मिर्च मसाला (1987): स्त्री की अस्मिता की वकालत करती एक सशक्त फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

पहली बार अज्ञेय द्वारा ‘आइडेंटिटी’ के लिए हिंदी शब्द ‘अस्मिता’ प्रयुक्त किया गया था. 1987 में केतन मेहता ने गुजरात को बैकग्राउंड में रखते हुए आज़ादी के पूर्व भारत में मिर्च मसाला फैक्ट्री में काम करने वाली महिलाओं के संघर्ष के बहाने स्त्री अस्मिता और उनके सामने उपस्थित या अनुपस्थित choices पर एक पावरफुल फिल्म बनायी.

गुजरात के गांव की कहानी है. सूबेदार ( नसीरुद्दीन शाह) अपने सिपाहियों के साथ गांव में आया है, लगान वसूली के लिए. पहले दृश्य में सूबेदार अपने सिपाहियों के साथ घोड़े पर पानी के श्रोत के किनारे आता है, जहाँ गांव की महिलायें पानी भर रही हैं. सिपाहियों को आता देख गांव की महिलायें डर कर भाग जाती हैं, बस एक महिला सोनबाई ( स्मिता पाटिल) रह जाती है. वो निडरता से कहती है: बापजी सरकार, इस गांव में इस पार आदमी पानी पीते हैं, जानवर उस पार.
आज़ादी से पहले का समय है. डायलाग के माध्यम से समय को स्थापित किया जाता है. गांव में पढ़ाने वाले मास्टर से गांव के लोग पूछते हैं, मास्टरजी, स्वराज क्या चीज है और अगर मिल जाए तो पहचानेंगे कैसे? ये कोई चीज नहीं है और न ही रस्ते पर मिलने वाली चीज है. तो फायदा क्या है? जरुरत क्या है? उसके लिए तुम्हे पढ़ना पड़ेगा.
सोनबाई के पति शंकर की रेलवे में नौकरी लग गयी है. वो शहर चला जाता है. गांव के बाहर सूबेदार अपना कैंप लगाता है. गांव के लोग उसकी सेवा टहल में लग जाते हैं. एक रोचक दृश्य है. सूबेदार आराम फरमा रहा है. वो रिकॉर्ड बजाने कह रहा है. लेकिन रिकॉर्ड गलती से टूट जाता है. वो अपने सेवक को बहुत मारता है. गांव के लोग सहम कर देखते हैं. फिर सूबेदार मुस्कुराते हुए दूसरा रिकॉर्ड लगाता है. गांव वाले मंत्रमुग्ध होकर सुनने लगते हैं, मानो कुछ हुआ ही नहीं हो. गांव का मुखिया मुखी ( सुरेश ओबेरॉय) ग्रामोफ़ोन को छू छू कर देख रहा है, ” सरकार ने पेटी में आवाज कैद की है.” तभी मास्टर एक बच्चे को गोद में उठाये लाता है. सूबेदार के सिपाहियों के घोड़ों के पैर तले बच्चा आ गया था. पर सूबेदार शिकायत पर गौर फरमाने के बजाय हँसता है, ” अरे स्वराजी हो ! घोड़ों की शिकायत करता है? अरे, अकल आदमी में होती है कि घोड़ों में?

गांव में नृत्य प्रोग्राम के दौरान सूबेदार की नज़र सोनबाई पर नज़र पड़ती है. वो उसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए बेचैन हो उठता है. पर उस रात सोनबाई की जगह लखबी ( रत्ना पाठक) को पहुंचा दिया जाता है. सूबेदार उस पर नज़र डालते हुए कहता है, “अच्छा सोनबाई नहीं तू सही. वो आज नहीं कल सही.” लखबी हैरत से जमींदार के टेंट की सुख सुविधा को देख रही है. रिकॉर्ड बज रहा है, “काहे मारे नज़रिया, सांवरिया !” और सूबेदार लखबी के साथ चुहलबाज़ी कर रहा है.

गांव में एक मिर्च मसाले की फैक्ट्री है, जहाँ गांव की महिलाएं काम करती हैं. गांव इस साल सूखे की चपेट में है, मुखी सूबेदार से रिक्वेस्ट करता है कि लगान माफ़ कर दिया जाए, पर सूबेदार को इसमें कोई रूचि नहीं है, ” घोड़ा घास से दोस्ती करेगा, तो खायेगा क्या?”

