघोटू परिस्थिति में चिन्ना ज्यादा दिन नहीं रह पाती. वो एक दिन ट्रेन पकड़कर गांव लौट आती है, अकेली. रामुलु बहुत नाराज होता है. उसे बहुत भला बुरा कहता है. उसे चिन्ना की शादी के लिए अपना सारा अपमान, सारे कष्ट याद आते हैं. चिन्ना अपनी सास के यहाँ रहने लगती है. एक दिन भिवंडी में दंगा भड़क उठता है. गुंडैया और उसकी पत्नी जान बचाकर गांव भाग आते हैं. पर चिन्ना के पति नागुलु की कोई खबर नहीं. गांव में सब बेचैन हो उठते हैं.

इस बीच लछमैया ने हैदराबाद में साड़ियों का आर्डर उठाना शुरू कर दिया है और ज्यादा प्रॉफिट मार्जिन कमाने के लिए कोआपरेटिव की साड़ियों को मिडलमैन के हाथों बेचने की तरकीब भिड़ाने लगा है. कोआपरेटिव की साड़ियों पर 20 प्रतिशत की छूट सरकार की तरफ से है, ताकि ग्राहक अधिक से अधिक मात्रा में इन साड़ियों का इस्तेमाल कर सकें. पर लछमैया इस रिबेट का इस्तेमाल दुकानदारों के बिजनस को बढ़ाने में लगाने में जुट गया है.

तमाम दिक्कतों के बीच आखिर रामुलु ने आर्डर पूरा कर दिया है. इस बीच अच्छी खबर ये आ गयी है कि नागुलु भिवंडी दंगे की भेंट नहीं चढ़ा बल्कि जीवित है.

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गांव वाले मंदिरा और रामुलु का सम्मान करते हैं. रामुलु मंदिरा के साथ पेरिस जा रहा है. लछमैया अब नरसिम्हा की जगह लेने की जुगत भिड़ा रहा है. मंदिरा को वो अपना विजिटिंग कार्ड देता है और कहता है, अब से रामुलु के काम के लिए उससे संपर्क किया जाए.
पेरिस में एक फ़्रांसिसी पत्रकार रामुलु से पूछता है मशीनीकरण की चपेट में आने से कब तक हथकरघा बचेगा? कब तक हथकरघा चला कर रामुलु जैसे लोग अपना स्वतंत्र वजूद बचाकर रख पाएंगे?
रामुलु की बातों का मंदिरा अंग्रेजी में अनुवाद करती है: जिंदगी ढंग से कट जाए तो फिर मशीन की ओर क्यों जाएँ? हाथ से काम करने में जो सुख मिलता है, वो मशीन से कहाँ? हैंडलूम कम से कम एक niche मार्किट की जरुरत को तो जरूर पूरा कर सकता है.
अंतिम दृश्य में मंदिरा कहती है और यही फिल्म का सन्देश भी है कि हमलोगों को रामुलु जैसे क्रिएटिव हथकरघा कलाकारों के लिए स्पेस बनाकर रखना चाहिए, ताकि औद्योगीकरण के दौर में भी रामुलु जैसे बुनकर काम करते रहें और काम का उचित मुआवज़ा के साथ साथ रचनात्मक संतुष्टि भी पाते रहें.

फिल्म डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म मेकिंग कला का अद्भुत मिश्रण है:

फिल्म डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म मेकिंग कला का अद्भुत मिश्रण है, जो श्याम बेनेगल जैसे टैलेंटेड फिल्मकार के ही बस की बात है. फिल्म में शमा जैदी के लोकल डायलेक्ट मिश्रित डायलाग किरदारों को authenticity प्रदान करते हैं. फिल्म न सिर्फ हथकरघा बुनकरों पर औद्योगीकरण के दुष्परिणाम का अध्ययन करती है, बल्कि राह भी खोजने का प्रयास करती है. फिल्म के अंत में एक रोचक डायलाग है. रामुलु पेरिस जाने वाला है, उसकी बेटी चिन्ना उससे पोलिस्टर की साड़ी लाने की मांग करती है.
फिल्म में लछमैया जहाँ शुरू में नरसिम्हा के शोषणकारी तरीकों का विरोध करता है और अपने और रामुलु के लिए उचित मुआवज़े की मांग करता दीखता है, पर वो भी नरसिम्हा की राह पर ही चलता नज़र आता है.
फिल्म में दो गाने बेहद सुन्दर बन पड़े हैं जो अपनी रचनात्मक सुंदरता के साथ फिल्म की कहानी को भी समृद्ध करते हैं. पहला गाना पंडित जसराज की आवाज में और दुसरा गाना ” चरखा चले” ईला अरुण की आवाज में है. इन दोनों गानों के लिए संगीतकार वनराज भाटिया को पूरा श्रेय मिलना चाहिए. फिल्म की जान हैं ओमपुरी और शबाना आज़मी. और इन दोनों के साथ साथ अन्नू कपूर ने भी लछमैया के किरदार को जीवित कर दिया है. पंकज कपूर गुंडैया के छोटे से रोल में यादगार रहे हैं. फिल्म में कलाकारों का सशक्त अभिनय सुसमन का एक प्लस पॉइंट है.
फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है. फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए.

#susman film


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