दिशा (1990): रोजगार की तलाश में पलायन करते मज़दूरों के दर्द को उभारती बेहतरीन फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

1990 में रिलीज़ हुई फिल्म ” दिशा” बम्बई के हिंटरलैंड ( hinterland) से रोजगार की तलाश में बम्बई महानगर में पलायन किये मज़दूरों की प्रभावशाली दास्ताँ है. महाराष्ट्र का एक गांव है बकरी गांव. यहाँ परसुराम ( ओमपुरी) रहता है. परसुराम पिछले 12 सालों से पानी की तलाश में अपनी बंजर जमीन पर कुआँ खोदने में लगा है. उसके बारे में दूर दूर के गांव में चर्चा है. लोग उसे पागल परसुराम कहकर पुकारने लगे हैं. उसकी पत्नी है हंसा ( शबाना आज़मी), जो घड़ी घड़ी उसे कुएं के लिए पागलपन के लिए उलाहना देती रहती है. उनके चार बच्चे हैं, जिनके नाम हैं- शर्मीला, अमिताभ, जीतेन्द्र और कद्दू. कद्दू इसलिए कि जब सबसे छोटे बच्चे का जन्म हुआ था, तो उस समय तक दोनों ऊब चुके थे. परसुराम का छोटा भाई है सोमा ( रघुबीर यादव). सोमा का दोस्त है बसंत ( नाना पाटेकर). सोमा और बसंत दोनों खेतिहर मज़दूर हैं. पर रोज रोज काम नहीं मिलता. बसंत अपने बूढ़े पिता दशरथ मांदरे के साथ रहता है. बसंत की शादी का रिश्ता पड़ोस के चिमगांव से आया है. उसके पिता उसकी शादी में धूम धाम करने के लिए अपने मवेशियों को गिरवी रखकर 10 ,000 रूपये साहूकार से कर्जा ले लेते हैं.

सैय्याँ मुझे बम्बई शहर ले जाना… ओ मेरे बालमा, बेईमान साजना. बसंत की शादी में लावणी का आयोजन होता है. बुड्ढे जोश में आकर पगड़ी उछाल रहे हैं, और परसु ऊंघ रहा है. उसके दिल दिमाग पर सिर्फ और सिर्फ कुआं छाया हुआ है. कुआं जिसे हंसा अपनी सौत कहती है. और इस पर रह रह कर परसु एक ही जवाब देता है, हाहाहा अच्छा है तेरी सौत बाँझ है, नहीं तो अब तक इतनी ही बड़ी एक और पल्टन तैयार हो जाती !
गांव में खेती नहीं, काम नहीं. गांव के काफी लोग बम्बई मज़दूरी की तलाश में पलायन कर गए हैं. सोमा ने भी मायानगरी बम्बई जाकर अपनी किस्मत आजमाने का फैसला कर लिया है.
सोमा बम्बई आ गया है. यहाँ जीवन ऐसा नहीं, जैसा सोमा सोच कर आया था. एक कमरे में 40 लोग एक साथ रहते हैं और शिफ्ट में सोते हैं. सोमा को भी कमरे में जगह मिल गयी है, क्योंकि जिसकी जगह खाली हुई, उसकी मौत कुछ दिन पहले हो गयी. पिछले 40 सालों से कॉटन मिल में काम कर रहा था. फेफड़े में रुई भर गयी. जीवन से मुक्त हो गया.
आते ही सोमा को काम नहीं मिलता. उसे पहले काम सीखना है. 6 महीने काम सीखने के बाद ही उसे नौकरी मिल पाएगी. 1000 रूपये कर्जा लेना पड़ा है सोमा को. घर से 20 रूपये ही लेकर चला था. 300 रूपये तो उसे लर्नर पास बनवाने में ही देना पड़ गया है. सोमा सोच में पड़ गया है, काम मिला भी नहीं, उलटे 1000 रूपये का कर्जा भी चढ़ गया है.