गांव की विभिन्न वर्गों की महिलाओं का अपना संघर्ष है. सिर्फ सोनबाई का नहीं, बल्कि मुखी की पत्नी सरस्वती ( दीप्ति नवल)का, और साथ ही राधा ( सुप्रिया पाठक) का भी. कई स्तरों पर संघर्ष है. जहाँ सोनबाई सूबेदार के साथ अपनी इज़्ज़त का सौदा करने को तैयार नहीं, वहीँ सरस्वती अपमानित महसूस करती है और मुखी के दूसरी औरतों के साथ सम्बन्ध रखने और रात रात भर घर से बाहर रहने के प्रति रोष व्यक्त करती है, और समाज में व्याप्त मान्यताओं के विपरीत और साथ ही अपने पति की मर्जी के विपरीत अपनी बेटी को पढ़ने के लिए स्कूल में भर्ती करवाती है और इसके लिए घरेलु हिंसा का भी शिकार होती है; वहीँ राधा सामाजिक विषमता की दीवार को लांघ कर मुखी के छोटे भाई (विक्रम गोखले) से प्रेम करती है और शादी करना चाहती है, जिसे मुखी एकदम से नकार देता है.

कुछ रोचक डायलाग के जरिये ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था में भीतर तक पैठ बनाये शोषकों की पहचान की जाती है. सोनबाई बनिए से तेल खरीदती है और जब वो पैसे की मांग करता है, तो कहती है, ” इस गांव में तुम्ही पैसा देते हो, तुम्ही ले लेते हो.” वहीँ एक दृश्य में जब गांव में सूबेदार के अचानक आ जाने से बनिया हड़बड़ा जाता है और उसकी धोती पर काली स्याही गिर जाती है, तो सूबेदार हँसते हुए तंज कसता है, “ये क्या है, खून या पेशाब? खैर जो भी है, तुम्हारी करतूत जैसा ही काला है.” बनिया रिरिया कर सिर्फ इतना ही कह पाता है, ” आपकी दया है सरकार”. एक अन्य दृश्य में गांव वाले गाना सुनते हुए अचरज कर रहे रहे हैं, मुखी कहता है, “अब तो आवाज भी सरकार की गुलाम है.”

एक बार जब सूबेदार सोनबाई को हासिल करने का प्रयास करता है, तो सोनबाई उसे थप्पड़ जड़ देती है. गांव वालों ने सूबेदार को थप्पड़ खाते हुए देख लिया है. सूबेदार अपमान से जल उठा है. वो अपने घुड़सवार सिपाहियों को सोनबाई को जबरदस्ती पकड़ लाने को उसके पीछे भेजता है. वो किसी तरह अपनी इज़्ज़त बचाती हुई मिर्च मसाले की फैक्ट्री में घुस जाती है. काफी लम्बा दृश्य है जिसे बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है. सिपाही दरवाजा पीट रहे हैं, पर फैक्ट्री का बूढ़ा गार्ड अबू मियां ( ओमपुरी) ने फाटक खोलने से इंकार कर दिया है,” मेरे जीते जी कोई सोनबाई का बाल बांका नहीं कर सकता. यहाँ इज़्ज़त आबरू का सौदा नहीं होता.” फैक्ट्री के अंदर महिलाओं में अफरा तफरी मची है.” मुए सूबेदार जी ने तो नाक में दम कर दिया है. अरे इनका बस चले तो हमें खा ही जाएँ.” पर इसी कठिन समय में लखबी सोनबाई से पूछती है, “सच बता कि क्या हुआ? बची थी कि हमें ही बना रही हो !”

सूबेदार सोनबाई को पाने के लिए बेचैन है. अब ये उसके लिए नाक का विषय हो गया है. वो फिलहाल जोर आजमाईश करने के मूड में नहीं है. वो बनिए को हाज़िर तलब करता है.
“तुम्हारे मसाले के कारखाने में एक ख़ास गरम मसाला है, जो हमें बेहद पसंद है.”
बनिया समझ नहीं पाता।
सूबेदार खुल कर इस बार कहता है, ” तुम समझे नहीं. तुम्हारे कारखाने में एक औरत काम करती है. एकदम अंगार.”मूंछ पर ताव देते हुए.
बनिया जीवन सेठ सूबेदार के दबाब में झुक जाता है, वो फाटक खुलवाने का प्रयास करता है. पर अबू मियां ईमान का सौदा करने को तैयार नहीं.
“कारखाने की रखवाली मेरा काम है और कारखाने का मतलब सिर्फ सामान नहीं, औरतें भी हैं.”

