शब्दों के जादूगर जावेद अख्तर

नवीन शर्मा

जावेद अख्तर वैसे तो खुद ही कहते हैं कि हमारे खानदान में बेटे को नालायक समझने की परंपरा रही है उनके वालिद मशहूर शायर जानिसार अख्तर उन्हें नालायक ही समझते रहे क्योंकि उनके जिंदा रहने के अधिकतर वर्षों में वे संघर्ष और नाकामी के दौर से गुजर रहे थे। अपने पिता की मौत के महज तीन साल पहले जावेद को सफलता और पहचान मिलनी शुरू हुई थी। इस तरह वे खुशकिस्मत थे कि पिता के रहते नाकामी का कलंक मिटा पाए और काबिल बेटा बन कर दिखा पाए।

पिता की नज्म पर जादू नाम रखा गया
जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। उनके पिता जानिसार अख्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और माता सफिया अख्तर मशहूर उर्दू लेखिका तथा शिक्षिका थीं। उनकी माँ का इंतकाल तब हो गया था जब वे बेहद ही छोटे थे। जावेद का पुकारू नाम जादू है जो उन्हें पिता की नज्म लम्हा लम्हा किसी जादू का फसना होगा से मिला था।

माँ के इंतकाल के बाद वह कुछ दिन अपने नाना-नानी के पास लखनऊ में रहे उसके बाद उन्हें अलीगढ अपने खाला के घर भेज दिया गया। जहाँ के स्कूल में उनकी शुरूआती पढाई हुई। उसके बाद वह वापस भोपाल आ गये, यहाँ आकर उन्होंने अपनी पढाई को पूरा किया। यहां उनके कई साथियों ने उस मुफलिसी के दौर में काफी मदद की थी

दो शादियाँ पहली हनी से दूसरी शबाना से

जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी थीं। जिनसे उन्हें दो बच्चे है फरहान अख्तर और जोया अख्तर उनके दोनों ही बच्चे हिंदी सिनेमा के जाने माने अभिनेता, निर्देशक-निर्माता हैं।
जावेद की हनी ईरानी से पहली मुलाकात ‘सीता और गीता’ के सेट पर हुई थी। शादी के कुछ वर्ष बाद इनके संबंध खराब हुए और दोनों अलग हो गए। इस विवाह के असफल होने पर जावेद खुद को भी दोषी मानते हैं। वे कहते हैं कि मैं बहुत नार्मल इन्सान नहीं था। मैं बहुत ही उल्टी सीधी जिंदगी से निकल कर आया था। जिसमें बहुत कड़वाहटें, नाकामयाबियां, तूफ़ान, हंगामा और तल्खी थी। इसने मेरी पर्सनल जिंदगी में गड़बड़ी पैदा कर दी। हनी भी कम उम्र थीं नातजुर्बेकार थीं। तो यहीं गड़बड़ी हो गई और वो बात बिखर गई।

जावेद अख्तर शुरुआती दिनों में कैफी आजमी के सहायक थे। बाद में उन्हीं की बेटी शबाना आजमी के साथ उन्होंने दूसरी शादी की।

जावेद अख्तर ने अपने करियर की शुरुआत सरहदी लूटेरा की थी। इस फिल्म में सलीम खान ने छोटी सी भूमिका भी अदा की थी। इसके बाद सलीम-जावेद की जोड़ी ने मिलकर हिंदी सिनेमा के लिए कई सुपर-हिट फिल्मो की पटकथाएं लिखी। इन दोनों की जोड़ी को उस दौर में सलीम जावेद की जोड़ी से जाना जाता था। इन दोनों की जोड़ी ने वर्ष 1971-1982 तक करीबन 24 फिल्मों में साथ किया जिनमे सीता और गीता, शोले, हठी मेरा साथी, यादों की बारात, दीवार जैसी फिल्मे शामिल हैं। उनकी 24 फिल्मों में से करीबन 20 फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर ब्लाक-बस्टर हिट साबित हुई थी।

गजब का आत्मविश्वास

ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लमखुल्ला में एक बार का वाक्या बयां किया है। एक बार ऋषि एक होटल में पहुंचे । उसके बार में जावेद अख़्तर शराब पी रहे थे ऋषि को देखा तो उसे बुला कर कहा कि तुम अपनी फिल्म बॉबी के हिट होने पर बहुत खूश हो ना? ऋषि ने हा कहा तो जावेद बोले हमारी लिखी अभी जो फिल्म बन रही है ( वो फिल्म शोले थी) उस.फिल्म ने अगर बॉबी से एक रुपया कम कमाई की तो मैं यह काम छोड़ दूंगा। ऋषि कपूर जावेद अख़्तर का यह आत्मविश्वास देखकर दंग रह गए। जावेद का अनुमान सही साबित हुआ और शोले सुपरहिट रही और कमाई के भी नए रिकॉर्ड बनाए थे। शोले ने सिनेमा हाल में भी पांच साल से अधिक लगातार चलने का भी.रिकॉर्ड बनाया था।

