दीक्षा ( 1991): आडम्बरी ब्राह्मणवादी मूल्यों पर चोट करती एक सशक्त फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

1991 में नेशनल फिल्म्स डेवलपमेंट कारपोरेशन (NFDC) और दूरदर्शन के आर्थिक सहयोग से यु आर अनंतमूर्ति के छोटे उपन्यास “घट श्राद्ध” पर एक फिल्म बनी थी,” दीक्षा”. दीक्षा फिल्म अमर कौल की एकमात्र फीचर फिल्म रही, पर बेहद प्रशंसित और साथ ही बेस्ट हिंदी फिल्म का नेशनल अवार्ड हासिल करने वाली भी. इतना ही नहीं, बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर क्रिटिक अवार्ड भी इस फिल्म ने हासिल किया. इस फिल्म को कई अन्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड हासिल हुए. यू आर अनंतमूर्ति के इसी उपन्यास पर इससे पहले 1977 में एक कन्नड़ फिल्म बनी थी, जिसे बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला. यू आर अनंतमूर्ति अपनी लेखनी के माध्यम से ब्राह्मणवाद के आडम्बर, समाज में फैले अंधविश्वासों के खिलाफ उठाते रहे हैं और प्रगतिशील मूल्यों के पक्ष में, सामाजिक न्याय, समता के पक्ष में आवाज बुलंद करते रहे हैं. यही उनकी लेखनी की पहचान है. इस फिल्म में निर्देशक ने आडम्बरयुक्त ब्राह्मणवादी मूल्यों पर कुठाराघात किया है और स्त्री अस्मिता, बदलते समाज के लिए बदलते मूल्यों की जोरदार पैरवी की है.

फिल्म की कहानी:
फिल्म की कहानी दक्षिण भारत के एक गांव में situated है. 1930 का दशक है. ब्रिटिश सरकार का शासन है. नए और पुराने सामाजिक मूल्यों का टकराव चल रहा है. बदलाव की बयार बह रही है. जो दक्षिण भारत के सुदूर गांव में भी पहुँच रही है. गांव जहाँ उडूप पंडित रहते हैं, अपनी विधवा बेटी के साथ. उडूप पंडित वेदों के बहुत बड़े ज्ञाता हैं. और वे दो वेदपाठी शिष्यों को प्राचीन गुरुकुल शैली में शिक्षा दे रहे हैं. अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार प्रसार हो रहा है और वेदों के अध्ययन से नौकरी न मिलने की बात कहकर लोग आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं. पर एक ब्राह्मण है, जिसने अपने पांच बच्चों को जन्म के शीघ्र बाद खोने के बाद भगवान से प्रार्थना की है कि अगर उसे एक और बच्चा हुआ, तो वो उसे ईश्वर की आराधना में लगाएगा और उसे वेदपाठी बनाएगा. 8 वर्षीय नारायण उर्फ़ नन्नी इसी ब्राह्मण का बेटा है. यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ब्राह्मण अपने बेटे नन्नी को उडूप पंडित के पास ले आता है. माँ ने भरे मन से अपने बेटे को गुरु के आश्रम में भेजा है. पिता जब नन्नी को गुरु के आश्रम में छोड़कर चलने को होता है, तो छोटा नन्नी अपने पिता के क़दमों से लिपट कर रोने लगता है. उसे घर की, माँ की याद आ रही है. ऐसे में उसे उडूप पंडित की विधवा बेटी यमुना ( राजश्री सावंत) संभालती है. आश्रम में रह रहे दो और शिष्य, जो उम्र में उससे बड़े हैं, उसे चिढ़ाते रहते हैं, उसे डराते रहते हैं. यमुना उसे अपने पास सुलाने लगती है. यमुना को वह अक्का ( दीदी) मानने लगता है. आश्रम में उडूप पंडित का शिष्य श्रीकर उपाध्याय ( के के रैना) भी वेदपाठी छात्रों को पढ़ाने का काम करता है. वो इसके साथ अँगरेज़ सरकार की चाकरी भी करता है और अपने विचारों में आधुनिक है. नए बदलावों को स्वीकार करने से हिचकता नहीं है.