बात बिगड़ती जा रही है. फाटक टूट भी सकता है. “ये जोश हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा.” फैक्ट्री के अंदर कैद हो चुकी औरतें डर रही हैं. फैक्ट्री में काम करने वाली बूढी औरत रमा बाई ( दीना पाठक) बीते दिन याद कर रही है, जब गांव की औरतों के साथ सिपाहियों ने सामूहिक बलात्कार किया था. लखबी जैसी औरतें भी हैं, जो उसे सोने के झुमके दिखाती है और सोनबाई को कहती है, चली जा सूबेदार के पास. फायदे में रहेगी. पर सोनबाई को अपनी इज़्ज़त प्यारी है. वो किसी भी कीमत पर सूबेदार की वासना पूर्ति का खिलौना बनने को तैयार नहीं.

सूबेदार भी सोनबाई को लेकर ज़िद पर अड़ गया है. सोनबाई के रिजेक्शन से उसके मेल ईगो को ठेस पहुंची है. सूबेदार को न सुनने की आदत नहीं है. मुखी उसे समझाना चाहता है, ” सुना है, सरकार की मर्दानगी रंग पकड़ रही है. कहिए तो दूसरी भिजवा दूँ.” सूबेदार मुखी को साम, दाम दंड, भेद हर तरीके से अपनी मांग के आगे झुकने को मज़बूर करता है. “सोनबाई का अभी मरद भी शहर गया है. पसंद होगी तो रख लेगा. नहीं पसंद होगी, तो तुम रख लेना. औरत खूबसूरत है, कभी तुम्हारी नज़र नहीं गयी उस पर?
मुखी के ना नुकुर करने पर, गांव की इज़्ज़त का हवाला देने पर उसे धमकाता है,” ये है मेरी पल्टन. अगर इसे गांव में छोड़ दूँ तो कहाँ जाएगी तुम्हारे गांव की इज़्ज़त? समझ लो ये भी एक तरह का लगान हो गया.”

मामला बिगड़ता देख गांव की पंचायत बैठती है, जहाँ ये तय किया जाता है, पुरे गांव की भलाई के लिए सोनबाई को सूबेदार को सौंप देना ही बेहतर होगा. मास्टर इस निर्णय का विरोध करता है, और गांव वालों को समझाने की कोशिश करता है, आपने ये कैसे सोच लिया कि एक सोनबाई से उसकी प्यास बुझ जायेगी? मुखी से मुखातिब होते हुए कहता है, “आज उसने सोनबाई माँगा, कल को वो आपकी बीबी मांगेगा.” मुखी मास्टर की जमकर पिटाई करने लगता है.
गांव वाले मुखी के साथ सूबेदार के पास आये हैं. वे सोनबाई को सूबेदार को सौंपने को तैयार हैं, पर साथ ही वायदा चाहते हैं कि आगे से सूबेदार इस तरह की अनैतिक मांग नहीं रखेगा. सूबेदार इस बात के लिए मास्टर की कोड़ों से पिटाई करवाता है.

सूबेदार की अनैतिक मांग के आगे गांव वालों को झुकते देखकर मुखी की पत्नी गांव की महिलाओं को इस अन्याय का प्रतिरोध करने के लिए एकजुट करने का प्रयास करती है. सूबेदार से मिलकर मुखी गांव वालों के साथ गांव वापस आया है. पुरुषों का रास्ता रोक कर महिलाएं सरस्वती के नेतृत्व में थाली पीट रही हैं. जिस गांव में लड़कियां पढ़ नहीं सकतीं, पुरुषों के दूसरी औरतों के सम्बन्ध रखने पर आवाज नहीं उठा सकतीं, वहां खुलेआम महिलाओं का प्रतिरोध पुरुषों के लिए सहनशक्ति से बाहर हो गया है. सारे मर्द अपनी अपनी पत्नियों पर टूट पड़ते हैं. सरस्वती की भी बहुत बुरी तरीके से मुखी पिटाई करता है.

मुखी गांव वालों के साथ मसाले की फैक्ट्री के फाटक पर आया है. मुखी सोनबाई को समझाने का प्रयास कर रहा है, अगर तुम्हारा मरद नहीं रखेगा, तो पूरा गांव मिलकर तुम्हारा ख्याल रखेगा. गांव का पुजारी ( हरीश पटेल) भी आपद धर्म के रूप में सोनबाई को सूबेदार के समक्ष समर्पण करने की सलाह देता है. फैक्ट्री के अंदर कैद बूढी महिला रमा बाई ( दीना पाठक) भी समझाती है, “इज़्ज़त अमीरों का शौक़ है, लड़की. बहुत महँगी पड़ती है.” पर सोनबाई टस से मस नहीं होती है. बूढ़ा गार्ड अबू मियां भी सोनबाई के निर्णय के साथ डट कर खड़ा है.