सलीम के साथ जोड़ी टूटी पर कड़वाहट नहीं आई

70 के दशक में सलीम-जावेद ने बॉलीवुड में उन बुलंदियों को छू लिया था कि फिल्म पोस्टरों पर उनका भी नाम लिखा जाने लगा।सलीम-जावेद की जोड़ी 1982 में टूट गई थी। इन दोनों ने कुल 24 फिल्में एक साथ लिखीं, जिनमें से 20 हिट रहीं। जावेद अख्तर को 14 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।इनमें सात बार उन्हें बेस्ट स्क्रिप्ट के लिए और सात बार बेस्ट लिरिक्स के लिए अवॉर्ड से नवाजा गया।। इसके बाद भी जावेद अख्तर ने फिल्मों के लिए संवाद लिखने का काम जारी रखा। सलीम खान के साथ जोड़ी टूटने के बारे में जावेद कहते हैं एक समय ऐसा आया जब हम में डिस्टेंस आ गया। ये कैसे हुआ और किस वजह से हुआ ये तो मेरे ध्यान में ही नहीं है। ये बातें इतनी आहिस्तगी से होतीं हैं कि आपको पता ही नहीं चलता। लेकिन एक दिन मुझे दिखाई दिया कि वो जो हमारा आपस का रिश्ता था वो नहीं रहा। तो इसलिए हम साथ काम नहीं कर सकते थे। लेकिन हमारा किस चीज पर कोई डिफरेंस नहीं हुआ ना नाम पे ना पैसे पर और ना ही दाम पर। लेकिन वो जो पुल हमदोनों को जुड़ता था वो पुल कहीं पर टूट गया जिससे हम एक दूसरे की सोच और एक दूसरे के दिल तक पहुंच सकते थे। सलीम खान से अलग होने के बाद भी जावेद अख्तर उनको पूरा सम्मान और जोड़ी की सफलता का 75 फीसदी क्रेडिट सलीम को ही देते हैं।

सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार
जावेद अख्तर वैसे तो स्क्रिप्ट और डॉयलॉग भी लिखते रहे हैं पर मुझे तो वे गीतकार के रूप में ज्यादा पसंद आते हैं। जावेद को गीतकार के रूप में यश चोपड़ा ने सिलसिला फिल्म में पहली बार मौका दिया था।1981में आई इस फिल्म के लिए पहला गीत उन्होंने देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए लिखा था ये गीत बहुत ही लाजवाब है।

जावेद के गीतों का जादू लोगों पर इस कदर चला कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। उन्हें गीतों के लिए आठ बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 1999 में साहित्य के जगत में जावेद अख्तर के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें पदमश्री से नवाजा गया। 2007 में जावेद अख्तर को पदम भूषण सम्मान से नवाजा गया।

जावेद अख्तर से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें
जावेद अख्तर 4 अक्टूबर 1964 को मुंबई आए थे। उस वक्त उनके पास न खाने तक के पैसे नहीं थे. उन्होंने कई रातें सड़कों पर खुले आसमान के नीचे सोकर बिताईं। बाद में कमाल अमरोही के स्टूडियो में उन्हें ठिकाना मिला।
सलीम खान के साथ जावेद अख्तर की पहली मुलाकात ‘सरहदी लुटेरा’ फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई थीं। इस फिल्म में सलीम खान हीरो थे और जावेद क्लैपर बॉय। बाद में इन दोनों ने मिलकर बॉलीवुड को कई सुपरहिट फिल्में दीं।
सलीम खान और जावेद अख्तर को सलीम-जावेद की जोड़ी बनाने का श्रेय डायरेक्टर एसएम सागर को जाता है। एक बार उन्हें राइटर नहीं मिला था और उन्होंने पहली बार इन दोनों को मौका दिया।
सलीम खान स्टोरी आइडिया देते थे और जावेद अख्तर डायलॉग लिखने में मदद करते थे। जावेद अख्तर उर्दू में ही स्क्रिप्ट लिखते थे, जिसका बाद में हिंदी ट्रांसलेशन किया जाता है।


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