उडूप पंडित के घर एक अछूत- कोगा ( नाना पाटेकर ) काम करता है. कोगा के माँ बाप नहीं हैं. उसकी एक मौसी है. वह उडूप पंडित के यहाँ शारीरिक श्रम का काम करता है और बदले में उसे और उसकी मौसी को भोजन मिल जाता है. समाज में छुआछूत की प्रथा है. काम ख़त्म करने के बाद वह घर के बाहर भोजन के इन्तजार में बैठा रहता है, जहाँ यमुना या कोई और ब्राह्मण महिला आती है और उसे थोड़ी ऊंचाई से भोजन का डोंगा उसके हाथों पर गिरा देती है.

उसे नन्नी देखता रहता है. एक बार नन्नी ने एक लड्डू उसके दोने में गिरा दिया. कोगा लड्डू पाकर बेहद खुश होता है और अपनी मौसी को खिलाने के लिए लड्डू ले जाता है. मौसी घर पर इन्तजार कर रही होती है कि आज गांव में एक जानवर मरा है, कोगा उसका मांस लेकर आएगा. पर कोगा उडूप पंडित के यहाँ रहते हुए समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवासन के “संस्कृतिकरण” की प्रक्रिया से गुजर रहा है और वो ब्राह्मणों के तौर तरीकों से प्रभावित हो रहा है. वो मौसी को समझाता है, मरे जानवर का मांस नहीं खाना. वो अपने समुदाय के युवकों के साथ बैठकर शराब नहीं पीता। जब उडूप पंडित अपने छात्रों को वेद का अभ्यास करा रहे होते हैं, तो वो आसपास ही रहता है, वो भी मन ही मन वेद मन्त्रों को बुदबुदाता रहता है और उन्हें कंठस्थ करने का प्रयास करता रहता है.

गांव में सारे लोग उडूप पंडित के प्रशंसक ही नहीं हैं, बल्कि कई ब्राह्मण उनके विरोधी हैं, जिनमे सबसे प्रमुख है, मंजुनाथ ( विजय कश्यप). विजय कश्यप के नेतृत्व में परम्परावादी ब्राह्मणों को शिकायत है कि प्राचीन ग्रंथों में सुझाये गए मार्ग पर उडूप पंडित क्यों नहीं चलते? उन्होंने बेटी के वैधव्य के बाद उसका सिर क्यों नहीं मुंडवा दिया? पर उडूप पंडित का तर्क है कि रीति रिवाज किसी विशेष काल खंड की सामाजिक जरूरतों के हिसाब से बनाये गए हैं, ऐसे में समय समय पर उनका पुनर्मूल्यांकन होते रहना चाहिए. और जो सार्थक न रह जाएँ, उन्हें तज देने में बुराई नहीं. इसी वजह से उडूप पंडित ने कोगा की मौसी के देहांत के पश्चात कोगा की प्रार्थना पर मौसी के मुंह में तुलसी दल और गंगा जल दिया था और वेद मन्त्र का पाठ कर दिया. उन्होंने ये मृत आत्मा के स्वर्ग में जाने को सुनिश्चित करने के लिए नहीं, बल्कि कोगा को मानसिक संताप से निकालने के लिए किया. जाहिर है, पिछली बार की तरह रूढ़िवादी ब्राह्मण समाज उनके तर्क से सहमत नहीं था.

एक बार उडूप पंडित किसी काम से लम्बे अंतराल के लिए गांव से बाहर जाते हैं. इस अंतराल में यमुना गांव के स्कूल टीचर के करीब आती है और दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बनते हैं. यमुना को गर्भ ठहर जाता है. पर स्कूल टीचर यमुना की जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं. वो उसे उसके हालात पर छोड़ देता है. ब्राह्मण समाज यमुना के चरित्र, मूल्यों के पतन का हवाला देकर, लांछन लगाना शुरू कर देता है और यमुना के बहाने उडूप पंडित को नीचा दिखाना चाहता है. कोई और रास्ता नहीं देखकर यमुना गर्भपात के लिए राजी हो जाती है. इसके लिए स्कूल टीचर उसे अछूतों की बस्ती में ले जाता है. गर्भपात के दौरान यमुना असह्य पीड़ा से गुजरती है. यमुना के इस शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न के दौर में छोटा नन्नी अपनी अक्का के साथ खड़ा रहता है.