सोमा ने घर पर 100 रूपये मनी आर्डर भेजा है. परसु, हंसा, बच्चे सब खुश हैं. आश्चर्यचकित भी. हफ्ते भर पहले ही तो बम्बई गया था सोमा. बम्बई को ऐसे ही मायानगरी नहीं कहते ! पैसे बरसाती है !!
सोमा काम सीखने लगा है. मशीने बीमार पड़ी हैं. बड़े स्ट्राइक के बाद कई मिलें बंद हो गयी हैं. नयी मशीनों में मज़दूर कम लगने लगे हैं. पहले चार मशीन पर एक मज़दूर होता था, अब सोलह मशीनों पर एक मज़दूर होने लगे हैं. ऑटोमेटेड मशीनों ने मज़दूरों की मांग को घटा दिया है.
इधर गांव में बसंत की मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं. बसंत गांव नहीं छोड़ना चाहता है. पर कर्जा चुकाने के लिए मवेशियों को साहूकार के हाथो बेचना पड़ गया. खेती में काम नहीं है. ऐसे में न चाहते हुए भी एक दिन बसंत अपनी नयी नवेली पत्नी फूलवन्ती ( राजश्री सावंत) और बूढ़े बीमार बाप को छोड़कर बम्बई आ जाता है. उसे भी सोमा की खोली में एक छोटा सा कोना मिल जाता है. कारखाने में मशीनों को चलते हुए देखकर सोमा कहता है: आदमी और मशीन का कितना बेजोड़ तालमेल है ! बसंत को ये बड़ा डरावना सा लगता है. पूछने पर कि सोमा, कैसे 8 घंटे काम कर लेते हो? ये आवाज तुम्हे पागल नहीं बना देती? सोमा कहता है, कौन सी आवाज? ये वही सोमा है, जिसे शुरुआत में ये आवाज बेचैन कर देनेवाली लगती थी. सोमा अब मंझे हुए मिल मज़दूर की तरह काम करने लगा है.
चिमगांव में नया बीड़ी फैक्ट्री खुली है. घर चलाने के लिए हंसा और फूलवन्ती भी वहां जाने लगी हैं. हालाँकि फूलवन्ती को बीड़ी बनाने का कोई अनुभव नहीं है, पर फैक्ट्री के मुंशी ( अच्युत पोतदार) ने उसे काम पर रख लिया है. मुंशी जवान फूलवन्ती पर विशेष कृपादृष्टि रखने लगा है.

बसंत को लर्नर पास मिल गया है. सोमा को भी पहली तनख्वाह मिली है. सोमा बसंत को चावल और मटन की पार्टी देता है. बसंत सोमा को वापस गांव चलने की बात पर सोचने की राय देता है. सोमा कहता है, ये मायानगरी है, जो यहाँ आता है, फिर लौट के नहीं जा पाटा. शेर की गुफा में जानवरों के पंजों के निशाँ अंदर की ओर जाते हैं, बाहर नहीं. बस ऐसी है बम्बई नगरी- शेर की गुफा.
पर बसंत बम्बई से प्रभावित नहीं है. उसकी नज़रों में यहाँ धूल, धुआं और घुटन है. फेफड़े में रुई भरते रहो, किसी खैराती अस्पताल में मर जाएंगे. लोग कहेंगे, छूट गया. सोमा, ऐसा रास्ता ढूंढो, जो हमें वापस ले जाए.
सोमा हँसते हुए कहता है, ” सोचूंगा यार. अभी खाली पेट सोचना जरा मुश्किल है.” दोनों दोस्त फिर से मटन भात में भिड़ जाते हैं.

फिल्म में परसु और उसकी पत्नी हंसा के बीच प्रेम भरे दृश्य भी हैं. एक रात परसु रोमांस के मूड में है. एक रूम में पुरे परिवार के रहने से पैदा सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन उसके चेहरे पर झलक रहा है. फरमान सुनाता है, आज बच्चे बाहर सोयेंगे, अमित भैया कहानी सुनाएंगे.” पर जब घर के काम निपटा कर हंसा उसके पास आती है, तो दिन भर का थका परसु खर्राटे लेने लगता है.
कुछ दिनों के लिए बसंत की पत्नी फूलवन्ती बम्बई आयी है. एक खोली का इंतजाम हुआ है. नव विवाहित दम्पत्ति दुनिया को भूल एक दूसरे में खो जाते हैं. पर एक रात जब बसंत और फूलवन्ती प्रेम में डूबे हुए थे, तभी खोली के मालिक की बहन अपने परिवार के साथ अचानक आ धमकती है. रात में दोनों को खोली खाली करनी पड़ती है. उस रात फूलवन्ती को उन्ही 40 पुरुषों के बीच रात गुजारनी पड़ती है. अगली सुबह फूलवन्ती गांव निकल जाती है. अपनी लाचारी पर बसंत फूट फूट कर रोता है. बसंत गांव लौटने के लिए और दृढ़प्रतिज्ञ हो चला है. वो फैक्ट्री के काम के अलावे कुलीगिरी, सामान लोडिंग करने का काम करने लगा है. उसे जल्द से जल्द पैसे जोड़कर गांव जाना है, जहाँ वह अपने तरह के युवकों को जुटाकर सहकारी तौर पर कुछ करने का सपना देखता है. सोमा को चिंता है कि इस तरह बसंत की तबियत न कहीं बिगड़ जाए !