समझौते के हर प्रयास विफल हो जाते हैं. सूबेदार ने अब बल प्रयोग करने का फैसला ले लिया है. बल प्रयोग करके सिपाही मिर्च मसाले का फाटक तोड़ने में लग जाते हैं. बेहद यादगार दृश्य बन पड़ा है. सूबेदार दस तक गिनती गिन रहा है. अबू मियां अपनी अंतिम नमाज पढ़ रहे हैं. महिलाएं मिर्च के ढेर के पीछे छिप रही हैं. सोनबाई भयाक्रांत हिरणी की मानिंद दुबक रही है, और हाथ में उसने हसिया ले रखा है. फैसले की घड़ी आ गयी है.
अबू मियाँ बन्दूक तानकर फाटक के पीछे खड़े हैं. सूबेदार के सिपाही दरवाजे पर धक्का लगा रहे हैं. अंतिम धक्के से फाटक भड़भड़ा कर गिर जाता है. अबू मियां फायर करते हैं, एक सिपाही उनकी बन्दूक का निशाना बन जाता है. पर अगले ही पल अबू मियां बन्दूक की गोलियों से छलनी कर दिए जाते हैं. अब सोनबाई और सूबेदार के बीच अंतिम बाधा भी गिर चुकी है. सूबेदार विजयी भाव के साथ आगे बढ़ता है.
पर तभी अप्रत्याशित तरीके से महिलाएं सूबेदार पर मिर्च मसाले से हमला कर देती हैं. सूबेदार की आँखों में लाल मिर्च का पाउडर भर गया है. वो दर्द से चिल्ला रहा है. और सोनबाई अपनी जगह पर डटी हुई है, हाथ में हसिया लिए, उसे देखती हुई.

फिल्म इस मुकाम पर आकर ख़त्म हो जाती है. जब गांव के पुरुष सत्ता के दमन से घबरा कर आत्मसमर्पण कर चुके होते हैं, कमजोर समझी जाने वाली महिलाओं ने अन्याय का प्रतिरोध करने का हौसला दिखाया है. साथ ही ये उनके सेक्सुअल राइट्स, अपनी चुआयसेज (choices), अपनी डिग्निटी के लिए उठी आवाज है,और पुरुषवादी सोच को भी खुली चुनौती है.

एक यादगार फिल्म है “मिर्च मसाला” :

फिल्म बेहतरीन बन पड़ी है. स्मिता पाटिल के देहांत के बाद ये फिल्म रिलीज़ हुई थी. फिल्म की कहानी चुन्नीलाल मड़िया ने लिखी है, जबकि इसकी पटकथा केतन मेहता और शफी हकीम ने लिखी. फिल्म के संवाद हृदय लानी और त्रिपुरारी शर्मा ने लिखे. फिल्म की फोटोग्राफी जहांगीर चौधरी ने की. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ने बहुत कम संसाधन में पुरे माहौल को बनाने का प्रयास किया है, जिसमे सिनेमेटोग्राफर सफल रहे हैं. फिल्म की फंडिंग नेशनल फिल्म्स डेवलपमेंट कारपोरेशन ( NFDC ) ने की है.

फिल्म में शानदार अभिनय के लिए सुरेश ओबेरॉय को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का नेशनल अवार्ड मिला. फिल्म में पैरेलेल सिनेमा के दिग्गज कलाकारों का जुटान है. फिल्म को याद किया जाएगा स्मिता पाटिल के सशक्त, सहज अभिनय के लिए. सोनबाई के किरदार को उन्होंने अपने अभिनय से यादगार बना दिया और साथ ही फिल्म को याद किया जाएगा नसीर के विशाल एक्टिंग रेंज के लिए. फिल्म में नसीर एक झंझावात की तरह उपस्थित हैं. जहाँ स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल, सुरेश ओबेरॉय और ओमपुरी ने मिनिमल एक्टिंग के जरिये किरदारों को निभाया है, वहीँ नसीर ने थिएटर में मिथकीय पात्रों को जीते हुए ड्रामेटिक अभिनय कला का उपयोग करते हुए सूबेदार के किरदार को उसकी पूरी सनक, रंगीनियों के साथ जीवित किया है. चरित्र चित्रण के इस प्रयोग के चलते वे फिल्म में छा गए हैं.
फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है. केतन मेहता की इस यादगार फिल्म को इसके कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के रसास्वादन के लिए कम से कम दो बार जरूर देखना चाहिए.


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