कोगा भी मानता है कि यमुना स्कूल मास्टर के फरेब का शिकार हुई है और वह छोटे नन्नी की तरह ही यमुना को दोषी मानने से इंकार करता है. यमुना के नैतिक पतन का हवाला देकर दो वेदपाठी छात्रों के पिता उन्हें उडूप पंडित के आश्रम से ले जाते हैं.

लम्बे अंतराल के बाद उडूप पंडित घर लौटते हैं. ब्राह्मण समाज उनकी व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा है और उनके सारी परिस्थितियों से परिचित होने के बाद वे उनके फैसले का इन्तजार कर रहे हैं. उडूप पंडित सारी परिस्थितियों को जानने के बाद काफी उग्र हो जाते हैं. अकेली, निराश्रित यमुना को वे घर में वापस लेने से साफ़ इंकार कर देते हैं और इतना ही नहीं बल्कि उसका “घटश्राद्ध” (जीते जी अंतिम क्रियाक्रम) भी कर देते हैं. ब्राह्मण समाज उनकी काफी तारीफ करता है. पर श्रीकर उपाध्याय इस फैसले को मानने से इंकार कर देता है. और जब नन्नी को उसके पिता अपने घर ले जाने आते हैं, तो वो बार बार रो रोकर कोगा से अक्का का ख्याल रखने की गुजारिश करता है.
कोगा जब निराश्रित यमुना को घर बुला लेने की अर्ज लिए उडूप पंडित से मिलता है, तो उडूप पंडित वेद का श्लोक पढ़ते हैं और उसे यमुना का प्रारब्ध बताते हैं. इतना सुनते ही कोगा अपना आप, उडूप पंडित के वेद ज्ञान के प्रति अपना सम्मान खो देता है और आग बबूला होकर उन्हें भला बुरा कहता है. उसे लगता है ये सारा ज्ञान ढोंग है, आडम्बर है, जहाँ इंसानी मूल्यों, मानवता का कोई मोल नहीं है, इससे अच्छा तो वो खुद है, वो तो बेकार मृग मरीचिका के पीछे भाग रहा था. वो गुस्से में थूक कर वहां से चला जाता है.

फिल्म तीखी बहस से अपना दामन नहीं बचाती !

फिल्म अपने अंतिम क्षणों में अपने पीक को छूती है, पीक जिसका मोमेंटम कोगा की आकाँक्षाओं से तैयार होता रहता है. श्रीकर उपाध्याय का अपने गुरु से विद्रोह, छोटे नन्नी का अपनी अक्का के लिए भाव और कोगा से रो रोकर अक्का की देखभाल के लिए प्रार्थना करना और उडूप पंडित का अपनी बेटी के प्रति क्रूर व्यवहार और उसे निर्लिप्त भाव से शास्त्र सम्मत ठहराना और कोगा का मानो एक दुःस्वप्न से जागना, फिल्म में ये मोमेंट्स दर्शकों के मन मष्तिष्क को उद्द्वेलित करते हैं. फिल्म तीखी बहस से अपना पल्लू नहीं झाड़ती, बल्कि दर्शकों को combative mode में इंगेज करती है. और यही इस फिल्म की खासियत है.
फिल्म सिर्फ रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी मूल्यों पर करारा प्रहार नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों को भी इंगित करती है, जिनके प्रहार के आगे ये रूढ़िवादी मूल्य बिखड़ते नज़र आते हैं.
भविष्य में समाज का चेहरा प्रगतिशील होगा, फिल्म में आस की किरण दिखाई देती है. फिल्म शानदार है. इसे जरूर देखी जानी चाहिए.


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