एक दिन अचानक गांव से बापू की चिट्ठी बसंत को मिलती है. बापू उसे तुरंत गांव बुला रहे हैं. बसंत समझ नहीं पाता, पर वो गांव लौटता है. घर की आर्थिक स्थिति उसे बेहतर नज़र आती है. रेडियो बज रहा है. रेडियो सुनते हुए बापू से कहता है, लगता है, आपकी बहु अच्छा कमाने लगी है. उस शाम जब बसंत और उसके बापू खाना खाने बैठे हैं, तो अचानक एक पुरुष स्वर उनके कान में पड़ता है, ” अरे फूलवन्ती बाई, भूखे मुसाफिर को खाना मिलेगा कि नहीं?” बसंत को देखकर इस पुरुष स्वर के मालिक मुंशी के कदम ठिठक जाते हैं. वो घर में तीन दिन का राशन रखकर उलटे पांव लौट जाता है. भोजन का कौर बसंत के हाथ में ही रह जाता है. वो सब समझ जाता है.
बसंत बम्बई लौट आता है. बसंत को बम्बई लौटा देखकर सोमा हैरत में पड़ जाता है. बसंत सोमा से कहता है, “सोमा, मैं वापस आ गया हूँ. हमेशा के लिए. अब मैं यही रहूँगा. मुझे भी इस मायानगरी ने अपने जाल में फंसा ही लिया है. दोनों दोस्त साथ रहेंगे, खाएंगे, पिएंगे, मौज करेंगे.”
पर सोमा अपना फैसला सुनाता है, मैं वापस गांव जा रहा हूँ. परसु भैया के कुएं में पानी निकल आया है. हम खेती करेंगे, तुम्हारा ही तो सपना था सहकारी खेती का.”

अंतिम दृश्य में सोमा बस में बैठा गांव जा रहा है. और बसंत… बसंत बम्बई में ही रह गया है, मिल मज़दूर के रूप में. फेफड़ों में रुई भरता. उसी बम्बई शहर में, जिसे वो छोड़ना चाहता था, पर शहर ने उसका सब छीन कर उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया है.

सई परांजपे की फिल्म पलायन के दर्द को उभारने में सफल रहती है:

सई परांजपे एक बेहद क्षमतावान फिल्म निर्देशिका हैं. उन्होंने अपने करियर में स्पर्श, कथा, चश्मेबद्दूर, साज जैसी बेहतरीन फ़िल्में बनायी हैं. पिछली फिल्मों की तरह ये फिल्म भी अपने विषय वस्तु के साथ पूरा न्याय करती है. अंतिम दृश्य में मिल में काम करता बसंत दर्शकों के दिलों में एक हुक पैदा करता है. एक शहर रोजगार की तलाश में एक मज़दूर को न केवल उसकी जड़ों से उखाड़ देता है, बल्कि उसके सामाजिक, पारिवारिक ताने बाने को भी छिन्न भिन्न कर देता है, फिल्म ने इस विषय को बेहद गंभीरता से चित्रित किया है. फिल्म में परसु की भूमिका में ओमपुरी, और हंसा की भूमिका में शबाना आज़मी पूरी तरह जमे हैं. लालटेन की रौशनी मद्धिम करती हंसा के चेहरे पर परसु के साथ यौन सम्बन्ध बनाने का सेक्सुअल टेंशन जिस तरह शबाना आज़मी ने दिखाया है, वो अपने आप में अभिनय को पूरी बारीकियों से समझने की उनकी काबिलियत का प्रतीक है. चाह कर नहीं, बल्कि परिस्थियों के आगे घुटने टेक कर मुंशी के साथ संबंधों में आगे बढ़ जाने वाली युवती की भूमिका में राजश्री सावंत न्याय करती नज़र आती हैं. नाना पाटेकर ने आदर्शों को दरकिनार करके यथार्थवादी और निराश में टूटकर बिखड़ गए युवक बसंत की भूमिका में जान डाल दी है. पर फिर भी इस फिल्म में एक किरदार जो पूरी सहजता के साथ उभर कर सामने आता है, वो है सोमा का किरदार. सोमा, जो ज्यादा नहीं सोचता, सोमा, जो एक ढंग की जिंदगी जीने के लिए परिस्थितियों को सहज भाव से स्वीकार करता है, शहर में रहना है, कितने दिन रहना है, नहीं रहना है, इससे परे है जो, पर जिसे अपने घर वालों की याद भी सताती रहती है, हर रंग में सोमा को यादगार किरदार बना दिया है रघुबीर यादव ने. NFDC द्वारा वित्त पोषित इस फिल्म में दो बेहतरीन गाने हैं. एक लावणी और दूसरी बम्बई के रंग ढंग का जिक्र करता गाना. फिल्म के निर्देशन के साथ साथ फिल्म का स्क्रीनप्ले और डायलाग भी सई परांजपे ने लिखा है.

एक बेहतरीन फिल्म है “दिशा”. फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है. फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए.


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